भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2955

कालोपहतचित्ता हि सर्वे मुह्यन्ति भारत ।। ४७ ।।
यथा मूढो भवान् पूर्वमस्मिन्नर्थे समुद्यते ।
किमन्यत् कालयोगाद्धि दिष्टमेव परायणम् ।। ४८ ।।
'भारत! जिनका चित्त कालके प्रभावसे दूषित हो जाता है, वे सब लोग मोहमें पड़ जाते हैं। जैसे कि पहले युद्धकी तैयारीके समय आपकी भी बुद्धि मोहित हो गयी थी। इसे कालयोगके सिवा और क्या कहा जा सकता है? भाग्य ही सबसे बड़ा आश्रय है ।। ४७-४८ ।।
मा च दोषान् महाप्राज्ञ पाण्डवेषु निवेशय ।
अल्पोऽप्यतिक्रमो नास्ति पाण्डवानां महात्मनाम् ।। ४९ ।।
धर्मतो न्यायतश्चैव स्नेहतश्च परंतप ।
'महाप्राज्ञ! आप पाण्डवोंपर दोषारोपण न कीजियेगा। परंतप! धर्म, न्याय और स्नेहकी दृष्टिसे महात्मा पाण्डवोंका इसमें थोड़ा-सा भी अपराध नहीं है ।। ४९ १/२ ।।
एतत् सर्वं तु विज्ञाय ह्यात्मदोषकृतं फलम् ।। ५० ।।
असूयां पाण्डुपुत्रेषु न भवान् कर्तुमर्हति ।
'यह सब अपने ही अपराधोंका फल है, ऐसा जानकर आपको पाण्डवोंके प्रति दोषदृष्टि नहीं करनी चाहिये ।। ५० १/२ ।।
कुलं वंशश्च पिण्डाश्च यच्च पुत्रकृतं फलम् ।। ५१ ।।
गान्धार्यास्तव वै नाथ पाण्डवेषु प्रतिष्ठितम् ।
'अब तो आपका कुल और वंश पाण्डवोंसे ही चलनेवाला है। नाथ! आपको और गान्धारी देवीको पिण्डा-पानी तथा पुत्रसे प्राप्त होनेवाला सारा फल पाण्डवोंसे ही मिलनेवाला है। उन्हींपर यह सब कुछ अवलम्बित है ।। ५१ १/२ ।।
त्वं चैव कुरुशार्दूल गान्धारी च यशस्विनी ।। ५२ ।।
मा शुचो नरशार्दूल पाण्डवान् प्रति किल्बिषम् ।
'कुरुप्रवर! पुरुषसिंह! आप और यशस्वी गान्धारी-देवी कभी पाण्डवोंकी बुराई करनेकी बात न सोचें ।।
एतत् सर्वमनुध्याय आत्मनश्च व्यतिक्रमम् ।। ५३ ।।
शिवेन पाण्डवान् पाहि नमस्ते भरतर्षभ ।
'भरतश्रेष्ठ! इन सब बातों तथा अपने अपराधोंका चिन्तन करके आप पाण्डवोंके प्रति कल्याण-भावना रखते हुए उनकी रक्षा करें। आपको नमस्कार है ।। ५३ १/२ ।।
जानासि च महाबाहो धर्मराजस्य या त्वयि ।। ५४ ।।
भक्तिर्भरतशार्दूल स्नेहश्चापि स्वभावतः ।