भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2982

'जो सेना आधी रातके समय नींदमें अचेत पड़ी हो, जिसका नायक नष्ट हो गया हो, जिसके योद्धाओंमें फूट हो गयी हो और जो दुविधामें पड़ गयी हो, उसपर भी शत्रुको अवश्य प्रहार करना चाहिये' ॥ ५४ १/२ ॥

इत्येवं निश्चयं चक्रे सुप्तानां निशि मारणे ॥ ५५ ॥ पाण्डूनां सह पञ्चालैर्द्रोणपुत्रः प्रतापवान् । इस प्रकार विचार करके प्रतापी द्रोणपुत्रने रातको सोते समय पांचालोंसहित पाण्डवोंको मार डालनेका निश्चय किया ॥ ५५ १/२ ॥

स क्रूरां मतिमास्थाय विनिश्चित्य मुहुर्मुहुः ॥ ५६ ॥ सुप्तौ प्राबोधयत् तौ तु मातुलं भोजमेव च । क्रूरतापूर्ण बुद्धिका आश्रय ले बारंबार उपर्युक्त निश्चय करके अश्वत्थामाने सोये हुए अपने मामा कृपाचार्यको तथा भोजवंशी कृतवर्माको भी जगाया ॥

तौ प्रबुद्धौ महात्मानौ कृपभोजौ महाबलौ ॥ ५७ ॥ नोत्तरं प्रतिपद्येतां तत्र युक्तं ह्रिया वृतौ । जागनेपर महामनस्वी महाबली कृपाचार्य और कृतवर्माने जब अश्वत्थामाका निश्चय सुना, तब वे लज्जासे गड़ गये और उन्हें कोई उचित उत्तर नहीं सूझा ॥ ५७ १/२ ॥

स मुहूर्तमिव ध्यात्वा बाष्पविह्वलमब्रवीत् ॥ ५८ ॥ हतो दुर्योधनो राजा एकवीरो महाबलः । यस्यार्थे वैरमस्माभिरासक्तं पाण्डवैः सह ॥ ५९ ॥ तब अश्वत्थामा दो घड़ीतक चिन्तामग्न रहकर अश्रु-गद्गद वाणीमें इस प्रकार बोला—'संसारका अद्वितीय वीर महाबली राजा दुर्योधन मारा गया, जिसके लिये हमलोगोंने पाण्डवोंके साथ वैर बाँध रखा था ॥ ५८-५९ ॥

एकाकी बहुभिः क्षुद्रैराहवे शुद्धविक्रमः । पातितो भीमसेनेन एकादशचमूपतिः ॥ ६० ॥ 'जो किसी दिन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओंका स्वामी था, वह राजा दुर्योधन विशुद्ध पराक्रमका परिचय देता हुआ अकेला युद्ध कर रहा था; किंतु बहुत-से नीच पुरुषोंने मिलकर युद्धस्थलमें उसे भीमसेनके द्वारा धराशायी करा दिया ॥ ६० ॥

वृकोदरेण क्षुद्रेण सुनृशंसमिदं कृतम् । मूर्धाभिषिक्तस्य शिरः पादेन परिमृद्नता ॥ ६१ ॥ 'एक मूर्धाभिषिक्त सम्राट्‌के मस्तकपर लात मारते हुए नीच भीमसेनने यह बड़ा ही क्रूरतापूर्ण कार्य कर डाला है ॥ ६१ ॥

विनर्दन्ति च पञ्चालाः क्ष्वेलन्ति च हसन्ति च । धमन्ति शङ्खान् शतशो हृष्टा घ्नन्ति च दुन्दुभीन् ॥ ६२ ॥