भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 3027, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 3027

भरतनन्दन! अपने राजाको मारा गया देख धृष्टद्युम्नकी सेनाके सारे क्षत्रिय अत्यन्त शोकमें मग्न हो आर्तस्वरसे विलाप करने लगे ॥ २९ १/२ ॥ तासां तु तेन शब्देन समीपे क्षत्रियर्षभाः ॥ ३० ॥ क्षिप्रं च समनह्यन्त किमेतदिति चाब्रुवन् । स्त्रियोंके रोनेकी आवाज सुनकर आस-पासके सारे क्षत्रियशिरोमणि वीर तुरंत कवच बाँधकर तैयार हो गये और बोले—'अरे! यह क्या हुआ?' ॥ ३० १/२ ॥ स्त्रियस्तु राजन् वित्रस्ता भारद्वाजं निरीक्ष्य ताः ॥ ३१ ॥ अब्रुवन् दीनकण्ठेन क्षिप्रमाद्रवतेति वै । राक्षसो वा मनुष्यो वा नैनं जानीमहे वयम् ॥ ३२ ॥ हत्वा पाञ्चालराजानं रथमारुह्य तिष्ठति । राजन्! वे सारी स्त्रियाँ अश्वत्थामाको देखकर बहुत डर गयी थीं; अतः दीन कण्ठसे बोलीं—'अरे! जल्दी दौड़ो! जल्दी दौड़ो! हमारी समझमें नहीं आता कि यह कोई राक्षस है या मनुष्य। देखो, यह पांचालराजकी हत्या करके रथपर चढ़कर खड़ा है' ॥ ३१-३२ १/२ ॥ ततस्ते योधमुख्याश्च सहसा पर्यवारयन् ॥ ३३ ॥ स तानापततः सर्वान् रुद्रास्त्रेण व्यपोथयत् । तब उन श्रेष्ठ योद्धाओंने सहसा पहुँचकर अश्वत्थामाको चारों ओरसे घेर लिया; परंतु अश्वत्थामाने पास आते ही उन सबको रुद्रास्त्रसे मार गिराया ॥ ३३ १/२ ॥ धृष्टद्युम्नं च हत्वा स तांश्चैवास्य पदानुगान् ॥ ३४ ॥ अपश्यच्छयने सुप्तमुत्तमौजसमन्तिके । इस प्रकार धृष्टद्युम्न और उसके सेवकोंका वध करके अश्वत्थामाने निकटके ही खेमेमें पलंगपर सोये हुए उत्तमौजाको देखा ॥ ३४ १/२ ॥ तमप्याक्रम्य पादेन कण्ठे चोरसि तेजसा ॥ ३५ ॥ तथैव मारयामास विनर्दन्तमरिंदमम् । फिर तो शत्रुदमन उत्तमौजाके भी कण्ठ और छातीको बलपूर्वक पैरसे दबाकर उसने उसी प्रकार पशुकी तरह मार डाला। वह बेचारा भी चीखता-चिल्लाता रह गया था ॥ ३५ १/२ ॥ युधामन्युश्च सम्प्राप्तो मत्वा तं रक्षसा हतम् ॥ ३६ ॥ गदामुद्यम्य वेगेन हृदि द्रौणिमताडयत् । उत्तमौजाको राक्षसद्वारा मारा गया समझकर युधामन्यु भी वहाँ आ पहुँचा। उसने बड़े वेगसे गदा उठाकर अश्वत्थामाकी छातीमें प्रहार किया ॥ ३६ १/२ ॥ तमभिद्रुत्य जग्राह क्षितौ चैनमपातयत् ॥ ३७ ॥ विस्फुरन्तं च पशुवत् तथैवेनममारयत् ।