भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2956

‘महाबाहो! भरतवंशके सिंह! आप जानते हैं कि धर्मराज युधिष्ठिरके मनमें आपके प्रति कितनी भक्ति और कितना स्वाभाविक स्नेह है ।। ५४ १/२ ।।
एतच्च कदनं कृत्वा शत्रूणामपकारिणाम् ।। ५५ ।।
दह्यते स दिवा रात्रौ न च शर्माधिगच्छति ।
‘अपने अपराधी शत्रुओंका ही यह संहार करके वे दिन-रात शोककी आगमें जलते हैं, कभी चैन नहीं पाते हैं ।। ५५ १/२ ।।
त्वां चैव नरशार्दूल गान्धारीं च यशस्विनीम् ।। ५६ ।।
स शोचन् नरशार्दूलः शान्तिं नैवाधिगच्छति ।
‘पुरुषसिंह! आप और यशस्विनी गान्धारी देवीके लिये निरन्तर शोक करते हुए नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरको शान्ति नहीं मिल रही है ।। ५६ १/२ ।।
ह्रिया च परयाऽऽविष्टो भवन्तं नाधिगच्छति ।। ५७ ।।
पुत्रशोकाभिसंतप्तं बुद्धिव्याकुलितेन्द्रियम् ।
‘आप पुत्रशोकसे सर्वथा संतप्त हैं। आपकी बुद्धि और इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हैं। ऐसी दशामें वे अत्यन्त लज्जित होनेके कारण आपके सामने नहीं आ रहे हैं’ ।। ५७ १/२ ।।
एवमुक्त्वा महाराज धृतराष्ट्रं यदूत्तमः ।। ५८ ।।
उवाच परमं वाक्यं गान्धारीं शोककर्शिताम् ।
महाराज! यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण राजा धृतराष्ट्रसे ऐसा कहकर शोकसे दुर्बल हुई गान्धारी देवीसे यह उत्तम वचन बोले— ।। ५८ १/२ ।।
सौबलेयि निबोध त्वं यत् त्वां वक्ष्यामि तच्छृणु ।। ५९ ।।
त्वत्समा नास्ति लोकेऽस्मिन्नद्य सीमन्तिनी शुभे ।
‘सुबलनन्दिनि! मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो और समझो। शुभे! इस संसारमें तुम्हारी-जैसी तपोबल-सम्पन्न स्त्री दूसरी कोई नहीं है ।। ५९ १/२ ।।
जानासि च यथा राज्ञि सभायां मम संनिधौ ।। ६० ।।
धर्मार्थसहितं वाक्यमुभयोः पक्षयोर्हितम् ।
उक्तवत्यसि कल्याणि न च ते तनयैः कृतम् ।। ६१ ।।
‘रानी! तुम्हें याद होगा, उस दिन सभामें मेरे सामने ही तुमने दोनों पक्षोंका हित करनेवाला धर्म और अर्थयुक्त वचन कहा था, किन्तु कल्याणि! तुम्हारे पुत्रोंने उसे नहीं माना ।। ६०-६१ ।।
दुर्योधनस्त्वया चोक्तो जयार्थी परुषं वचः ।
शृणु मूढ वचो मह्यं यतो धर्मस्ततो जयः ।। ६२ ।।
‘तुमने विजयकी अभिलाषा रखनेवाले दुर्योधनको सम्बोधित करके उससे बड़ी रुखाईके साथ कहा था—‘ओ मूढ़! मेरी बात सुन ले, जहाँ धर्म होता है, उसी पक्षकी जीत