भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2963

'बड़े-बड़े राजाओंपर हुक्म चलाया, अत्यन्त दुर्लभ सम्मान प्राप्त किया तथा आजानेय (अरबी) घोड़ोंपर सवारी की, मुझसे अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा? ।। २१½ ।। यातानि परराष्ट्राणि नृपा भुक्ताश्च दासवत् ।। २२ ।। प्रियेभ्यः प्रकृतं साधु को नु स्वन्ततरो मया । 'दूसरे राष्ट्रोंपर आक्रमण किया और कितने ही राजाओंसे दासकी भाँति सेवाएँ लीं। जो अपने प्रिय व्यक्ति थे, उनकी सदा ही भलाई की। फिर मुझसे अच्छा अन्त किसका हुआ होगा? ।। २२½ ।। अधीतं विधिवद् दत्तं प्राप्तमायुर्निरामयम् ।। २३ ।। स्वधर्मेण जिता लोकाः को नु स्वन्ततरो मया । दिष्ट्या नाहं जितः संख्ये परान् प्रेष्यवदाश्रितः ।। २४ ।। दिष्ट्या मे विपुला लक्ष्मीर्मृते त्वन्यगता विभो । 'विधिवत् वेदोंका स्वाध्याय किया, नाना प्रकारके दान दिये और रोगरहित आयु प्राप्त की। इसके सिवा, मैंने अपने धर्मके द्वारा पुण्यलोकोंपर विजय पायी है। फिर मेरे समान अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा? सौभाग्यकी बात है कि मैं न तो युद्धमें कभी पराजित हुआ और न दासकी भाँति कभी शत्रुओंकी शरण ली। सौभाग्यसे मेरे अधिकारमें विशाल राजलक्ष्मी रही है, जो मेरे मरनेके बाद ही दूसरेके हाथमें गयी है ।। २३-२४½ ।। यदिष्टं क्षत्रबन्धूनां स्वधर्ममनुतिष्ठताम् ।। २५ ।। निधनं तन्मया प्राप्तं को नु स्वन्ततरो मया । 'अपने धर्मका पालन करनेवाले क्षत्रिय-बन्धुओंको जो अभीष्ट है, वैसी ही मृत्यु मुझे प्राप्त हुई है; अतः मुझसे अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा? ।। २५½ ।। दिष्ट्या नाहं परावृत्तो वैरात् प्राकृतवज्जितः ।। २६ ।। दिष्ट्या न विमतिं कांचिद् भजित्वा तु पराजितः । 'हर्षकी बात है कि मैं युद्धमें पीठ दिखाकर भागा नहीं। निम्नश्रेणीके मनुष्यकी भाँति हार मानकर वैरसे कभी पीछे नहीं हटा तथा कभी किसी दुर्विचारका आश्रय लेकर पराजित नहीं हुआ—यह भी मेरे लिये गौरवकी ही बात है ।। २६½ ।। सुप्तं वाथ प्रमत्तं वा यथा हन्याद् विषेण वा ।। २७ ।। एवं व्युत्क्रान्तधर्मेण व्युत्क्रम्य समयं हतः । 'जैसे कोई सोये अथवा पागल हुए मनुष्यको मार दे या धोखेसे जहर देकर किसीकी हत्या कर डाले, उसी प्रकार धर्मका उल्लंघन करनेवाले पापी भीमसेनने गदायुद्धकी मर्यादाका उल्लंघन करके मुझे मारा है ।। २७½ ।। अश्वत्थामा महाभागः कृतवर्मा च सात्वतः ।। २८ ।। कृपः शारद्वतश्चैव वक्तव्या वचनान्मम ।