महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 300, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! आपके वनायुज, पर्वतीय, काम्बोज तथा बाह्निक देशीय श्रेष्ठ घोड़ोंको, जो पूँछ, कान और नेत्रोंको निश्चल करके दौड़नेवाले, वेगवान् और अच्छी तरह सवारीका काम देनेवाले थे तथा जिनके ऊपर शक्ति, ऋष्टि एवं प्रासद्वारा युद्ध करनेवाले सुशिक्षित योद्धा सवार थे, धराशायी करता हुआ अकेला वीर अभिमन्यु एकमात्र भगवान् विष्णुकी भाँति अचिन्त्य एवं दुष्कर कर्म करके बड़ी शोभा पा रहा था। उन घोड़ोंके मस्तक और गर्दनके चँवरके समान बड़े-बड़े बाल और मुख बाणोंके आघातसे नष्ट हो गये थे। वे सब-के-सब घायल हो गये थे। कितने ही अश्वोंके सिर छिन्न-भिन्न होकर बिखर गये थे। कितनोंकी जिह्वा और नेत्र बाहर निकल आये थे। आँत और जिगरके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे। उन सबके सवार मार डाले गये थे। उनके गलेके घुँघुरू कटकर गिर गये थे। वे घोड़े मृत्युके अधीन होकर मांसभक्षी प्राणियोंका हर्ष बढ़ा रहे थे। उनके चमड़े और कवच टूक-टूक हो गये थे और वे मल-मूत्र तथा रक्तमें डूबे हुए थे॥ ३६—३९ १/२॥
तथा निर्मथितं तेन त्र्यङ्गं तव बलं महत् ॥ ४० ॥
यथासुरबलं घोरं त्र्यम्बकेण महौजसा।
जैसे महान् तेजस्वी त्रिनेत्रधारी भगवान् रुद्रने असुरोंकी सेनाको मथ डाला था, उसी प्रकार अभिमन्युने रथ, हाथी और घोड़े—इन तीन अंगोंसे युक्त आपकी विशाल सेनाको रौंद डाला॥ ४० १/२॥
कृत्वा कर्म रणेऽसह्यं परैरार्जुनिराहवे ॥ ४१ ॥
अभिनच्च पदात्योघांस्त्वदीयानेव सर्वशः।
इस प्रकार अर्जुनकुमार अभिमन्युने रणक्षेत्रमें शत्रुओंके लिये असह्य पराक्रम करके आपके पैदल योद्धाओंके समूहोंका सभी प्रकारसे विनाश आरम्भ किया॥ ४१ १/२॥
एवमेकेन तां सेनां सौभद्रेण शितैः शरैः ॥ ४२ ॥
भृशं विप्रहतां दृष्ट्वा स्कन्देनेवासुरीं चमूम्।
त्वदीयास्तव पुत्राश्च वीक्षमाणा दिशो दश ॥ ४३ ॥
संशुष्कास्याश्चलन्नेत्राः प्रस्विन्ना रोमहर्षिणः।
पलायनकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जये ॥ ४४ ॥
जैसे कार्तिकेयने असुरोंकी सेनाको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था, उसी प्रकार एकमात्र सुभद्राकुमार अभिमन्युने अपने तीखे बाणोंद्वारा समस्त कौरव-सेनाको अत्यन्त छिन्न-भिन्न कर डाला है; यह देखकर आपके पुत्र और सैनिक भयभीत हो दसों दिशाओंकी ओर देखने लगे। उनके मुख सूख गये थे, नेत्र चंचल हो उठे थे, सारे अंगोंमें पसीना हो आया था और उनके रोंगटे खड़े हो गये थे। अब वे भागनेमें उत्साह दिखाने लगे। शत्रुओंको जीतनेके लिये उनके मनमें तनिक भी उत्साह नहीं रह गया था॥ ४२—४४॥
गोत्रनामभिरन्योन्यं क्रन्दन्तो जीवितैषिणः।
हतान् पुत्रान् पितॄन् भ्रातॄन् बन्धून् सम्बन्धिनस्तथा ॥ ४५ ॥