महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2957, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोती है' ।। ६२ ।। तदिदं समनुप्राप्तं तव वाक्यं नृपात्मजे । एवं विदित्वा कल्याणि मा स्म शोके मनः कृथाः ।। ६३ ।। 'कल्याणमयी राजकुमारी! तुम्हारी वही बात आज सत्य हुई है, ऐसा समझकर तुम मनमें शोक न करो ।। ६३ ।। पाण्डवानां विनाशाय मा ते बुद्धिः कदाचन । शक्ता चासि महाभागे पृथिवीं सचराचराम् ।। ६४ ।। चक्षुषा क्रोधदीप्तेन निर्दग्धुं तपसो बलात् । 'पाण्डवोंके विनाशका विचार तुम्हारे मनमें कभी नहीं आना चाहिये। महाभागे! तुम अपनी तपस्याके बलसे क्रोधभरी दृष्टिद्वारा चराचर प्राणियोंसहित समूची पृथिवीको भस्म कर डालनेकी शक्ति रखती हो' ।। ६४ १/२ ।। वासुदेववचः श्रुत्वा गान्धारी वाक्यमब्रवीत् ।। ६५ ।। एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि केशव । आधिभिर्दह्यमानाया मतिः संचलिता मम ।। ६६ ।। सा मे व्यवस्थिता श्रुत्वा तव वाक्यं जनार्दन । भगवान् श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर गान्धारीने कहा—'महाबाहु केशव! तुम जैसा कहते हो, वह बिलकुल ठीक है। अबतक मेरे मनमें बड़ी व्यथाएँ थीं और उन व्यथाओंकी आगसे दग्ध होनेके कारण मेरी बुद्धि विचलित हो गयी थी (अतः मैं पाण्डवोंके अनिष्टकी बात सोचने लगी थी); परंतु जनार्दन! इस समय तुम्हारी बात सुनकर मेरी बुद्धि स्थिर हो गयी है—क्रोधका आवेश उतर गया है ।। ६५-६६ १/२ ।। राज्ञस्त्वन्धस्य वृद्धस्य हतपुत्रस्य केशव ।। ६७ ।। त्वं गतिः सहितैर्वीरैः पाण्डवैर्द्विपदां वर । 'मनुष्योंमें श्रेष्ठ केशव! ये राजा अन्धे और बूढ़े हैं तथा इनके सभी पुत्र मारे गये हैं। अब समस्त वीर पाण्डवोंके साथ तुम्हीं इनके आश्रयदाता हो' ।। ६७ १/२ ।। एतावदुक्त्वा वचनं मुखं प्रच्छाद्य वाससा ।। ६८ ।। पुत्रशोकाभिसंतप्ता गान्धारी प्ररुरोद ह । इतनी बात कहकर पुत्रशोकसे संतप्त हुई गान्धारी देवी अपने मुखको आँचलसे ढककर फूट-फूटकर रोने लगीं ।। ६८ १/२ ।। तत एनां महाबाहुः केशवः शोककर्शिताम् ।। ६९ ।। हेतुकारणसंयुक्तैर्वाक्यैराश्वासयत् प्रभुः । तब महाबाहु भगवान् केशवने शोकसे दुर्बल हुई गान्धारीको कितने ही कारण बताकर युक्तियुक्त वचनोंद्वारा आश्वासन दिया—धीरज बँधाया ।। ६९ १/२ ।।