महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रतिज्ञा की है, वह मेरा ही विनाश करनेवाली है। इसमें संदेह नहीं कि यदि मैं न्यायके अनुसार युद्ध करूँगा तो मुझे अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा॥ ४७-४८॥ छद्मना च भवेत् सिद्धिः शत्रूणां च क्षयो महान्। तत्र संशयितादर्थाद् योऽर्थो निःसंशयो भवेत्॥ ४९॥ तं जना बहु मन्यन्ते ये च शास्त्रविशारदाः। 'यदि छलसे काम लूँ तो अवश्य मेरे अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि हो सकती है। शत्रुओंका महान् संहार भी तभी सम्भव होगा। जहाँ सिद्धि मिलनेमें संदेह हो, उसकी अपेक्षा उस उपायका अवलम्बन करना उत्तम है, जिसमें संशयके लिये स्थान न हो। साधारण लोग तथा शास्त्रज्ञ पुरुष भी उसीका अधिक आदर करते हैं॥ यच्चाप्यत्र भवेद् वाच्यं गर्हितं लोकनिन्दितम्॥ ५०॥ कर्तव्यं तन्मनुष्येण क्षत्रधर्मेण वर्तता। 'इस लोकमें जिस कार्यको गर्हणीय समझा जाता हो, जिसकी सब लोग भरपेट निन्दा करते हों, वह भी क्षत्रिय-धर्मके अनुसार बर्ताव करनेवाले मनुष्यके लिये कर्तव्य माना गया है॥ ५० १/२॥ निन्दितानि च सर्वाणि कुत्सितानि पदे पदे॥ ५१॥ सोपधानि कृतान्येव पाण्डवैरकृतात्मभिः। 'अपवित्र अन्तःकरणवाले पाण्डवोंने भी तो पद-पदपर ऐसे कार्य किये हैं, जो सब-के-सब निन्दा और घृणाके योग्य रहे हैं। उनके द्वारा भी अनेक कपटपूर्ण कर्म किये ही गये हैं॥ ५१ १/२॥ अस्मिन्नर्थे पुरा गीता श्रूयन्ते धर्मचिन्तकैः॥ ५२॥ श्लोका न्यायमवेक्षद्भिस्तत्त्वार्थस्तत्त्वदर्शिभिः। 'इस विषयमें न्यायपर दृष्टि रखनेवाले धर्मचिन्तक एवं तत्त्वदर्शी पुरुषोंने प्राचीन कालमें ऐसे श्लोकोंका गान किया है, जो तात्त्विक अर्थका प्रतिपादन करनेवाले हैं। वे श्लोक इस प्रकार सुने जाते हैं—॥ ५२ १/२॥ परिश्रान्ते विदीर्णे वा भुञ्जाने वापि शत्रुभिः॥ ५३॥ प्रस्थाने वा प्रवेशे वा प्रहर्तव्यं रिपोर्बलम्। 'शत्रुओंकी सेना यदि बहुत थक गयी हो, तितर-बितर हो गयी हो, भोजन कर रही हो, कहीं जा रही हो अथवा किसी स्थानविशेषमें प्रवेश कर रही हो तो भी विपक्षियोंको उसपर प्रहार करना ही चाहिये॥ ५३ १/२॥ निद्रार्तमर्धरात्रे च तथा नष्टप्रणायकम्॥ ५४॥ भिन्नयोधं बलं यच्च द्विधा युक्तं च यद् भवेत्।