महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
कालोपहतचित्ता हि सर्वे मुह्यन्ति भारत ।। ४७ ।।
यथा मूढो भवान् पूर्वमस्मिन्नर्थे समुद्यते ।
किमन्यत् कालयोगाद्धि दिष्टमेव परायणम् ।। ४८ ।।
'भारत! जिनका चित्त कालके प्रभावसे दूषित हो जाता है, वे सब लोग मोहमें पड़ जाते हैं। जैसे कि पहले युद्धकी तैयारीके समय आपकी भी बुद्धि मोहित हो गयी थी। इसे कालयोगके सिवा और क्या कहा जा सकता है? भाग्य ही सबसे बड़ा आश्रय है ।। ४७-४८ ।।
मा च दोषान् महाप्राज्ञ पाण्डवेषु निवेशय ।
अल्पोऽप्यतिक्रमो नास्ति पाण्डवानां महात्मनाम् ।। ४९ ।।
धर्मतो न्यायतश्चैव स्नेहतश्च परंतप ।
'महाप्राज्ञ! आप पाण्डवोंपर दोषारोपण न कीजियेगा। परंतप! धर्म, न्याय और स्नेहकी दृष्टिसे महात्मा पाण्डवोंका इसमें थोड़ा-सा भी अपराध नहीं है ।। ४९ १/२ ।।
एतत् सर्वं तु विज्ञाय ह्यात्मदोषकृतं फलम् ।। ५० ।।
असूयां पाण्डुपुत्रेषु न भवान् कर्तुमर्हति ।
'यह सब अपने ही अपराधोंका फल है, ऐसा जानकर आपको पाण्डवोंके प्रति दोषदृष्टि नहीं करनी चाहिये ।। ५० १/२ ।।
कुलं वंशश्च पिण्डाश्च यच्च पुत्रकृतं फलम् ।। ५१ ।।
गान्धार्यास्तव वै नाथ पाण्डवेषु प्रतिष्ठितम् ।
'अब तो आपका कुल और वंश पाण्डवोंसे ही चलनेवाला है। नाथ! आपको और गान्धारी देवीको पिण्डा-पानी तथा पुत्रसे प्राप्त होनेवाला सारा फल पाण्डवोंसे ही मिलनेवाला है। उन्हींपर यह सब कुछ अवलम्बित है ।। ५१ १/२ ।।
त्वं चैव कुरुशार्दूल गान्धारी च यशस्विनी ।। ५२ ।।
मा शुचो नरशार्दूल पाण्डवान् प्रति किल्बिषम् ।
'कुरुप्रवर! पुरुषसिंह! आप और यशस्वी गान्धारी-देवी कभी पाण्डवोंकी बुराई करनेकी बात न सोचें ।।
एतत् सर्वमनुध्याय आत्मनश्च व्यतिक्रमम् ।। ५३ ।।
शिवेन पाण्डवान् पाहि नमस्ते भरतर्षभ ।
'भरतश्रेष्ठ! इन सब बातों तथा अपने अपराधोंका चिन्तन करके आप पाण्डवोंके प्रति कल्याण-भावना रखते हुए उनकी रक्षा करें। आपको नमस्कार है ।। ५३ १/२ ।।
जानासि च महाबाहो धर्मराजस्य या त्वयि ।। ५४ ।।
भक्तिर्भरतशार्दूल स्नेहश्चापि स्वभावतः ।
‘महाबाहो! भरतवंशके सिंह! आप जानते हैं कि धर्मराज युधिष्ठिरके मनमें आपके प्रति कितनी भक्ति और कितना स्वाभाविक स्नेह है ।। ५४ १/२ ।।
एतच्च कदनं कृत्वा शत्रूणामपकारिणाम् ।। ५५ ।।
दह्यते स दिवा रात्रौ न च शर्माधिगच्छति ।
‘अपने अपराधी शत्रुओंका ही यह संहार करके वे दिन-रात शोककी आगमें जलते हैं, कभी चैन नहीं पाते हैं ।। ५५ १/२ ।।
त्वां चैव नरशार्दूल गान्धारीं च यशस्विनीम् ।। ५६ ।।
स शोचन् नरशार्दूलः शान्तिं नैवाधिगच्छति ।
‘पुरुषसिंह! आप और यशस्विनी गान्धारी देवीके लिये निरन्तर शोक करते हुए नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरको शान्ति नहीं मिल रही है ।। ५६ १/२ ।।
ह्रिया च परयाऽऽविष्टो भवन्तं नाधिगच्छति ।। ५७ ।।
पुत्रशोकाभिसंतप्तं बुद्धिव्याकुलितेन्द्रियम् ।
‘आप पुत्रशोकसे सर्वथा संतप्त हैं। आपकी बुद्धि और इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हैं। ऐसी दशामें वे अत्यन्त लज्जित होनेके कारण आपके सामने नहीं आ रहे हैं’ ।। ५७ १/२ ।।
एवमुक्त्वा महाराज धृतराष्ट्रं यदूत्तमः ।। ५८ ।।
उवाच परमं वाक्यं गान्धारीं शोककर्शिताम् ।
महाराज! यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण राजा धृतराष्ट्रसे ऐसा कहकर शोकसे दुर्बल हुई गान्धारी देवीसे यह उत्तम वचन बोले— ।। ५८ १/२ ।।
सौबलेयि निबोध त्वं यत् त्वां वक्ष्यामि तच्छृणु ।। ५९ ।।
त्वत्समा नास्ति लोकेऽस्मिन्नद्य सीमन्तिनी शुभे ।
‘सुबलनन्दिनि! मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो और समझो। शुभे! इस संसारमें तुम्हारी-जैसी तपोबल-सम्पन्न स्त्री दूसरी कोई नहीं है ।। ५९ १/२ ।।
जानासि च यथा राज्ञि सभायां मम संनिधौ ।। ६० ।।
धर्मार्थसहितं वाक्यमुभयोः पक्षयोर्हितम् ।
उक्तवत्यसि कल्याणि न च ते तनयैः कृतम् ।। ६१ ।।
‘रानी! तुम्हें याद होगा, उस दिन सभामें मेरे सामने ही तुमने दोनों पक्षोंका हित करनेवाला धर्म और अर्थयुक्त वचन कहा था, किन्तु कल्याणि! तुम्हारे पुत्रोंने उसे नहीं माना ।। ६०-६१ ।।
दुर्योधनस्त्वया चोक्तो जयार्थी परुषं वचः ।
शृणु मूढ वचो मह्यं यतो धर्मस्ततो जयः ।। ६२ ।।
‘तुमने विजयकी अभिलाषा रखनेवाले दुर्योधनको सम्बोधित करके उससे बड़ी रुखाईके साथ कहा था—‘ओ मूढ़! मेरी बात सुन ले, जहाँ धर्म होता है, उसी पक्षकी जीत
होती है' ।। ६२ ।। तदिदं समनुप्राप्तं तव वाक्यं नृपात्मजे । एवं विदित्वा कल्याणि मा स्म शोके मनः कृथाः ।। ६३ ।। 'कल्याणमयी राजकुमारी! तुम्हारी वही बात आज सत्य हुई है, ऐसा समझकर तुम मनमें शोक न करो ।। ६३ ।। पाण्डवानां विनाशाय मा ते बुद्धिः कदाचन । शक्ता चासि महाभागे पृथिवीं सचराचराम् ।। ६४ ।। चक्षुषा क्रोधदीप्तेन निर्दग्धुं तपसो बलात् । 'पाण्डवोंके विनाशका विचार तुम्हारे मनमें कभी नहीं आना चाहिये। महाभागे! तुम अपनी तपस्याके बलसे क्रोधभरी दृष्टिद्वारा चराचर प्राणियोंसहित समूची पृथिवीको भस्म कर डालनेकी शक्ति रखती हो' ।। ६४ १/२ ।। वासुदेववचः श्रुत्वा गान्धारी वाक्यमब्रवीत् ।। ६५ ।। एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि केशव । आधिभिर्दह्यमानाया मतिः संचलिता मम ।। ६६ ।। सा मे व्यवस्थिता श्रुत्वा तव वाक्यं जनार्दन । भगवान् श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर गान्धारीने कहा—'महाबाहु केशव! तुम जैसा कहते हो, वह बिलकुल ठीक है। अबतक मेरे मनमें बड़ी व्यथाएँ थीं और उन व्यथाओंकी आगसे दग्ध होनेके कारण मेरी बुद्धि विचलित हो गयी थी (अतः मैं पाण्डवोंके अनिष्टकी बात सोचने लगी थी); परंतु जनार्दन! इस समय तुम्हारी बात सुनकर मेरी बुद्धि स्थिर हो गयी है—क्रोधका आवेश उतर गया है ।। ६५-६६ १/२ ।। राज्ञस्त्वन्धस्य वृद्धस्य हतपुत्रस्य केशव ।। ६७ ।। त्वं गतिः सहितैर्वीरैः पाण्डवैर्द्विपदां वर । 'मनुष्योंमें श्रेष्ठ केशव! ये राजा अन्धे और बूढ़े हैं तथा इनके सभी पुत्र मारे गये हैं। अब समस्त वीर पाण्डवोंके साथ तुम्हीं इनके आश्रयदाता हो' ।। ६७ १/२ ।। एतावदुक्त्वा वचनं मुखं प्रच्छाद्य वाससा ।। ६८ ।। पुत्रशोकाभिसंतप्ता गान्धारी प्ररुरोद ह । इतनी बात कहकर पुत्रशोकसे संतप्त हुई गान्धारी देवी अपने मुखको आँचलसे ढककर फूट-फूटकर रोने लगीं ।। ६८ १/२ ।। तत एनां महाबाहुः केशवः शोककर्शिताम् ।। ६९ ।। हेतुकारणसंयुक्तैर्वाक्यैराश्वासयत् प्रभुः । तब महाबाहु भगवान् केशवने शोकसे दुर्बल हुई गान्धारीको कितने ही कारण बताकर युक्तियुक्त वचनोंद्वारा आश्वासन दिया—धीरज बँधाया ।। ६९ १/२ ।।
समाश्वास्य च गान्धारीं धृतराष्ट्रं च माधवः ॥ ७० ॥
द्रौणिसंकल्पितं भावमवबुद्ध्यत केशवः ।
गान्धारी और धृतराष्ट्रको सान्त्वना दे माधव श्रीकृष्णने अश्वत्थामाके मनमें जो भीषण संकल्प हुआ था, उसका स्मरण किया ॥ ७० ½ ॥
ततस्त्वरित उत्थाय पादौ मूर्ध्ना प्रणम्य च ॥ ७१ ॥
द्वैपायनस्य राजेन्द्र ततः कौरवमब्रवीत् ।
आपृच्छे त्वां कुरुश्रेष्ठ मा च शोके मनः कृथाः ॥ ७२ ॥
द्रौणेः पापोऽस्त्यभिप्रायस्तेनास्मि सहसोत्थितः ।
पाण्डवानां वधे रात्रौ बुद्धिस्तेन प्रदर्शिता ॥ ७३ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर वे सहसा उठकर खड़े हो गये और व्यासजीके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम करके कुरुवंशी धृतराष्ट्रसे बोले—'कुरुश्रेष्ठ! अब मैं आपसे जानेकी आज्ञा चाहता हूँ। अब आप अपने मनको शोकमग्न न कीजिये। द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके मनमें पापपूर्ण संकल्प उदित हुआ है। इसीलिये मैं सहसा उठ गया हूँ। उसने रातको सोते समय पाण्डवोंके वधका विचार किया है' ॥ ७१—७३ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं गान्धार्या सहितोऽब्रवीत् ।
धृतराष्ट्रो महाबाहुः केशवं केशिसूदनम् ॥ ७४ ॥
शीघ्रं गच्छ महाबाहो पाण्डवान् परिपालय ।
भूयस्त्वया समेष्यामि क्षिप्रमेव जनार्दन ॥ ७५ ॥
यह सुनकर गान्धारीसहित महाबाहु धृतराष्ट्रने केशिनिहन्ता केशवसे कहा—'महाबाहु जनार्दन! आप शीघ्र जाइये और पाण्डवोंकी रक्षा कीजिये। मैं पुनः शीघ्र ही आपसे मिलूँगा' ॥ ७४-७५ ॥
प्रायात् ततस्तु त्वरितो दारुकेण सहाच्युतः ।
वासुदेवे गते राजन् धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ॥ ७६ ॥
आश्वासयदमेयात्मा व्यासो लोकनमस्कृतः ।
तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण दारुकके साथ वहाँसे शीघ्र चल दिये। राजन्! श्रीकृष्णके चले जानेपर अप्रमेयस्वरूप विश्ववन्दित भगवान् व्यासने राजा धृतराष्ट्रको सान्त्वना दी ॥ ७६ ½ ॥
वासुदेवोऽपि धर्मात्मा कृतकृत्यो जगाम ह ॥ ७७ ॥
शिविरं हास्तिनपुराद् दिदृक्षुः पाण्डवान् नृप ।
नरेश्वर! इधर धर्मात्मा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण कृतकृत्य हो हस्तिनापुरसे पाण्डवोंको देखनेके लिये शिविरमें लौट आये ॥ ७७ ½ ॥
आगम्य शिविरं रात्रौ सोऽभ्यगच्छत पाण्डवान् ।
तच्च तेभ्यः समाख्याय सहितस्तैः समाहितः ॥ ७८ ॥
शिविरमें आकर रातमें वे पाण्डवोंसे मिले और उनसे सारा समाचार कहकर उन्हींके साथ सावधान होकर रहे ।। ७८ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि धृतराष्ट्रगान्धारीसमाश्वासने त्रिषष्टितमोऽध्यायः ।। ६३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें धृतराष्ट्र और गान्धारीका श्रीकृष्णको आश्वासन देनाविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६३ ।।
अध्याय (पृष्ठ 2960)
चतुःषष्टितमोऽध्यायः
दुर्योधनका संजयके सम्मुख विलाप और वाहकोंद्वारा
अपने साथियोंको संदेश भेजना
धृतराष्ट्र उवाच
अधिष्ठितः पदा मूर्ध्नि भग्नसक्थो महीं गतः ।
शौटीर्यमानी पुत्रो मे किमभाषत संजय ।। १ ।।
अत्यर्थं कोपनो राजा जातवैरश्च पाण्डुषु ।
व्यसनं परमं प्राप्तः किमाह परमाहवे ।। २ ।।
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! जब जाँघें टूट जानेके कारण मेरा पुत्र पृथ्वीपर गिर पड़ा
और भीमसेनने उसके मस्तकपर पैर रख दिया, तब उसने क्या कहा? उसे अपने बलपर
बड़ा अभिमान था। राजा दुर्योधन अत्यन्त क्रोधी तथा पाण्डवोंसे वैर रखनेवाला था। उस
युद्धभूमिमें जब वह बड़ी भारी विपत्तिमें फँस गया, तब क्या बोला? ।। १-२ ।।
संजय उवाच
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि यथावृत्तं नराधिप ।
राज्ञा यदुक्तं भग्नेन तस्मिन् व्यसन आगते ।। ३ ।।
संजयने कहा—राजन्! सुनिये। नरेश्वर! उस भारी संकटमें पड़ जानेपर टूटी जाँघवाले
राजा दुर्योधनने जो कुछ कहा था, वह सब वृत्तान्त यथार्थरूपसे बता रहा हूँ ।।
भग्नसक्थो नृपो राजन् पांसुना सोऽवगुण्ठितः ।
यमयन् मूर्धजांस्तत्र वीक्ष्य चैव दिशो दश ।। ४ ।।
केशान् नियम्य यत्नेन निःश्वसन्नुरगो यथा ।
संरम्भाश्रुपरीताभ्यां नेत्राभ्यामभिवीक्ष्य माम् ।। ५ ।।
बाहू धरण्यां निष्पिष्य सुदुर्मत्त इव द्विपः ।
प्रकीर्णान् मूर्धजान् धुन्वन् दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन् ।। ६ ।।
गर्हयन् पाण्डवं ज्येष्ठं निःश्वस्येदमथाब्रवीत् ।
राजन्! जब कौरव-नरेशकी जाँघें टूट गयीं तब वह धरतीपर गिरकर धूलमें सन गया।
फिर बिखरे हुए बालोंको समेटता हुआ वहाँ दसों दिशाओंकी ओर देखने लगा। बड़े
प्रयत्नसे अपने बालोंको बाँधकर सर्पके समान फुफकारते हुए उसने रोष और आँसुओंसे
भरे हुए नेत्रोंद्वारा मेरी ओर देखा। इसके बाद दोनों भुजाओंको पृथ्वीपर रगड़कर मदोन्मत्त
गजराजके समान अपने बिखरे केशोंको हिलाता, दाँतोंसे दाँतोंको पीसता तथा ज्येष्ठ
पाण्डव युधिष्ठिरकी निन्दा करता हुआ वह उच्छ्वास ले इस प्रकार बोला— ।। ४—६½ ।।
भीष्मे शान्तनवे नाथे कर्णे शस्त्रभृतां वरे ।। ७ ।। गौतमे शकुनौ चापि द्रोणे चास्त्रभृतां वरे । अश्वत्थाम्नि तथा शल्ये शूरे च कृतवर्मणि ।। ८ ।। इमामवस्थां प्राप्तोऽस्मि कालो हि दुरतिक्रमः । ‘शान्तनुनन्दन भीष्म, अस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्ण, कृपाचार्य, शकुनि, अस्त्रधारियोंमें सर्वश्रेष्ठ द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, शूरवीर शल्य तथा कृतवर्मा मेरे रक्षक थे तो भी मैं इस दशाको आ पहुँचा। निश्चय ही कालका उल्लंघन करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है ।।
एकादशचमूर्भर्ता सोऽहमेतां दशां गतः ।। ९ ।। कालं प्राप्य महाबाहो न कश्चिदतिवर्तते । ‘महाबाहो! मैं एक दिन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाका स्वामी था; परंतु आज इस दशामें आ पड़ा हूँ। वास्तवमें कालको पाकर कोई उसका उल्लंघन नहीं कर सकता ।। ९ १/२ ।।
आख्यातव्यं मदीयानां येऽस्मिन् जीवन्ति संयुगे ।। १० ।। यथाहं भीमसेनेन व्युत्क्रम्य समयं हतः । ‘मेरे पक्षके वीरोंमेंसे जो लोग इस युद्धमें जीवित बच गये हों, उन्हें यह बताना कि भीमसेनने किस तरह गदायुद्धके नियमका उल्लंघन करके मुझे मारा ।। १० १/२ ।।
बहूनि सुनृशंसानि कृतानि खलु पाण्डवैः ।। ११ ।। भूरिश्रवसि कर्णे च भीष्मे द्रोणे च श्रीमति । ‘पाण्डवोंने भूरिश्रवा, कर्ण, भीष्म तथा श्रीमान् द्रोणाचार्यके प्रति बहुत-से नृशंस कार्य किये हैं ।। ११ १/२ ।।
इदं चाकीर्तिजं कर्म नृशंसैः पाण्डवैः कृतम् ।। १२ ।। येन ते सत्सु निर्वेदं गमिष्यन्ति हि मे मतिः । ‘उन क्रूरकर्मा पाण्डवोंने यह भी अपनी अकीर्ति फैलानेवाला कर्म ही किया है, जिससे वे साधु पुरुषोंकी सभामें पश्चात्ताप करेंगे; ऐसा मेरा विश्वास है ।। १२ १/२ ।।
का प्रीतिः सत्त्वयुक्तस्य कृत्वोपधिकृतं जयम् ।। १३ ।। को वा समयभेत्तारं बुधः सम्मन्तुमर्हति । ‘छलसे विजय पाकर किसी सत्त्वगुणी या शक्तिशाली पुरुषको क्या प्रसन्नता होगी? अथवा जो युद्धके नियमको भंग कर देता है, उसका सम्मान कौन विद्वान् कर सकता है? ।। १३ १/२ ।।
अधर्मेण जयं लब्ध्वा को नु हृष्येत पण्डितः ।। १४ ।। यथा संहृष्यते पापः पाण्डुपुत्रो वृकोदरः ।
'अधर्मसे विजय प्राप्त करके किस बुद्धिमान् पुरुषको हर्ष होगा? जैसा कि पापी पाण्डुपुत्र भीमसेनको हो रहा है ।। १४ १/२ ।।
किन्नु चित्रमितस्त्वद्य भग्नसक्थस्य यन्मम ।। १५ ।। क्रुद्धेन भीमसेनेन पादेन मृदितं शिरः ।
'आज जब मेरी जाँघें टूट गयी हैं; ऐसी दशामें कुपित हुए भीमसेनने मेरे मस्तकको जो पैरसे ठुकराया है, इससे बढ़कर आश्चर्यकी बात और क्या हो सकती है? ।। १५ १/२ ।।
प्रतपन्तं श्रिया जुष्टं वर्तमानं च बन्धुषु ।। १६ ।। एवं कुर्यान्नरो यो हि स वै संजय पूजितः ।
'संजय! जो अपने तेजसे तप रहा हो, राजलक्ष्मीसे सेवित हो और अपने सहायक बन्धुओंके बीचमें विद्यमान हो, ऐसे शत्रुके साथ जो उक्त बर्ताव करे, वही वीर पुरुष सम्मानित होता है (मरे हुएको मारनेमें क्या बड़ाई है) ।। १६ १/२ ।।
अभिज्ञौ युद्धधर्मस्य मम माता पिता च मे ।। १७ ।। तौ हि संजय दुःखार्तौ विज्ञाप्यौ वचनान्मम । इष्टं भृत्या भृताः सम्यग् भूः प्रशास्ता ससागरा ।। १८ ।।
'मेरे माता-पिता युद्धधर्मके ज्ञाता हैं। वे दोनों मेरी मृत्युका समाचार सुनकर दुःखसे आतुर हो जायेंगे। तुम मेरे कहनेसे उन्हें यह संदेश देना कि मैंने यज्ञ किये, जो भरण-पोषण करनेयोग्य थे, उनका पालन किया और समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका अच्छी तरह शासन किया ।। १७-१८ ।।'
मूर्ध्नि स्थितममित्राणां जीवतामेव संजय । दत्ता दाया यथाशक्ति मित्राणां च प्रियं कृतम् ।। १९ ।। अमित्रा बाधिताः सर्वे को नु स्वन्ततरो मया ।
'संजय! मैंने जीवित शत्रुओंके ही मस्तकपर पैर रखा। यथाशक्ति धनका दान और मित्रोंका प्रिय किया। साथ ही सम्पूर्ण शत्रुओंको सदा ही क्लेश पहुँचाया। संसारमें कौन ऐसा पुरुष है, जिसका अन्त मेरे समान सुन्दर हुआ हो? ।। १९ १/२ ।।'
मानिता बान्धवाः सर्वे वश्यः सम्पूजितो जनः ।। २० ।। त्रितयं सेवितं सर्वं को नु स्वन्ततरो मया ।
'मैंने सभी बन्धु-बान्धवोंको सम्मान दिया। अपनी आज्ञाके अधीन रहनेवाले लोगोंका सत्कार किया और धर्म, अर्थ एवं काम सबका सेवन कर लिया। मेरे समान सुन्दर अन्त किसका हुआ होगा? ।। २० १/२ ।।'
आज्ञप्तं नृपमुख्येषु मानः प्राप्तः सुदुर्लभः ।। २१ ।। आजानेयैस्तथा यातं को नु स्वन्ततरो मया ।
'बड़े-बड़े राजाओंपर हुक्म चलाया, अत्यन्त दुर्लभ सम्मान प्राप्त किया तथा आजानेय (अरबी) घोड़ोंपर सवारी की, मुझसे अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा? ।। २१½ ।। यातानि परराष्ट्राणि नृपा भुक्ताश्च दासवत् ।। २२ ।। प्रियेभ्यः प्रकृतं साधु को नु स्वन्ततरो मया । 'दूसरे राष्ट्रोंपर आक्रमण किया और कितने ही राजाओंसे दासकी भाँति सेवाएँ लीं। जो अपने प्रिय व्यक्ति थे, उनकी सदा ही भलाई की। फिर मुझसे अच्छा अन्त किसका हुआ होगा? ।। २२½ ।। अधीतं विधिवद् दत्तं प्राप्तमायुर्निरामयम् ।। २३ ।। स्वधर्मेण जिता लोकाः को नु स्वन्ततरो मया । दिष्ट्या नाहं जितः संख्ये परान् प्रेष्यवदाश्रितः ।। २४ ।। दिष्ट्या मे विपुला लक्ष्मीर्मृते त्वन्यगता विभो । 'विधिवत् वेदोंका स्वाध्याय किया, नाना प्रकारके दान दिये और रोगरहित आयु प्राप्त की। इसके सिवा, मैंने अपने धर्मके द्वारा पुण्यलोकोंपर विजय पायी है। फिर मेरे समान अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा? सौभाग्यकी बात है कि मैं न तो युद्धमें कभी पराजित हुआ और न दासकी भाँति कभी शत्रुओंकी शरण ली। सौभाग्यसे मेरे अधिकारमें विशाल राजलक्ष्मी रही है, जो मेरे मरनेके बाद ही दूसरेके हाथमें गयी है ।। २३-२४½ ।। यदिष्टं क्षत्रबन्धूनां स्वधर्ममनुतिष्ठताम् ।। २५ ।। निधनं तन्मया प्राप्तं को नु स्वन्ततरो मया । 'अपने धर्मका पालन करनेवाले क्षत्रिय-बन्धुओंको जो अभीष्ट है, वैसी ही मृत्यु मुझे प्राप्त हुई है; अतः मुझसे अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा? ।। २५½ ।। दिष्ट्या नाहं परावृत्तो वैरात् प्राकृतवज्जितः ।। २६ ।। दिष्ट्या न विमतिं कांचिद् भजित्वा तु पराजितः । 'हर्षकी बात है कि मैं युद्धमें पीठ दिखाकर भागा नहीं। निम्नश्रेणीके मनुष्यकी भाँति हार मानकर वैरसे कभी पीछे नहीं हटा तथा कभी किसी दुर्विचारका आश्रय लेकर पराजित नहीं हुआ—यह भी मेरे लिये गौरवकी ही बात है ।। २६½ ।। सुप्तं वाथ प्रमत्तं वा यथा हन्याद् विषेण वा ।। २७ ।। एवं व्युत्क्रान्तधर्मेण व्युत्क्रम्य समयं हतः । 'जैसे कोई सोये अथवा पागल हुए मनुष्यको मार दे या धोखेसे जहर देकर किसीकी हत्या कर डाले, उसी प्रकार धर्मका उल्लंघन करनेवाले पापी भीमसेनने गदायुद्धकी मर्यादाका उल्लंघन करके मुझे मारा है ।। २७½ ।। अश्वत्थामा महाभागः कृतवर्मा च सात्वतः ।। २८ ।। कृपः शारद्वतश्चैव वक्तव्या वचनान्मम ।
‘महाभाग अश्वत्थामा, सात्वतवंशी कृतवर्मा तथा शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य—इन सबको मेरी यह बात सुना देना ।। २८ १/२ ।।
अधर्मेण प्रवृत्तानां पाण्डवानांमनेकशाः ।। २९ ।।
विश्वासं समयघ्नानां न यूयं गन्तुमर्हथ ।
‘पाण्डवोंने अधर्ममें प्रवृत्त होकर अनेकों बार युद्धकी मर्यादा तोड़ी है; अतः आपलोग कभी उनका विश्वास न करें’ ।। २९ १/२ ।।
वार्तिकांश्चाब्रवीद् राजा पुत्रस्ते सत्यविक्रमः ।। ३० ।।
अधर्माद् भीमसेनेन निहतोऽहं यथा रणे ।
सोऽहं द्रोणं स्वर्गगतं कर्णशल्यावुभौ तथा ।। ३१ ।।
वृषसेनं महावीर्यं शकुनिं चापि सौबलम् ।
जलसन्धं महावीर्यं भगदत्तं च पार्थिवम् ।। ३२ ।।
सोमदत्तं महेष्वासं सैन्धवं च जयद्रथम् ।
दुःशासनपुरोगांश्च भ्रातॄनात्मसमांस्तथा ।। ३३ ।।
दौःशासनिं च विक्रान्तं लक्ष्मणं चात्मजावुभौ ।
एतांश्चान्यांश्च सुबहून् मदीयांश्च सहस्रशः ।। ३४ ।।
पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि सार्थहीनो यथाध्वगः ।
इसके बाद आपके सत्यपराक्रमी पुत्र राजा दुर्योधनने संदेशवाहक दूतोंसे इस प्रकार कहा— ‘भीमसेनने रणभूमिमें अधर्मसे मेरा वध किया है। अब मैं स्वर्गमें गये हुए द्रोणाचार्य, कर्ण, शल्य, महापराक्रमी वृषसेन, सुबलपुत्र शकुनि, महाबली जलसन्ध, राजा भगदत्त, महाधनुर्धर सोमदत्त, सिंधुराज जयद्रथ, अपने ही समान पराक्रमी दुःशासन आदि बन्धुगण, विक्रमशाली दुःशासनकुमार और अपने पुत्र लक्ष्मण—इन सबके तथा और भी जो बहुत-से मेरे पक्षके सहस्रों योद्धा मारे गये हैं, उन सबके पीछे मैं स्वर्ग जाऊँगा। मेरी दशा उस पथिकके समान है, जो अपने साथियोंसे बिछड़ गया हो ।। ३०—३४ १/२ ।।
कथं भ्रातॄन् हतान् श्रुत्वा भर्तारं च स्वसा मम ।। ३५ ।।
रोरूयमाणा दुःखार्ता दुःशला सा भविष्यति ।
‘हाय! अपने भाइयों और पतिकी मृत्युका समाचार सुनकर दुःखसे आतुर हो अत्यन्त रोदन करती हुई मेरी बहिन दुःशलाकी क्या दशा होगी? ।। ३५ १/२ ।।
स्नुषाभिः प्रस्नुषाभिश्च वृद्धो राजा पिता मम ।। ३६ ।।
गान्धारीसहितश्चैव कां गतिं प्रतिपत्स्यति ।
‘पुत्रों और पौत्रोंकी बिलखती हुई बहुओंके साथ मेरे बूढ़े पिता राजा धृतराष्ट्र माता गान्धारीसहित किस अवस्थाको पहुँच जायँगे? ।। ३६ १/२ ।।
नूनं लक्ष्मणमातापि हतपुत्रा हतेश्वरा ।। ३७ ।।
विनाशं यास्यति क्षिप्रं कल्याणी पृथुलोचना ।
'निश्चय ही जिसके पति और पुत्र मारे गये हैं, वह कल्याणमयी विशाललोचना लक्ष्मणकी माता भी सारा समाचार सुनकर तुरंत ही प्राण दे देगी ॥ ३७१/२ ॥
यदि जानाति चार्वाकः परिव्राड् वाग्विारदः ॥ ३८ ॥
करिष्यति महाभागो ध्रुवं चापचितिं मम ।
'संन्यासीके वेषमें सब ओर घूमनेवाले प्रवचनकुशल चार्वाकको* यदि मेरी दशा ज्ञात हो जायगी तो वे महाभाग निश्चय ही मेरे वैरका बदला लेंगे ॥ ३८१/२ ॥
समन्तपञ्चके पुण्ये त्रिषु लोकेषु विश्रुते ॥ ३९ ॥
अहं निधनमासाद्य लोकान् प्राप्स्यामि शाश्वतान् ।
'तीनों लोकोंमें विख्यात पुण्यमय समन्त-पंचकक्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त होकर अब मैं सनातन लोकोंमें जाऊँगा' ॥ ३९१/२ ॥
ततो जनसहस्राणि बाष्पपूर्णानि मारिष ॥ ४० ॥
प्रलापं नृपतेः श्रुत्वा व्यद्रवन्त दिशो दश ।
मान्यवर! राजा दुर्योधनका यह विलाप सुनकर हजारों मनुष्योंकी आँखोंमें आँसू भर आये और वे दसों दिशाओंमें भाग चले ॥ ४०१/२ ॥
ससागरवना घोरा पृथिवी सचराचरा ॥ ४१ ॥
चचालाथ सनिर्ह्रादा दिशश्चैवाविलाभवन् ।
उस समय समुद्र, वन और चराचर प्राणियोंसहित यह पृथ्वी भयानक रूपसे हिलने लगी। सब ओर वज्रकी-सी गर्जना होने लगी और सारी दिशाएँ मलिन हो गयीं ॥ ४११/२ ॥
ते द्रोणपुत्रमासाद्य यथावृत्तं न्यवेदयन् ॥ ४२ ॥
व्यवहारं गदायुद्धे पार्थिवस्य च पातनम् ।
तदाख्याय ततः सर्वे द्रोणपुत्रस्य भारत ॥
(वार्तिका दुःखसंतप्ताः शोकोपहतचेतसः ।)
ध्यात्वा च सुचिरं कालं जग्मुरार्ता यथागतम् ॥ ४३ ॥
उन संदेशवाहकोंने आकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामासे यथावत् समाचार कह सुनाया। भारत! गदायुद्धमें भीमसेनका जैसा व्यवहार हुआ तथा राजाको जिस प्रकार धराशायी किया गया, वह सारा वृत्तान्त द्रोणपुत्रको बताकर दुःखसे संतप्त हो वे बहुत देरतक चिन्तामें डूबे रहे। फिर शोकसे व्याकुलचित्त एवं आर्त होकर जैसे आये थे वैसे चले गये ॥ ४२-४३ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि दुर्योधनविलापे चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें दुर्योधनका विलापविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४३ १/२ श्लोक हैं।)
* आचार्य नीलकण्ठकी सम्मतिके अनुसार चार्वाक संन्यासी मुनिके वेषमें विचरनेवाला एक नास्तिक राक्षस था।
अध्याय (पृष्ठ 2967)
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः
दुर्योधनकी दशा देखकर अश्वत्थामाका विषाद, प्रतिज्ञा और सेनापतिके पदपर अभिषेक
संजय उवाच
वार्तिकानां सकाशात् तु श्रुत्वा दुर्योधनं हतम् ।
हतशिष्टास्ततो राजन् कौरवाणां महारथाः ॥ १ ॥
विनिर्भिन्नाः शितैर्बाणैर्गदातोमरशक्तिभिः ।
अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ॥ २ ॥
त्वरिता जवनैरश्वैरायोधानमुपागमन् ।
**संजय कहते हैं—**राजन्! संदेशवाहकोंके मुखसे दुर्योधनके मारे जानेका समाचार सुनकर मरनेसे बचे हुए कौरव महारथी अश्वत्थामा, कृपाचार्य और सात्वतवंशी कृतवर्मा—जो स्वयं भी तीखे बाण, गदा, तोमर और शक्तियोंके प्रहारसे विशेष घायल हो चुके थे, तेज चलनेवाले घोड़ोंसे जुते हुए रथपर सवार हो तुरंत ही युद्धभूमिमें आये ॥ १-२ १/२ ॥
तत्रापश्यन् महात्मानं धार्तराष्ट्रं निपातितम् ॥ ३ ॥
प्रभग्नं वायुवेगेन महाशालं यथा वने ।
भूमौ विचेष्टमानं तं रुधिरेण समुक्षितम् ॥ ४ ॥
महागजमिवारण्ये व्याधेन विनिपातितम् ।
विवर्तमानं बहुशो रुधिरौघपरिप्लुतम् ॥ ५ ॥
वहाँ आकर उन्होंने देखा कि महामनस्वी धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन मार गिराया गया है, मानो वनमें कोई विशाल शालवृक्ष वायुके वेगसे टूटकर धराशायी हो गया हो। खूनसे लथपथ हो दुर्योधन पृथ्वीपर पड़ा छटपटा रहा था, मानो जंगलमें किसी व्याधने बहुत बड़े हाथीको मार गिराया हो। रक्तकी धारामें डूबा हुआ वह बारंबार करवटें बदल रहा था ॥ ३–५ ॥
यदृच्छया निपतितं चक्रमादित्यगोचरम् ।
महावातसमुत्थेन संशुष्कमिव सागरम् ॥ ६ ॥
पूर्णचन्द्रमिव व्योम्नि तुषारावृतमण्डलम् ।
रेणुध्वस्तं दीर्घभुजं मातङ्गमिव विक्रमे ॥ ७ ॥
जैसे दैवेच्छासे सूर्यका चक्र गिर पड़ा हो, बहुत बड़ी आँधी चलनेसे समुद्र सूख गया हो, आकाशमें पूर्ण चन्द्रमण्डलपर कुहरा छा गया हो, वही दशा उस समय दुर्योधनकी हुई थी। मतवाले हाथीके समान पराक्रमी और विशाल भुजाओंवाला वह वीर धूलमें सन गया था ॥ ६-७ ॥
वृतं भूतगणैर्घोरैः क्रव्यादैश्च समन्ततः ।
यथा धनं लिप्समानैर्भृत्यैर्नृपतिसत्तमम् ॥ ८ ॥
जैसे धन चाहनेवाले भृत्यगण किसी श्रेष्ठ राजाको घेरे रहते हैं, उसी प्रकार भयंकर मांसभक्षी भूतोंने चारों ओरसे उसे घेर रखा था ॥ ८ ॥
भ्रुकुटीकृतवक्त्रान्तं क्रोधादुद्वृत्तचक्षुषम् ।
सामर्षं तं नरव्याघ्रं व्याघ्रं निपतितं यथा ॥ ९ ॥
उसके मुँहपर भौंहें तनी हुई थीं, आँखें क्रोधसे चढ़ी हुई थीं और गिरे हुए व्याघ्रके समान वह नरश्रेष्ठ वीर अमर्षमें भरा हुआ दिखायी देता था ॥ ९ ॥
ते तं दृष्ट्वा महेष्वासं भूतले पतितं नृपम् ।
मोहमभ्यागमन् सर्वे कृपप्रभृतयो रथाः ॥ १० ॥
महाधनुर्धर राजा दुर्योधनको पृथ्वीपर पड़ा हुआ देख कृपाचार्य आदि सभी महारथी मोहके वशीभूत हो गये ॥
अवतीर्य रथेभ्यश्च प्राद्रवन् राजसंनिधौ ।
दुर्योधनं च सम्प्रेक्ष्य सर्वे भूमावुपाविशन् ॥ ११ ॥
वे अपने रथोंसे उतरकर राजाके पास दौड़े गये और दुर्योधनको देखकर सब लोग उसके पास ही जमीनपर बैठ गये ॥ ११ ॥
ततो द्रौणिर्महाराज बाष्पपूर्णेक्षणः श्वसन् ।
उवाच भरतश्रेष्ठं सर्वलोकेश्वरेश्वरम् ॥ १२ ॥
महाराज! उस समय अश्वत्थामाकी आँखोंमें आँसू भर आये। वह सिसकता हुआ सम्पूर्ण जगत्के राजाधिराज भरतश्रेष्ठ दुर्योधनसे इस प्रकार बोला— ॥ १२ ॥
न नूनं विद्यते सत्यं मानुषे किंचिदेव हि ।
यत्र त्वं पुरुषव्याघ्र शेषे पांसुषु रूषितः ॥ १३ ॥
'पुरुषसिंह! निश्चय ही इस मनुष्यलोकमें कुछ भी सत्य नहीं है, सभी नाशवान् हैं, जहाँ तुम्हारे-जैसा राजा धूलमें सना हुआ लोट रहा है ॥ १३ ॥
भूत्वा हि नृपतिः पूर्वं समाज्ञाप्य च मेदिनीम् ।
कथमेकोऽद्य राजेन्द्र तिष्ठसे निर्जने वने ॥ १४ ॥
'राजेन्द्र! तुम पहले सम्पूर्ण जगत्के मनुष्योंपर आधिपत्य रखकर सारे भूमण्डलपर हुक्म चलाते थे। वही तुम आज अकेले इस निर्जन वनमें कैसे पड़े हुए हो? ॥ १४ ॥
दुःशासनं न पश्यामि नापि कर्णं महारथम् ।
नापि तान् सुहृदः सर्वान् किमिदं भरतर्षभ ॥ १५ ॥
'भरतश्रेष्ठ! न तो मैं दुःशासनको देखता हूँ और न महारथी कर्णको। अन्य सब सुहृदोंका भी मुझे दर्शन नहीं हो रहा है, यह क्या बात है? ॥ १५ ॥
दुःखं नूनं कृतान्तस्य गतिं ज्ञातुं कथंचन ।
लोकानां च भवान् यत्र शेषे पांसुषु रूषितः ॥ १६ ॥ ‘निश्चय ही काल और लोकोंकी गतिको जानना किसी प्रकार भी कठिन ही है, जिसके अधीन होकर आप धूलमें सने हुए पड़े हैं ॥ १६ ॥ एष मूर्धाभिषिक्तानामग्रे गत्वा परंतपः । सतृणं ग्रसते पांसुं पश्य कालस्य पर्ययम् ॥ १७ ॥ ‘अहो! ये मूर्धाभिषिक्त राजाओंके आगे चलनेवाले शत्रुसंतापी महाराज दुर्योधन तिनकोंसहित धूल फाँक रहे हैं। यह कालका उलट-फेर तो देखो ॥ १७ ॥ क्व ते तदमलं छत्रं व्यजनं क्व च पार्थिव । सा च ते महती सेना क्व गता पार्थिवोत्तम ॥ १८ ॥ ‘नृपश्रेष्ठ! महाराज! कहाँ है आपका वह निर्मल छत्र, कहाँ है व्यजन और कहाँ गयी आपकी वह विशाल सेना? ॥ १८ ॥ दुर्विज्ञेया गतिर्नूनं कार्याणां कारणान्तरे । यद् वै लोकगुरुर्भूत्वा भवानेतां दशां गतः ॥ १९ ॥ ‘किस कारणसे कौन-सा कार्य होगा, इसको समझ लेना निश्चय ही बहुत कठिन है; क्योंकि सम्पूर्ण जगत्के आदरणीय नरेश होकर भी आज तुम इस दशाको पहुँच गये ॥ १९ ॥ अध्रुवा सर्वमर्त्येषु श्रीरुपालक्ष्यते भृशम् । भवतो व्यसनं दृष्ट्वा शक्रविस्पर्धिनो भृशम् ॥ २० ॥ ‘तुम तो अपनी साम्राज्य-लक्ष्मीके द्वारा इन्द्रकी समानता करनेवाले थे। आज तुमपर भी यह संकट आया हुआ देखकर निश्चय हो गया कि किसी भी मनुष्यकी सम्पत्ति सदा स्थिर नहीं देखी जा सकती’ ॥ २० ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा दुःखितस्य विशेषतः । उवाच राजन् पुत्रस्ते प्राप्तकालमिदं वचः ॥ २१ ॥ विमृज्य नेत्रे पाणिभ्यां शोकजं बाष्पमुत्सृजन् । कृपादीन् स तदा वीरान् सर्वानैव नराधिपः ॥ २२ ॥ राजन्! अत्यन्त दुःखी हुए अश्वत्थामाकी वह बात सुनकर आपके पुत्र राजा दुर्योधनके नेत्रोंसे शोकके आँसू बहने लगे। उसने दोनों हाथोंसे नेत्रोंको पोंछा और कृपाचार्य आदि समस्त वीरोंसे यह समयोचित वचन कहा— ॥ २१-२२ ॥ ईदृशो लोकधर्मोऽयं धात्रा निर्दिष्ट उच्यते । विनाशः सर्वभूतानां कालपर्यायमागतः ॥ २३ ॥ ‘मित्रो! इस मर्त्यलोकका ऐसा ही धर्म (नियम) है। विधाताने ही इसका निर्देश किया है, ऐसा कहा जाता है; इसलिये कालक्रमसे एक-न-एक दिन सम्पूर्ण प्राणियोंके विनाशकी घड़ी आ ही जाती है ॥ २३ ॥
सोऽयं मां समनुप्राप्तः प्रत्यक्षं भवतां हि यः।
पृथिवीं पालयित्वाहमेतां निष्ठामुपागतः॥ २४॥
‘वही यह विनाशका समय अब मुझे भी प्राप्त हुआ है, जिसे आपलोग प्रत्यक्ष देख रहे हैं। एक दिन मैं सारी पृथ्वीका पालन करता था और आज इस अवस्थाको पहुँच गया हूँ॥ २४॥
दिष्ट्या नाहं परावृत्तो युद्धे कस्यांचिदापदि।
दिष्ट्याहं निहतः पापैश्छलेनैव विशेषतः॥ २५॥
‘तो भी मुझे इस बातकी खुशी है कि कैसी ही आपत्ति क्यों न आयी, मैं युद्धमें कभी पीछे नहीं हटा। पापियोंने मुझे मारा भी तो छलसे॥ २५॥
उत्साहश्च कृतो नित्यं मया दिष्ट्या युयुत्सता।
दिष्ट्या चास्मिन् हतो युद्धे निहतज्ञातिबान्धवः॥ २६॥
‘सौभाग्यवश मैंने रणभूमिमें जूझनेकी इच्छा रखकर सदा ही उत्साह दिखाया है और भाई-बन्धुओंके मारे जानेपर स्वयं भी युद्धमें ही प्राण-त्याग कर रहा हूँ, इससे मुझे विशेष संतोष है॥ २६॥
दिष्ट्या च वोऽहं पश्यामि मुक्तानस्माज्जनक्षयात्।
स्वस्तियुक्तांश्च कल्यांश्च तन्मे प्रियमनुत्तमम्॥ २७॥
‘सौभाग्यकी बात है कि मैं आपलोगोंको इस नरसंहारसे मुक्त देख रहा हूँ। साथ ही आपलोग सकुशल एवं कुछ करनेमें समर्थ हैं—यह मेरे लिये और भी उत्तम एवं प्रसन्नताकी बात है॥ २७॥
मा भवन्तोऽत्र तप्यन्तां सौहृदान्निधनेन मे।
यदि वेदाः प्रमाणं वो जिता लोका मयाक्षयाः॥ २८॥
‘आपलोगोंका मुझपर स्वाभाविक स्नेह है, इसलिये मेरी मृत्युसे यहाँ आपलोगोंको जो दुःख और संताप हो रहा है, वह नहीं होना चाहिये। यदि आपकी दृष्टिमें वेदशास्त्र प्रामाणिक हैं तो मैंने अक्षय लोकोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया॥ २८॥
मन्यमानः प्रभावं च कृष्णस्यामिततेजसः।
तेन न च्यावितश्चाहं क्षत्रधर्मात् स्वनुष्ठितात्॥ २९॥
स मया समनुप्राप्तो नास्मि शोच्यः कथंचन।
‘मैं अमित तेजस्वी श्रीकृष्णके अद्भुत प्रभावको मानता हुआ भी कभी उनकी प्रेरणासे अच्छी तरह पालन किये हुए क्षत्रियधर्मसे विचलित नहीं हुआ। मैंने उस धर्मका फल प्राप्त किया है; अतः किसी प्रकार भी मैं शोकके योग्य नहीं हूँ॥ २९ १/२॥
कृतं भवद्भिः सदृशमनुरूपमिवात्मनः॥ ३०॥
यतितं विजये नित्यं दैवं तु दुरतिक्रमम्।
'आपलोगोंने अपने स्वरूपके अनुरूप योग्य पराक्रम प्रकट किया और सदा मुझे विजय दिलानेकी ही चेष्टा की; तथापि दैवके विधानका उल्लंघन करना किसीके लिये भी सर्वथा कठिन है' ॥ ३० १/२ ॥
एतावदुक्त्वा वचनं बाष्पव्याकुललोचनः ॥ ३१ ॥
तूष्णीं बभूव राजेन्द्र रुजासौ विह्वलो भृशम् ।
राजेन्द्र! इतना कहते-कहते दुर्योधनकी आँखें आँसुओंसे भर आयीं और वह वेदनासे अत्यन्त व्याकुल होकर चुप हो गया—उससे कुछ बोला नहीं गया ॥ ३१ १/२ ॥
तथा दृष्ट्वा तु राजानं बाष्पशोकसमन्वितम् ॥ ३२ ॥
द्रौणिः क्रोधेन जज्वल यथा वह्निर्जगत्क्षये ।
राजा दुर्योधनको शोकके आँसू बहाते देख अश्वत्थामा प्रलयकालकी अग्निके समान क्रोधसे प्रज्वलित हो उठा ॥ ३२ १/२ ॥
स च क्रोधसमाविष्टः पाणौ पाणिं निपीड्य च ॥ ३३ ॥
बाष्पविह्वलया वाचा राजानमिदमब्रवीत् ।
रोषके आवेशमें भरकर उसने हाथपर हाथ दबाया और अश्रुगद्गद वाणीद्वारा उसने राजा दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३३ १/२ ॥
पिता मे निहतः क्षुद्रैः सुनृशंसेन कर्मणा ॥ ३४ ॥
न तथा तेन तप्यामि यथा राजंस्त्वयाद्य वै ।
'राजन्! नीच पाण्डवोंने अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्मके द्वारा मेरे पिताका वध किया था; परंतु उसके कारण भी मैं उतना संतप्त नहीं हूँ, जैसा कि आज तुम्हारे वधके कारण मुझे कष्ट हो रहा है' ॥ ३४ १/२ ॥
शृणु चेदं वचो मह्यं सत्येन वदतः प्रभो ॥ ३५ ॥
इष्टापूर्तेन दानेन धर्मेण सुकृतेन च ।
अद्याहं सर्वपञ्चालान् वासुदेवस्य पश्यतः ॥ ३६ ॥
सर्वोपायैर्हि नेष्यामि प्रेतराजनिवेशनम् ।
अनुज्ञां तु महाराज भवान् मे दातुमर्हति ॥ ३७ ॥
'प्रभो! मैं सत्यकी शपथ खाकर जो कह रहा हूँ, मेरी इस बातको सुनो। मैं अपने इष्ट, आपूर्त, दान, धर्म तथा अन्य शुभ कर्मोंकी शपथ खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ कि आज श्रीकृष्णके देखते-देखते सम्पूर्ण पांचालोंको सभी उपायोंद्वारा यमराजके लोकमें भेज दूँगा। महाराज! इसके लिये तुम मुझे आज्ञा दे दो' ॥ ३५—३७ ॥
इति श्रुत्वा तु वचनं द्रोणपुत्रस्य कौरवः ।
मनसः प्रीतिजननं कृपं वचनमब्रवीत् ॥ ३८ ॥
आचार्य शीघ्रं कलशं जलपूर्णं समानय ।
द्रोणपुत्रका यह मनको प्रसन्न करनेवाला वचन सुनकर कुरुराज दुर्योधनने कृपाचार्यसे कहा—‘आचार्य! आप शीघ्र ही जलसे भरा हुआ कलश ले आइये’ ।। ३८ १/२ ।।
स तद् वचनमाज्ञाय राज्ञो ब्राह्मणसत्तमः ।। ३९ ।।
कलशं पूर्णमादाय राज्ञोऽन्तिकमुपागमत् ।
राजाकी वह बात मानकर ब्राह्मणशिरोमणि कृपाचार्य जलसे भरा हुआ कलश ले उसके समीप आये ।। ३९ १/२ ।।
तमब्रवीन्महाराज पुत्रस्तव विशाम्पते ।। ४० ।।
ममाज्ञया द्विजश्रेष्ठ द्रोणपुत्रोऽभिषिच्यताम् ।
सैनापत्येन भद्रं ते मम चेदिच्छसि प्रियम् ।। ४१ ।।
महाराज! प्रजानाथ! तब आपके पुत्रने उनसे कहा—‘द्विजश्रेष्ठ! आपका कल्याण हो। यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो मेरी आज्ञासे द्रोणपुत्रका सेनापतिके पदपर अभिषेक कीजिये ।। ४०-४१ ।।
राज्ञो नियोगाद् योद्धव्यं ब्राह्मणेन विशेषतः ।
वर्तता क्षत्रधर्मेण ह्येवं धर्मविदो विदुः ।। ४२ ।।
‘ब्राह्मणको विशेषतः राजाकी आज्ञासे क्षत्रिय-धर्मके अनुसार बर्ताव करते हुए युद्ध करना चाहिये—ऐसा धर्मज्ञ पुरुष मानते हैं’ ।। ४२ ।।
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा कृपः शारद्वतस्तथा ।
द्रौणिं राज्ञो नियोगेन सैनापत्येऽभ्यषेचयत् ।। ४३ ।।
राजाकी वह बात सुनकर शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने उसकी आज्ञाके अनुसार अश्वत्थामाका सेनापतिके पदपर अभिषेक किया ।। ४३ ।।
सोऽभिषिक्तो महाराज परिष्वज्य नृपोत्तमम् ।
प्रययौ सिंहनादेन दिशः सर्वा विनादयन् ।। ४४ ।।
महाराज! अभिषेक हो जानेपर अश्वत्थामाने नृपश्रेष्ठ दुर्योधनको हृदयसे लगाया और अपने सिंहनादसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए वहाँसे प्रस्थान किया ।।
दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र शोणितेन परिप्लुतः ।
तां निशां प्रतिपेदेऽथ सर्वभूतभयावहाम् ।। ४५ ।।
राजेन्द्र! खूनमें डूबे हुए दुर्योधनने भी सम्पूर्ण भूतोंके मनमें भय उत्पन्न करनेवाली वह रात वहीं व्यतीत की ।। ४५ ।।
अपक्रम्य तु ते तूर्णं तस्मादायोधनान्नृप ।
शोकसंविग्नमनसश्चिन्ताध्यानपराभवन् ।। ४६ ।।
नरेश्वर! शोकसे व्याकुलचित्त हुए वे तीनों महारथी उस युद्धभूमिसे तुरंत ही दूर हट गये और चिन्ता एवं कर्तव्यके विचारमें निमग्न हो गये ।। ४६ ।।
॥ शल्यपर्व सम्पूर्णम् ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि अश्वत्थामसैनापत्याभिषेके पञ्चषष्टितमोऽध्यायः॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें अश्वत्थामाका सेनापतिके पदपर अभिषेकविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६५ ॥
॥ शल्यपर्व सम्पूर्णम् ॥
| अनुष्टुप् | बड़े श्लोक | बड़े श्लोकोंको अनुष्टुप् माननेपर | कुल | |
|---|---|---|---|---|
| उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये | ३५३१ | (११५) | १५८= | ३६८९= |
| दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये | ४२ | (५) | ६ ॥। = | ४८ ॥। = |
| शल्यपर्वकी कुल श्लोकसंख्या | ३७३८ |
सौप्तिकपर्व
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
श्रीमहाभारतम्
सौप्तिकपर्व
प्रथमोऽध्यायः
तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायण भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये।
संजय उवाच
ततस्ते सहिता वीराः प्रयाता दक्षिणामुखाः ।
उपास्तमनवेलायां शिबिराभ्याशमागताः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! दुर्योधनकी आज्ञाके अनुसार कृपाचार्यके द्वारा अश्वत्थामाका सेनापतिके पदपर अभिषेक हो जानेके अनन्तर वे तीनों वीर अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा एक साथ दक्षिण दिशाकी ओर चले और सूर्यास्तके समय सेनाकी छावनीके निकट जा पहुँचे ॥ १ ॥
विमुच्य वाहांस्त्वरिता भीता समभवंस्तदा ।
गहनं देशमासाद्य प्रच्छन्ना न्यविशन्त ते ॥ २ ॥
शत्रुओंको पता न लग जाय, इस भयसे वे सब-के-सब डरे हुए थे, अतः बड़ी उतावलीके साथ वनके गहन प्रदेशमें जाकर उन्होंने घोड़ोंको खोल दिया और छिपकर एक स्थानपर वे जा बैठे ॥ २ ॥
सेनानिवेशमभितो नातिदूरमवस्थिताः ।
निकृत्ता निशितैः शस्त्रैः समन्तात् क्षतविक्षताः ॥ ३ ॥