महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 299, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसी प्रकार अभिमन्यु अपने बाणोंसे शत्रुओंके गन्धर्वनगरके समान विशाल तथा विधिपूर्वक सुसज्जित बहुसंख्यक रथोंके टुकड़े-टुकड़े करता हुआ सम्पूर्ण दिशाओंमें दृष्टिगोचर हो रहा था। उन रथोंके प्रधान ईषादण्ड नष्ट हो गये थे। त्रिवेणु चूर-चूर हो गये थे। स्तम्भदण्ड उखड़ गये थे। उसके बन्धन टूट गये थे। जंघा (नीचेका स्थान) और कूबर (जूएका आधारभूत काष्ठ) टूट-फूट गये थे। पहियोंके ऊपरी भाग और अरे चौपट कर दिये गये थे। पहिये, रथकी सजावटके समान और बैठकें नष्ट-भ्रष्ट हो गयी थीं। सारी सामग्री तथा रथके अवयव चूर-चूर हो गये थे। रथकी छतरी और आवरणको गिरा दिया गया था तथा उन रथोंके समस्त योद्धा मार डाले गये थे। इस तरह सहस्रों रथोंकी धज्जियाँ उड़ गयी थीं ॥ ३१—३३ ॥
पुनर्द्विपान् द्विपारोहान् वैजयन्त्यङ्कुशध्वजान् ।
तूणान् वर्माण्यथो कक्ष्या ग्रैवेयांश्च सकम्बलान् ॥ ३४ ॥
घण्टाःशुण्डाविषाणाग्रान् छत्रमालाः पदानुगान् ।
शरैर्निशितधाराग्रैः शात्रवाणामशातयत् ॥ ३५ ॥
रथोंका संहार करके अभिमन्युने पुनः तीखी धारवाले बाणोंद्वारा शत्रुओंके हाथियों, गजारोहियों, उनके झंडों, अंकुशों, ध्वजाओं, तूणीरों, कवचों, रस्सों, कण्ठाभूषणों, झूलों, घंटों, सूँडों, दाँतों, छत्रों, मालाओं और पादरक्षकों को भी काट डाला ॥ ३४-३५ ॥
वनायुजान् पर्वतीयान् काम्बोजानथ बाह्लिकान् ।
स्थिरबालधिकर्णाक्षाञ्जवनान् साधुवाहिनः ॥ ३६ ॥
आरूढाञ्शिक्षितैर्योधैः शक्त्यृष्टिप्रासयोधिभिः ।
विध्वस्तचामरमुखान् विप्रविद्धप्रकीर्णकान् ॥ ३७ ॥
निरस्तजिह्वानयनान् निष्कीर्णान्त्रयकृद्घनान् ।
हतारोहांश्छिन्नघण्टान् क्रव्यादगणमोदकान् ॥ ३८ ॥
निकृत्तचर्मकवचान् शकृन्मूत्रासृगाप्लुतान् ।
निपातयन्नश्ववरांस्तावकान् स व्यरोचत ॥ ३९ ॥
एको विष्णु रिवाचिन्त्यं कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।