महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
भरतनन्दन! अपने राजाको मारा गया देख धृष्टद्युम्नकी सेनाके सारे क्षत्रिय अत्यन्त शोकमें मग्न हो आर्तस्वरसे विलाप करने लगे ॥ २९ १/२ ॥ तासां तु तेन शब्देन समीपे क्षत्रियर्षभाः ॥ ३० ॥ क्षिप्रं च समनह्यन्त किमेतदिति चाब्रुवन् । स्त्रियोंके रोनेकी आवाज सुनकर आस-पासके सारे क्षत्रियशिरोमणि वीर तुरंत कवच बाँधकर तैयार हो गये और बोले—'अरे! यह क्या हुआ?' ॥ ३० १/२ ॥ स्त्रियस्तु राजन् वित्रस्ता भारद्वाजं निरीक्ष्य ताः ॥ ३१ ॥ अब्रुवन् दीनकण्ठेन क्षिप्रमाद्रवतेति वै । राक्षसो वा मनुष्यो वा नैनं जानीमहे वयम् ॥ ३२ ॥ हत्वा पाञ्चालराजानं रथमारुह्य तिष्ठति । राजन्! वे सारी स्त्रियाँ अश्वत्थामाको देखकर बहुत डर गयी थीं; अतः दीन कण्ठसे बोलीं—'अरे! जल्दी दौड़ो! जल्दी दौड़ो! हमारी समझमें नहीं आता कि यह कोई राक्षस है या मनुष्य। देखो, यह पांचालराजकी हत्या करके रथपर चढ़कर खड़ा है' ॥ ३१-३२ १/२ ॥ ततस्ते योधमुख्याश्च सहसा पर्यवारयन् ॥ ३३ ॥ स तानापततः सर्वान् रुद्रास्त्रेण व्यपोथयत् । तब उन श्रेष्ठ योद्धाओंने सहसा पहुँचकर अश्वत्थामाको चारों ओरसे घेर लिया; परंतु अश्वत्थामाने पास आते ही उन सबको रुद्रास्त्रसे मार गिराया ॥ ३३ १/२ ॥ धृष्टद्युम्नं च हत्वा स तांश्चैवास्य पदानुगान् ॥ ३४ ॥ अपश्यच्छयने सुप्तमुत्तमौजसमन्तिके । इस प्रकार धृष्टद्युम्न और उसके सेवकोंका वध करके अश्वत्थामाने निकटके ही खेमेमें पलंगपर सोये हुए उत्तमौजाको देखा ॥ ३४ १/२ ॥ तमप्याक्रम्य पादेन कण्ठे चोरसि तेजसा ॥ ३५ ॥ तथैव मारयामास विनर्दन्तमरिंदमम् । फिर तो शत्रुदमन उत्तमौजाके भी कण्ठ और छातीको बलपूर्वक पैरसे दबाकर उसने उसी प्रकार पशुकी तरह मार डाला। वह बेचारा भी चीखता-चिल्लाता रह गया था ॥ ३५ १/२ ॥ युधामन्युश्च सम्प्राप्तो मत्वा तं रक्षसा हतम् ॥ ३६ ॥ गदामुद्यम्य वेगेन हृदि द्रौणिमताडयत् । उत्तमौजाको राक्षसद्वारा मारा गया समझकर युधामन्यु भी वहाँ आ पहुँचा। उसने बड़े वेगसे गदा उठाकर अश्वत्थामाकी छातीमें प्रहार किया ॥ ३६ १/२ ॥ तमभिद्रुत्य जग्राह क्षितौ चैनमपातयत् ॥ ३७ ॥ विस्फुरन्तं च पशुवत् तथैवेनममारयत् ।
अश्वत्थामाने झपटकर उसे पकड़ लिया और पृथ्वीपर दे मारा। वह उसके चंगुलसे छूटनेके लिये बहुतेरा हाथ-पैर मारता रहा; किंतु अश्वत्थामाने उसे भी पशुकी तरह गला घोंटकर मार डाला ।। ३७ १/२ ।। तथा स वीरो हत्वा तं ततोऽन्यान् समुपाद्रवत् ॥ ३८ ॥ संसुप्तानेव राजेन्द्र तत्र तत्र महारथान् । स्फुरतो वेपमानांश्च शमितेव पशून् मखे ॥ ३९ ॥ राजेन्द्र! इस प्रकार युधामन्युका वध करके वीर अश्वत्थामाने अन्य महारथियोंपर भी वहाँ सोते समय ही आक्रमण किया। वे सब भयसे काँपने और छटपटाने लगे। परंतु जैसे हिंसाप्रधान यज्ञमें वधके लिये नियुक्त हुआ पुरुष पशुओंको मार डालता है, उसी प्रकार उसने भी उन्हें मार डाला ॥ ३८-३९ ॥ ततो निस्त्रिंशमादाय जघानान्यान् पृथक् पृथक् । भागशो विचरन् मार्गानसियुद्धविशारदः ॥ ४० ॥ तदनन्तर तलवारसे युद्ध करनेमें कुशल अश्वत्थामाने हाथमें खड्ग लेकर प्रत्येक भागमें विभिन्न मार्गोंसे विचरते हुए वहाँ बारी-बारीसे अन्य वीरोंका भी वध कर डाला ॥ ४० ॥ तथैव गुल्मे सम्प्रेक्ष्य शयानान् मध्यगौल्मिकान् । श्रान्तान् व्यस्तायुधान् सर्वान् क्षणेनैव व्यपोथयत् ॥ ४१ ॥ इसी प्रकार खेमेमें मध्य श्रेणीके रक्षक सैनिक भी थककर सो रहे थे। उनके अस्त्र-शस्त्र अस्त-व्यस्त होकर पड़े थे। उन सबको उस अवस्थामें देखकर अश्वत्थामाने क्षणभरमें मार डाला ॥ ४१ ॥ योधान्श्चान् द्विपांश्चैव प्राच्छिनत् स वरासिना । रुधिरोक्षितसर्वाङ्गः कालसृष्ट इवान्तकः ॥ ४२ ॥ उसने अपनी अच्छी तलवारसे योद्धाओं, घोड़ों और हाथियोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले। उसके सारे अंग खूनसे लथपथ हो रहे थे, वह कालप्रेरित यमराजके समान जान पड़ता था ॥ ४२ ॥ विस्फुरद्भिश्च तैर्द्रोणिर्निस्त्रिंशस्योद्यमेन च । आक्षेपणेन चैवासेस्त्रिधा रक्तोक्षितोऽभवत् ॥ ४३ ॥ मारे जानेवाले योद्धाओंका हाथ-पैर हिलाना, उन्हें मारनेके लिये तलवारको उठाना तथा उसके द्वारा सब ओर प्रहार करना—इन तीन कारणोंसे द्रोणपुत्र अश्वत्थामा खूनसे नहा गया था ॥ ४३ ॥ तस्य लोहितरक्तस्य दीप्तखड्गस्य युध्यतः । अमानुष इवाकारो बभौ परमभीषणः ॥ ४४ ॥ वह खूनसे रँग गया था। जूझते हुए उस वीरकी तलवार चमक रही थी। उस समय उसका आकार मानवेतर प्राणीके समान अत्यन्त भयंकर प्रतीत होता था ॥ ४४ ॥
ये त्वजाग्रन्त कौरव्य तेऽपि शब्देन मोहिताः । निरीक्ष्यमाणा अन्योन्यं दृष्ट्वा दृष्ट्वा प्रविव्यथुः ॥ ४५ ॥ कुरुनन्दन! जो जाग रहे थे, वे भी उस कोलाहलसे किंकर्तव्यविमूढ हो गये थे। परस्पर देखे जाते हुए वे सभी सैनिक अश्वत्थामाको देख-देखकर व्यथित हो रहे थे ॥ ४५ ॥
तद् रूपं तस्य ते दृष्ट्वा क्षत्रियाः शत्रुकर्षणः । राक्षसं मन्यमानास्तं नयनानि न्यमीलयन् ॥ ४६ ॥ वे शत्रुसूदन क्षत्रिय अश्वत्थामाका वह रूप देख उसे राक्षस समझकर आँखें मूँद लेते थे ॥ ४६ ॥
स घोररूपो व्यचरत् कालवच्छिविरे ततः । अपश्यद् द्रौपदीपुत्रानवशिष्टांश्च सोमकान् ॥ ४७ ॥ वह भयानक रूपधारी द्रोणकुमार सारे शिविरमें कालके समान विचरने लगा। उसने द्रौपदीके पाँचों पुत्रों और मरनेसे बचे हुए सोमकोंको देखा ॥ ४७ ॥
तेन शब्देन वित्रस्ता धनुर्हस्ता महारथाः । धृष्टद्युम्नं हतं श्रुत्वा द्रौपदेया विशाम्पते ॥ ४८ ॥ प्रजानाथ! धृष्टद्युम्नको मारा गया सुनकर द्रौपदीके पाँचों महारथी पुत्र उस शब्दसे भयभीत हो हाथमें धनुष लिये आगे बढ़े ॥ ४८ ॥
अवाकिरन् शरव्रातैर्भारद्वाजमभीतवत् । ततस्तेन निनादेन सम्प्रबुद्धाः प्रभद्रकाः ॥ ४९ ॥ शिलीमुखैः शिखण्डी च द्रोणपुत्रं समार्दयन् । उन्होंने निर्भय-से होकर अश्वत्थामापर बाण-समूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी। तदनन्तर वह कोलाहल सुनकर वीर प्रभद्रकगण जाग उठे। शिखण्डी भी उनके साथ हो लिया। उन सबने द्रोणपुत्रको पीड़ा देना आरम्भ किया ॥ ४९ १/२ ॥
भारद्वाजः स तान् दृष्ट्वा शरवर्षाणि वर्षतः ॥ ५० ॥ ननाद बलवन्नादं जिघांसुस्तान् महारथान् । उन महारथियोंको बाणोंकी वर्षा करते देख अश्वत्थामा उन्हें मार डालनेकी इच्छासे जोर-जोरसे गर्जना करने लगा ॥ ५० १/२ ॥
ततः परमसंक्रुद्धः पितुर्वधमनुस्मरन् ॥ ५१ ॥ अवरुह्य रथोपस्थात् त्वरमाणोऽभिदुद्रुवे । सहस्रचन्द्रविमलं गृहीत्वा चर्म संयुगे ॥ ५२ ॥ खड्गं च विमलं दिव्यं जातरूपपरिष्कृतम् । तदनन्तर पिताके वधका स्मरण करके वह अत्यन्त कुपित हो उठा और रथकी बैठकसे उतरकर सहस्रों चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त चमकीली ढाल और सुवर्णभूषित दिव्य एवं निर्मल खड्ग लेकर युद्धमें बड़ी उतावलीके साथ उनकी ओर दौड़ा ॥ ५१-५२ १/२ ॥
द्रौपदेयानभिद्रुत्य खड्गेन व्यधमद् बली ॥ ५३ ॥ ततः स नरशार्दूलः प्रतिविन्ध्यं महाहवे । कुक्षिदेशेऽवधीद् राजन् स हतो न्यपतद् भुवि ॥ ५४ ॥ उस बलवान् वीरने द्रौपदीके पुत्रोंपर आक्रमण करके उन्हें खड्गसे छिन्न-भिन्न कर दिया। राजन्! उस समय पुरुषसिंह अश्वत्थामाने उस महासमरमें प्रतिविन्ध्यको उसकी कोखमें तलवार भोंककर मार डाला। वह मरकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ५३-५४ ॥
प्रासेन विद्ध्वा द्रौणिं तु सुतसोमः प्रतापवान् । पुनश्चासिं समुद्यम्य द्रोणपुत्रमुपाद्रवत् ॥ ५५ ॥ तत्पश्चात् प्रतापी सुतसोमने द्रोणकुमारको पहले प्राससे घायल करके फिर तलवार उठाकर उसपर धावा किया ॥ ५५ ॥
सुतसोमस्य सासिं तं बाहुं छित्त्वा नरर्षभ । पुनरप्याहनत् पार्श्वे स भिन्नहृदयोऽपतत् ॥ ५६ ॥ नरश्रेष्ठ! तब अश्वत्थामाने तलवारसहित सुतसोमकी बाँह काटकर पुनः उसकी पसलीमें आघात किया। इससे उसकी छाती फट गयी और वह धराशायी हो गया ॥ ५६ ॥
नाकुलिस्तु शतानीको रथचक्रेण वीर्यवान् । दोर्भ्यामुत्क्षिप्य वेगेन वक्षस्येनमताडयत् ॥ ५७ ॥ इसके बाद नकुलके पराक्रमी पुत्र शतानीकने अपनी दोनों भुजाओंसे रथचक्रको उठाकर उसके द्वारा बड़े वेगसे अश्वत्थामाकी छातीपर प्रहार किया ॥ ५७ ॥
अताडयच्छतानीकं मुक्तचक्रं द्विजस्तु सः । स विह्वलो ययौ भूमिं ततोऽस्यापाहरच्छिरः ॥ ५८ ॥ शतानीकने जब चक्र चला दिया, तब ब्राह्मण अश्वत्थामाने भी उसपर गहरा आघात किया। इससे व्याकुल होकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। इतनेहीमें अश्वत्थामाने उसका सिर काट लिया ॥ ५८ ॥
श्रुतकर्मा तु परिघं गृहीत्वा समताडयत् । अभिद्रुत्य ययौ द्रौणिं सव्ये सफलके भृशम् ॥ ५९ ॥ अब श्रुतकर्मा परिघ लेकर अश्वत्थामाकी ओर दौड़ा। उसने उसके ढालयुक्त बायें हाथमें भारी चोट पहुँचायी ॥ ५९ ॥
स तु तं श्रुतकर्मार्णमास्ये जघ्ने वरासिना । स हतो न्यपतद् भूमौ विमूढो विकृताननः ॥ ६० ॥ अश्वत्थामाने अपनी तेज तलवारसे श्रुतकर्माके मुखपर आघात किया। वह चोट खाकर बेहोश हो पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय उसका मुख विकृत हो गया था ॥ ६० ॥
तेन शब्देन वीरस्तु श्रुतकीर्तिर्महारथः । अश्वत्थामानमासाद्य शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ६१ ॥
वह कोलाहल सुनकर वीर महारथी श्रुतकीर्ति अश्वत्थामाके पास आकर उसके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगा ।। ६१ ।।
तस्यापि शरवर्षाणि चर्मणा प्रतिवार्य सः ।
सकुण्डलं शिरः कायाद् भ्राजमानमुपाहरत् ।। ६२ ।।
उसकी बाण-वर्षाको ढालसे रोककर अश्वत्थामाने उसके कुण्डलमण्डित तेजस्वी मस्तकको धड़से अलग कर दिया ।। ६२ ।।
ततो भीष्मनिहन्ता तं सह सर्वैः प्रभद्रकैः ।
अहनत् सर्वतो वीरं नानाप्रहरणैर्बली ।। ६३ ।।
शिलीमुखेन चान्येन भ्रुवोर्मध्ये समापर्यत् ।
तदनन्तर समस्त प्रभद्रकोंसहित बलवान् भीष्महन्ता शिखण्डी नाना प्रकारके अस्त्रोंद्वारा अश्वत्थामापर सब ओरसे प्रहार करने लगा तथा एक दूसरे बाणसे उसने उसकी दोनों भौंहोंके बीचमें आघात किया ।। ६३ १/२ ।।
स तु क्रोधसमाविष्टो द्रोणपुत्रो महाबलः ।। ६४ ।।
शिखण्डिनं समासाद्य द्विधा चिच्छेद सोऽसिना ।
तब महाबली द्रोणपुत्रने क्रोधके आवेशमें आकर शिखण्डीके पास जा अपनी तलवारसे उसके दो टुकड़े कर डाले ।। ६४ १/२ ।।
शिखण्डिनं ततो हत्वा क्रोधाविष्टः परंतपः ।। ६५ ।।
प्रभद्रकगणान् सर्वानभिदुद्राव वेगवान् ।
यच्च शिष्टं विराटस्य बलं तु भृशमाद्रवत् ।। ६६ ।।
क्रोधसे भरे हुए शत्रुसंतापी अश्वत्थामाने इस प्रकार शिखण्डीका वध करके समस्त प्रभद्रकोंपर बड़े वेगसे धावा किया। साथ ही, राजा विराटकी जो सेना शेष थी, उसपर भी जोरसे चढ़ाई कर दी ।। ६५-६६ ।।
द्रुपदस्य च पुत्राणां पौत्राणां सुहृदामपि ।
चकार कदनं घोरं दृष्ट्वा दृष्ट्वा महाबलः ।। ६७ ।।
उस महाबली वीरने द्रुपदके पुत्रों, पौत्रों और सुहृदोंको ढूँढ़-ढूँढ़कर उनका घोर संहार मचा दिया ।।
अन्यानन्यांश्च पुरुषानभिसृत्याभिसृत्य च ।
न्यकृन्तदसिना द्रौणिरसिमार्गविशारदः ।। ६८ ।।
तलवारके पैंतरोंमें कुशल द्रोणपुत्रने दूसरे-दूसरे पुरुषोंके भी निकट जाकर तलवारसे ही उनके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ।। ६८ ।।
कालीं रक्तास्यनयनां रक्तमाल्यानुलेपनाम् ।
रक्ताम्बरधरामेकां पाशहस्तां कुटुम्बिनीम् ।। ६९ ।।
ददृशुः कालरात्रिं ते गायमानामवस्थिताम् ।
नरांश्चकुञ्जरान् पाशैर्बद्ध्वा घोरैः प्रतस्थुषीम् ॥ ७० ॥ उस समय पाण्डवपक्षके योद्धाओंने मूर्तिमती कालरात्रिको देखा, जिसके शरीरका रंग काला था, मुख और नेत्र लाल थे। वह लाल फूलोंकी माला पहने और लाल चन्दन लगाये हुए थी। उसने लाल रंगकी ही साड़ी पहन रखी थी। वह अपने ढंगकी अकेली थी और हाथमें पाश लिये हुए थी। उसकी सखियोंका समुदाय भी उसके साथ था। वह गीत गाती हुई खड़ी थी और भयंकर पाशोंद्वारा मनुष्यों, घोड़ों एवं हाथियोंको बाँधकर लिये जाती थी ॥ ६९-७० ॥
वहन्तीं विविधान् प्रेतान् पाशबद्धान् विमूर्धजान् । तथैव च सदा राजन् न्यस्तशस्त्रान् महारथान् ॥ ७१ ॥ स्वप्ने सुप्तान्रायन्तीं तां रात्रिष्वन्यासु मारिष । ददृशुर्योधमुख्यास्ते घ्नन्तं द्रौणिं च सर्वदा ॥ ७२ ॥ माननीय नरेश! मुख्य-मुख्य योद्धा अन्य रात्रियोंमें भी सपनेमें उस कालरात्रिको देखते थे। राजन्! वह सदा नाना प्रकारके केशरहित प्रेतोंको अपने पाशोंमें बाँधकर लिये जाती दिखायी देती थी, इसी प्रकार हथियार डालकर सोये हुए महारथियोंको भी लिये जाती हुई स्वप्नमें दृष्टिगोचर होती थी। वे योद्धा सबका संहार करते हुए द्रोणकुमारको भी सदा सपनोंमें देखा करते थे ॥ ७१-७२ ॥
यतः प्रभृति संग्रामः कुरुपाण्डवसेनयोः । ततः प्रभृति तां कन्यामपश्यन् द्रौणिमेव च ॥ ७३ ॥ तांस्तु दैवहतान् पूर्वं पश्चाद् द्रौणिर्व्यपातयत् । त्रासयन् सर्वभूतानि विनदन् भैरवान् रवान् ॥ ७४ ॥ जबसे कौरव-पाण्डव सेनाओंका संग्राम आरम्भ हुआ था, तभीसे वे योद्धा कन्यारूपिणी कालरात्रिको और कालरूपधारी अश्वत्थामाको भी देखा करते थे। पहलेसे ही दैवके मारे हुए उन वीरोंका द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने पीछे वध किया था। वह अश्वत्थामा भयानक स्वरसे गर्जना करके समस्त प्राणियोंको भयभीत कर रहा था ॥
तदनुस्मृत्य ते वीरा दर्शनं पूर्वकालिकम् । इदं तदित्यमन्यन्त दैवेनोपनिपीड़िताः ॥ ७५ ॥ वे दैवपीड़ित वीरगण पूर्वकालके देखे हुए सपनेको याद करके ऐसा मानने लगे कि 'यह वही स्वप्न इस रूपमें सत्य हो रहा है' ॥ ७५ ॥
ततस्तेन निनादेन प्रत्यबुध्यन्त धन्विनः । शिबिरे पाण्डवेयानां शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ७६ ॥ तदनन्तर अश्वत्थामाके उस सिंहनादसे पाण्डवोंके शिविरमें सैकड़ों और हजारों धनुर्धर वीर जाग उठे ॥
सोऽच्छिनत् कस्यचित् पादौ जघनं चैव कस्यचित् ।
कांश्चिद् बिभेद पार्श्वेषु कालसृष्ट इवान्तकः ।। ७७ ।।
उस समय कालप्रेरित यमराजके समान उसने किसीके पैर काट लिये, किसीकी कमर टूक-टूक कर दी और किन्हींकी पसलियोंमें तलवार भोंककर उन्हें चीर डाला ।। ७७ ।।
अत्युग्रप्रतिपिष्टैश्च नदद्भिश्च भृशोत्कटैः ।
गजाश्वमथितैश्चान्यैर्मही कीर्णाभवत् प्रभो ।। ७८ ।।
वे सब-के-सब भयानक रूपसे कुचल दिये गये थे, अतः उन्मत्त-से होकर जोर-जोरसे चीखते और चिल्लाते थे। इसी प्रकार छूटे हुए घोड़ों और हाथियोंने भी अन्य बहुत-से योद्धाओंको कुचल दिया था। प्रभो! उन सबकी लाशोंसे धरती पट गयी थी ।। ७८ ।।
क्रोशतां किमिदं कोऽयं कः शब्दः किं नु किं कृतम् ।
एवं तेषां तथा द्रौणिरन्तकः समपद्यत ।। ७९ ।।
घायल वीर चिल्ला-चिल्लाकर कहते थे कि 'यह क्या है? यह कौन है? यह कैसा कोलाहल हो रहा है? यह क्या कर डाला?' इस प्रकार चीखते हुए उन सब योद्धाओंके लिये द्रोणकुमार अश्वत्थामा काल बन गया था ।। ७९ ।।
अपेतशस्त्रसन्नाहान् सन्नद्धान् पाण्डुसंजयान् ।
प्राहिणोन्मृत्युलोकाय द्रौणिः प्रहरतां वरः ।। ८० ।।
पाण्डवों और संजयोंमेंसे जिन्होंने अस्त्र-शस्त्र और कवच उतार दिये थे तथा जिन लोगोंने पुनः कवच बाँध लिये थे, उन सबको प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ द्रोणपुत्रने मृत्युके लोकमें भेज दिया ।। ८० ।।
ततस्तच्छब्दवित्रस्ता उत्पतन्तो भयातुराः ।
निद्रान्धा नष्टसंज्ञाश्च तत्र तत्र निलिल्यिरे ।। ८१ ।।
जो लोग नींदके कारण अंधे और अचेत-से हो रहे थे, वे उसके शब्दसे चौंककर उछल पड़े; किंतु पुनः भयसे व्याकुल हो जहाँ-तहाँ छिप गये ।। ८१ ।।
ऊरुस्तम्भगृहीताश्च कश्मलाभिहतौजसः ।
विनदन्तो भृशं त्रस्ताः समासीदन् परस्परम् ।। ८२ ।।
उनकी जाँघें अकड़ गयी थीं। मोहवश उनका बल और उत्साह मारा गया था। वे भयभीत हो जोर-जोरसे चीखते हुए एक-दूसरेसे लिपट जाते थे ।। ८२ ।।
ततो रथं पुनद्रौणिरास्थितो भीमनिःस्वनम् ।
धनुष्पाणिः शरैरन्यान् प्रैषयद् वै यमक्षयम् ।। ८३ ।।
इसके बाद द्रोणकुमार अश्वत्थामा पुनः भयानक शब्द करनेवाले अपने रथपर सवार हुआ और हाथमें धनुष ले बाणोंद्वारा दूसरे योद्धाओंको यमलोक भेजने लगा ।।
पुनरुत्पततश्चापि दूरादपि नरोत्तमान् ।
शूरान् सम्पततश्चान्यान् कालरात्र्यै न्यवेदयत् ।। ८४ ।।
अश्वत्थामा पुनः उछलने और अपने ऊपर आक्रमण करनेवाले दूसरे-दूसरे नरश्रेष्ठ शूरवीरोंको दूरसे भी मारकर कालरात्रिके हवाले कर देता था ।। तथैव स्यन्दनाग्रेण प्रमथन् स विधावति । शरवर्षैश्च विविधैर्वर्षञ्छात्रांस्ततः ।। ८५ ।। वह अपने रथके अग्रभागसे शत्रुओंको कुचलता हुआ सब ओर दौड़ लगाता और नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षासे शत्रुसैनिकोंको घायल करता था ।। ८५ ।। पुनश्च सुविचित्रेण शतचन्द्रेण चर्मणा । तेन चाकाशवर्णेन तथाचरत सोऽसिना ।। ८६ ।। फिर वह सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त विचित्र ढाल और आकाशके रंगवाली चमचमाती तलवार लेकर सब ओर विचरने लगा ।। ८६ ।। तथा च शिबिरं तेषां द्रौणिराहवदुर्मदः । व्यक्षोभयत राजेन्द्र महाह्रदमिव द्विपः ।। ८७ ।। राजेन्द्र! रणदुर्मद द्रोणकुमारने उन शत्रुओंके शिविरको उसी प्रकार मथ डाला, जैसे कोई गजराज किसी विशाल सरोवरको विक्षुब्ध कर डालता है ।। ८७ ।। उत्पेतुस्तेन शब्देन योधा राजन् विचेतसः । निद्रार्ताश्च भयार्ताश्च व्यधावन्त ततस्ततः ।। ८८ ।। राजन्! उस मार-काटके कोलाहलसे निद्रामें अचेत पड़े हुए योद्धा चौंककर उछल पड़ते और भयसे व्याकुल हो इधर-उधर भागने लगते थे ।। ८८ ।। विस्वरं चुक्रुशुश्चान्ये बह्वबद्धं तथा वदन् । न च स्म प्रत्यपद्यन्त शस्त्राणि वसनानि च ।। ८९ ।। कितने ही योद्धा गला फाड़-फाड़कर चिल्लाते और बहुत-सी ऊटपटाँग बातें बकने लगते थे। वे अपने अस्त्र-शस्त्र तथा वस्त्रोंको भी नहीं ढूँढ़ पाते थे ।। ८९ ।। विमुक्तकेशाश्चाप्यन्ये नाभ्यजानन् परस्परम् । उत्पतन्तोऽपतन् श्रान्ताः केचित् तत्राभ्रमंस्तदा ।। ९० ।। दूसरे बहुत-से योद्धा बाल बिखेरे हुए भागते थे। उस दशामें वे एक-दूसरेको पहचान नहीं पाते थे। कोई उछलते हुए भागते और थककर गिर जाते थे तथा कोई उसी स्थानपर चक्कर काटते रहते थे ।। ९० ।। पुरीषमसृजन् केचित् केचिन्मूत्रं प्रसुस्रुवुः । बन्धनानि च राजेन्द्र संच्छिद्य तुरगा द्विपाः ।। ९१ ।। समं पर्यपतंश्चान्ये कुर्वन्तो महदाकुलम् । कितने ही मलत्याग करने लगे। कितनोंके पेशाब झड़ने लगे। राजेन्द्र! दूसरे बहुत-से घोड़े और हाथी बन्धन तोड़कर एक साथ ही सब ओर दौड़ने और लोगोंको अत्यन्त व्याकुल करने लगे ।। ९१ १/२ ।।
तत्र केचिन्नरा भीता व्यलीयन्त महीतले ।। ९२ ।। तथैव तान् निपतितानपिंषन् गजवाजिनः । कितने ही योद्धा भयभीत हो पृथ्वीपर छिपे पड़े थे। उन्हें उसी अवस्थामें भागते हुए घोड़ों और हाथियोंने अपने पैरोंसे कुचल दिया ।। ९२ १/२ ।। तस्मिंस्तथा वर्तमाने रक्षांसि पुरुषर्षभ ।। ९३ ।। हृष्टानि व्यनदन्नुच्चैर्मुदा भरतसत्तम । पुरुषप्रवर! भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार जब वह मार-काट मची हुई थी, उस समय हर्षमें भरे हुए राक्षस बड़े जोर-जोरसे गर्जना करते थे ।। ९३ १/२ ।। स शब्दः पूरितो राजन् भूतसंघैर्मुदायुतैः ।। ९४ ।। अपूरयद् दिशः सर्वा दिवं चातिमहान् स्वनः । राजन्! आनन्दमग्न हुए भूतसमुदायोंके द्वारा किया हुआ वह महान् कोलाहल सम्पूर्ण दिशाओं तथा आकाशमें गूँज उठा ।। ९४ १/२ ।। तेषामार्तरवं श्रुत्वा वित्रस्ता गजवाजिनः ।। ९५ ।। मुक्ताः पर्यपतन् राजन् मृद्नन्तः शिबिरे जनम् । राजन्! मारे जानेवाले योद्धाओंका आर्तनाद सुनकर हाथी और घोड़े भयसे थर्रा उठे और बन्धनमुक्त हो शिविरमें रहनेवाले लोगोंको रौंदते हुए चारों ओर दौड़ लगाने लगे ।। ९५ १/२ ।। तैस्तत्र परिधावद्भिश्चरणोदीरितं रजः ।। ९६ ।। अकरोच्छिबिरे तेषां रजन्यां द्विगुणं तमः । उन दौड़ते हुए घोड़ों और हाथियोंने अपने पैरोंसे जो धूल उड़ायी थी, उसने पाण्डवोंके शिविरमें रात्रिके अन्धकारको दुगुना कर दिया ।। ९६ १/२ ।। तस्मिंस्तमसि संजाते प्रमूढाः सर्वतो जनाः ।। ९७ ।। नाजानन् पितरः पुत्रान् भ्रातॄन् भ्रातर एव च । वह घोर अन्धकार फैल जानेपर वहाँ सब लोगोंपर मोह छा गया। उस समय पिता पुत्रोंको और भाई भाइयोंको नहीं पहचान पाते थे ।। ९७ १/२ ।। गजा गजानतिक्रम्य निर्मनुष्या हया हयान् ।। ९८ ।। अताडयंस्तथाभञ्जंस्तथामृद्नंश्च भारत । भारत! हाथी हाथियोंपर और बिना सवारके घोड़े घोड़ोंपर आक्रमण करके एक-दूसरेपर चोट करने लगे। उन्होंने अंग-भंग करके एक-दूसरेको रौंद डाला ।। ९८ १/२ ।। ते भग्नाः प्रपतन्ति स्म निघ्नन्तश्च परस्परम् ।। ९९ ।। न्यपातयंस्तथा चान्यान् पातयित्वा तदापिषन् ।
परस्पर आघात करते हुए वे हाथी, घोड़े स्वयं भी घायल होकर गिर जाते थे तथा दूसरोंको भी गिरा देते और गिराकर उनका कचूमर निकाल देते थे ।। ९९ १/२ ।। विचेतसः सनिद्राश्च तमसा चावृता नराः ।। १०० ।। जग्मुः स्वानेव तत्राथ कालेनैव प्रचोदिताः । कितने ही मनुष्य निद्रामें अचेत पड़े थे और घोर अन्धकारसे घिर गये थे। वे सहसा उठकर कालसे प्रेरित हो आत्मीय जनोंका ही वध करने लगे ।। १०० १/२ ।। त्यक्त्वा द्वाराणि च द्वाःस्थास्तथा गुल्मानि गौल्मिकाः ।। १०१ ।। प्राद्रवन्त यथाशक्ति कांदिशीका विचेतसः । द्वारपाल दरवाजोंको और तम्बूकी रक्षा करनेवाले सैनिक तम्बूओंको छोड़कर यथाशक्ति भागने लगे। वे सब-के-सब अपनी सुध-बुध खो बैठे थे और यह भी नहीं जानते थे कि ‘उन्हें किस दिशामें भागकर जाना है’ ।। १०१ १/२ ।। विप्रणष्टाश्च तेऽन्योन्यं नाजानन्त तथा विभो ।। १०२ ।। क्रोशन्तस्तात पुत्रेति दैवोपहतचेतसः । प्रभो! वे भागे हुए सैनिक एक-दूसरेको पहचान नहीं पाते थे। दैववश उनकी बुद्धि मारी गयी थी। वे ‘हा तात! हा पुत्र!’ कहकर अपने स्वजनोंको पुकार रहे थे ।। १०२ १/२ ।। पलायतां दिशस्तेषां स्वानप्युत्सृज्य बान्धवान् ।। १०३ ।। गोत्रनामभिरन्योन्यमाक्रन्दन्त ततो जनाः । हाहाकारं च कुर्वाणाः पृथिव्यां शेरते परे ।। १०४ ।। अपने सगे सम्बन्धियोंको भी छोड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें भागते हुए योद्धाओंके नाम और गोत्रको पुकार-पुकारकर लोग परस्पर बुला रहे थे। कितने ही मनुष्य हाहाकार करते हुए धरतीपर पड़ गये थे ।। तान् बुद्ध्वा रणमत्तोऽसौ द्रोणपुत्रो व्यपोथयत् । तत्रापरे वध्यमाना मुहुर्मुहुरचेतसः ।। १०५ ।। शिबिरान् निष्पतन्ति स्म क्षत्रिया भयपीडिताः । युद्धके लिये उन्मत्त हुआ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा उन सबको पहचान-पहचानकर मार गिराता था। बारंबार उसकी मार खाते हुए दूसरे बहुत-से क्षत्रिय भयसे पीड़ित और अचेत हो शिविरसे बाहर निकलने लगे ।। १०५ १/२ ।। तांस्तु निष्पतितांस्त्रस्तान् शिबिराज्जीवितैषिणः ।। १०६ ।। कृतवर्मा कृपश्चैव द्वारदेशे निजघ्नतुः । प्राण बचानेकी इच्छासे भयभीत हो शिविरसे निकले हुए उन क्षत्रियोंको कृतवर्मा और कृपाचार्यने दरवाजेपर ही मार डाला ।। १०६ १/२ ।। विस्रस्तयन्त्रकवचान् मुक्तकेशान् कृताञ्जलीन् ।। १०७ ।।
वेपमानान् क्षितौ भीतान् नैव कांश्चिदमुञ्चताम् । नामुच्यत तयोः कश्चिन्निष्क्रान्तः शिबिराद् बहिः ॥ १०८ ॥ उनके यन्त्र और कवच गिर गये थे। वे बाल खोले, हाथ जोड़े, भयभीत हो थरथर काँपते हुए पृथ्वीपर खड़े थे, किंतु उन दोनोंने उनमेंसे किसीको भी जीवित नहीं छोड़ा। शिविरसे निकला हुआ कोई भी क्षत्रिय उन दोनोंके हाथसे जीवित नहीं छूट सका ॥
कृपश्चैव महाराज हार्दिक्यश्चैव दुर्मतिः । भूयश्चैव चिकीर्षन्तौ द्रोणपुत्रस्य तौ प्रियम् ॥ १०९ ॥ त्रिषु देशेषु ददतुः शिबिरस्य हुताशनम् । महाराज! कृपाचार्य तथा दुर्बुद्धि कृतवर्मा दोनों ही द्रोणपुत्र अश्वत्थामाका अधिक-से-अधिक प्रिय करना चाहते थे; अतः उन्होंने उस शिविरमें तीन ओरसे आग लगा दी ॥ १०९ १/२ ॥
ततः प्रकाशे शिबिरे खड्गेन पितृनन्दनः ॥ ११० ॥ अश्वत्थामा महाराज व्यचरत् कृतहस्तवत् । महाराज! उससे सारे शिविरमें उजाला हो गया और उस उजालेमें पिताको आनन्दित करनेवाला अश्वत्थामा हाथमें खड्ग लिये एक सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति बेखटके विचरने लगा ॥ ११० १/२ ॥
कांश्चिदापततो वीरानपरांश्चैव धावतः ॥ १११ ॥ व्ययोजयत खड्गेन प्राणैर्द्विजवरोत्तमः । उस समय कुछ वीर क्षत्रिय आक्रमण कर रहे थे और दूसरे पीठ दिखाकर भागे जा रहे थे। ब्राह्मणशिरोमणि अश्वत्थामाने उन दोनों ही प्रकारके योद्धाओंको तलवारसे मारकर प्राणहीन कर दिया ॥ १११ १/२ ॥
कांश्चिद् योधान् स खड्गेन मध्ये संछिद्य वीर्यवान् ॥ ११२ ॥ अपातयद् द्रोणपुत्रः संरब्धस्तिलकाण्डवत् । क्रोधसे भरे हुए शक्तिशाली द्रोणपुत्रने कुछ योद्धाओंको तिलके डंठलोंकी भाँति बीचसे ही तलवारसे काट गिराया ॥ ११२ १/२ ॥
निनदद्भिर्भृशायस्तैर्नराश्वद्विरदोत्तमैः ॥ ११३ ॥ पतितैरभवत् कीर्णा मेदिनी भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! अत्यन्त घायल हो पृथ्वीपर गिरकर चिल्लाते हुए मनुष्यों, घोड़ों और बड़े-बड़े हाथियोंसे वहाँकी भूमि ढँक गयी थी ॥ ११३ १/२ ॥
मानुषाणां सहस्रेषु हतेषु पतितेषु च ॥ ११४ ॥ उदतिष्ठन् कबन्धानि बहून्युत्थाय चापतन् ।
सहस्रों मनुष्य मारे जाकर पृथ्वीपर पड़े थे। उनमेंसे बहुतेरे कबन्ध (धड़) उठकर खड़े हो जाते और पुनः गिर पड़ते थे ॥ ११४ १/२ ॥
सायुधान् साङ्गदान् बाहून् विचकर्त शिरांसि च ॥ ११५ ॥
हस्तिहस्तोपमानूरून् हस्तान् पादांश्च भारत ।
भारत! उसने आयुधों और भुजबंदोंसहित बहुत-सी भुजाओं तथा मस्तकोंको काट डाला। हाथीकी सूँड़के समान दिखायी देनेवाली जाँघों, हाथों और पैरोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ११५ १/२ ॥
पृष्ठच्छिन्नान् पार्श्वच्छिन्नान् शिरश्छिन्नांस्तथा परान् ॥ ११६ ॥
स महात्माकरोद् द्रौणिः कांश्चिच्चापि पराङ्मुखान् ।
महामनस्वी द्रोणकुमारने किन्हींकी पीठ काट डाली, किन्हींकी पसलियाँ उड़ा दीं, किन्हींके सिर उतार लिये तथा कितनोंको उसने मार भगाया ॥ ११६ १/२ ॥
मध्यदेशे नरानन्यांश्छिच्छेदान्यांश्च कर्णतः ॥ ११७ ॥
अंसदेशे निहत्यान्यान् काये प्रावेशयच्छिरः ।
बहुत-से मनुष्योंको अश्वत्थामाने कटिभागसे ही काट डाला और कितनोंको कर्णहीन कर दिया। दूसरे-दूसरे योद्धाओंके कंधेपर चोट करके उनके सिरको धड़में घुसेड़ दिया ॥ ११७ १/२ ॥
एवं विचरतस्तस्य निघ्नतः सुबहून् नरान् ॥ ११८ ॥
तमसा रजनी घोरा बभौ दारुणदर्शना ।
इस प्रकार अनेकों मनुष्योंका संहार करता हुआ वह शिविरमें विचरण करने लगा। उस समय दारुण दिखायी देनेवाली वह रात्रि अन्धकारके कारण और भी घोर तथा भयानक प्रतीत होती थी ॥ ११८ १/२ ॥
किञ्चित्प्राणैश्च पुरुषैर्हतैश्चान्यैः सहस्रशः ॥ ११९ ॥
बहुना च गजाश्वेन भूरभूद् भीमदर्शना ।
मरे और अधमरे सहस्रों मनुष्यों और बहुसंख्यक हाथी-घोड़ोंसे पटी हुई भूमि बड़ी डरावनी दिखायी देती थी ॥ ११९ १/२ ॥
यक्षरक्षःसमाकीर्णे रथाश्वद्विपदारुणे ॥ १२० ॥
क्रुद्धेन द्रोणपुत्रेण संछन्नाः प्रापतन् भुवि ।
यक्षों तथा राक्षसोंसे भरे हुए एवं रथों, घोड़ों और हाथियोंसे भयंकर दिखायी देनेवाले रणक्षेत्रमें कुपित हुए द्रोणपुत्रके हाथोंसे कटकर कितने ही क्षत्रिय पृथ्वीपर पड़े थे ॥ १२० १/२ ॥
भ्रातॄनन्ये पितॄनन्ये पुत्रानन्ये विचुक्रुशुः ॥ १२१ ॥
केचिदूचुर्न तत् क्रुद्धैर्धार्तराष्ट्रैः कृतं रणे ।
यत् कृतं नः प्रसुप्तानां रक्षोभिः क्रूरकर्मभिः ॥ १२२ ॥ कुछ लोग भाइयोंको, कुछ पिताओंको और दूसरे लोग पुत्रोंको पुकार रहे थे। कुछ लोग कहने लगे—'भाइयो! रोषमें भरे हुए धृतराष्ट्रके पुत्रोंने भी रणभूमिमें हमारी वैसी दुर्गति नहीं की थी, जो आज इन क्रूरकर्मा राक्षसोंने हम सोये हुए लोगोंकी कर डाली है ॥
असांनिध्याद्धि पार्थानामिदं नः कदनं कृतम् । न चासुरैर्न गन्धर्वैर्न यक्षैर्न च राक्षसैः ॥ १२३ ॥ शक्यो विजेतुं कौन्तेयो गोप्ता यस्य जनार्दनः । ब्रह्मण्यः सत्यवाग् दान्तः सर्वभूतानुकम्पकः ॥ १२४ ॥ 'आज कुन्तीके पुत्र हमारे पास नहीं हैं, इसीलिये हमलोगोंका यह संहार किया गया है। कुन्तीपुत्र अर्जुनको तो असुर, गन्धर्व, यक्ष तथा राक्षस कोई भी नहीं जीत सकते; क्योंकि साक्षात् श्रीकृष्ण उनके रक्षक हैं। वे ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, जितेन्द्रिय तथा सम्पूर्ण भूतोंपर दया करनेवाले हैं ॥ १२३-१२४ ॥
न च सुप्तं प्रमत्तं वा न्यस्तशस्त्रं कृताञ्जलिम् । धावन्तं मुक्तकेशं वा हन्ति पार्थो धनंजयः ॥ १२५ ॥ 'कुन्तीनन्दन अर्जुन सोये हुए, असावधान, शस्त्रहीन, हाथ जोड़े हुए, भागते हुए अथवा बाल खोलकर दीनता दिखाते हुए मनुष्यको कभी नहीं मारते हैं ॥ १२५ ॥
तदिदं नः कृतं घोरं रक्षोभिः क्रूरकर्मभिः । इति लालप्यमानाः स्म शेरते बहवो जनाः ॥ १२६ ॥ 'आज क्रूरकर्मा राक्षसोंद्वारा हमारी यह भयंकर दुर्दशा की गयी है।' इस प्रकार विलाप करते हुए बहुत-से मनुष्य रणभूमिमें सो रहे थे ॥ १२६ ॥
स्तनतां च मनुष्याणामपरेषां च कूजताम् । ततो मुहूर्तात् प्राशाम्यत् स शब्दस्तुमुलो महान् ॥ १२७ ॥ तदनन्तर दो ही घड़ीमें कराहते और विलाप करते हुए मनुष्योंका वह भयंकर कोलाहल शान्त हो गया ॥
शोणितव्यतिषिक्तायां वसुधायां च भूमिप । तद्रजस्तुमुलं घोरं क्षणेनान्तरधीयत ॥ १२८ ॥ राजन्! खूनसे भीगी हुई पृथ्वीपर गिरकर वह भयानक धूल क्षणभरमें अदृश्य हो गयी ॥ १२८ ॥
स चेष्टमानानूद्विग्नान् निरुत्साहान् सहस्रशः । न्यपातयन्नरान् क्रुद्धः पशून् पशुपतिर्यथा ॥ १२९ ॥ जैसे प्रलयके समय क्रोधमें भरे हुए पशुपति रुद्र समस्त पशुओं (प्राणियों)-का संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार कुपित हुए अश्वत्थामाने ऐसे सहस्रों मनुष्योंको भी मार डाला,
जो किसी प्रकार प्राण बचानेके प्रयत्नमें लगे हुए थे, एकदम घबराये हुए थे और सारा उत्साह खो बैठे थे ॥ १२९ ॥
अन्योन्यं सम्परिष्वज्य शयानान् द्रवतोऽपरान् ।
संलीनान् युद्ध्यमानांश्च सर्वान् द्रौणिरपोथयत् ॥ १३० ॥
कुछ लोग एक-दूसरेसे लिपटकर सो रहे थे, दूसरे भाग रहे थे, तीसरे छिप गये थे और चौथी श्रेणीके लोग जूझ रहे थे, उन सबको द्रोणकुमारने वहाँ मार गिराया ॥
दह्यमाना हुताशेन वध्यमानाश्च तेन ते ।
परस्परं तदा योधा अनयन् यमसादनम् ॥ १३१ ॥
एक ओर लोग आगसे जल रहे थे और दूसरी ओर अश्वत्थामाके हाथसे मारे जाते थे, ऐसी दशामें वे सब योद्धा स्वयं ही एक-दूसरेको यमलोक भेजने लगे ॥
तस्या रजन्यास्त्वर्धेन पाण्डवानां महत् बलम् ।
गमयामास राजेन्द्र द्रौणिर्यमनिवेशनम् ॥ १३२ ॥
राजेन्द्र! उस रातका आधा भाग बीतते-बीतते द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने पाण्डवोंकी उस विशाल सेनाको यमराजके घर भेज दिया ॥ १३२ ॥
निशाचराणां सत्त्वानां रात्रिः सा हर्षवर्धिनी ।
आसीन्नरगजाश्वानां रौद्री क्षयकरी भृशम् ॥ १३३ ॥
वह भयानक रात्रि निशाचर प्राणियोंका हर्ष बढ़ानेवाली थी और मनुष्यों, घोड़ों तथा हाथियोंके लिये अत्यन्त विनाशकारिणी सिद्ध हुई ॥ १३३ ॥
तत्रादृश्यन्त रक्षांसि पिशाचाश्च पृथग्विधाः ।
खादन्तो नरमांसानि पिबन्तः शोणितानि च ॥ १३४ ॥
वहाँ नाना प्रकारकी आकृतिवाले बहुत-से राक्षस और पिशाच मनुष्योंके मांस खाते और खून पीते दिखायी देते थे ॥ १३४ ॥
करालाः पिङ्गलाश्चैव शैलदन्ता रजस्वलाः ।
जटिला दीर्घशङ्खाश्च पञ्चपादा महोदराः ॥ १३५ ॥
वे बड़े ही विकराल और पिंगलवर्णके थे। उनके दाँत पहाड़ों-जैसे जान पड़ते थे। वे सारे अंगोंमें धूल लपेटे और सिरपर जटा रखाये हुए थे। उनके माथेकी हड्डी बहुत बड़ी थी। उनके पाँच-पाँच पैर और बड़े-बड़े पेट थे ॥ १३५ ॥
पश्चादङ्गुलयो रूक्षा विरूपा भैरवस्वनाः ।
घण्टाजालावसक्ताश्च नीलकण्ठा विभीषणाः ॥ १३६ ॥
सपुत्रदाराः सक्रूराः सुदुर्दर्शाः सुनिर्घृणाः ।
विविधानि च रूपाणि तत्रादृश्यन्त रक्षसाम् ॥ १३७ ॥
उनकी अंगुलियाँ पीछेकी ओर थीं। वे रूखे, कुरूप और भयंकर गर्जना करनेवाले थे। बहुतोंने घंटोंकी मालाएँ पहन रखी थीं। उनके गलेमें नील चिह्न था। वे बड़े भयानक
दिखायी देते थे। उनके स्त्री और पुत्र भी साथ ही थे। वे अत्यन्त क्रूर और निर्दय थे। उनकी ओर देखना भी बहुत कठिन था। वहाँ उन राक्षसोंके भाँति-भाँतिके रूप दृष्टिगोचर हो रहे थे॥
पीत्वा च शोणितं हृष्टाः प्रानृत्यन् गणशोऽपरे ।
इदं परमिदं मेध्यमिदं स्वाद्विति चाब्रुवन् ॥ १३८ ॥
कोई रक्त पीकर हर्षसे खिल उठे थे। दूसरे अलग-अलग झुंड बनाकर नाच रहे थे। वे आपसमें कहते थे—‘यह उत्तम है, यह पवित्र है और यह बहुत स्वादिष्ट है’ ॥ १३८ ॥
मेदोमज्जास्थिरक्तानां वसानां च भृशाशिताः ।
परमांसानि खादन्तः क्रव्यादा मांसजीविनः ॥ १३९ ॥
मेदा, मज्जा, हड्डी, रक्त और चर्बीका विशेष आहार करनेवाले मांसजीवी राक्षस एवं हिंसक जन्तु दूसरोंके मांस खा रहे थे ॥ १३९ ॥
वसाश्चैवापरे पीत्वा पर्यधावन् विकुक्षिकाः ।
नानावक्त्रास्तथा रौद्राः क्रव्यादाः पिशिताशनाः ॥ १४० ॥
दूसरे कुक्षिरहित राक्षस चर्वियोंका पान करके चारों ओर दौड़ लगा रहे थे। कच्चा मांस खानेवाले उन भयंकर राक्षसोंके अनेक मुख थे ॥ १४० ॥
अयुतानि च तत्रासन् प्रयुतान्यर्बुदानि च ।
रक्षसां घोररूपाणां महतां क्रूरकर्मणाम् ॥ १४१ ॥
मुदितानां वितृप्तानां तस्मिन् महति वैशसे ।
समेतानि बहून्यासन् भूतानि च जनाधिप ॥ १४२ ॥
वहाँ उस महान् जनसंहारमें तृप्त और आनन्दित हुए क्रूर कर्म करनेवाले घोर रूपधारी महाकाय राक्षसोंके कई दल थे। किसी दलमें दस हजार, किसीमें एक लाख और किसीमें एक अर्बुद (दस लाख) राक्षस थे। नरेश्वर! वहाँ और भी बहुत-से मांसभक्षी प्राणी एकत्र हो गये थे ॥ १४१-१४२ ॥
प्रत्यूषकाले शिबिरात् प्रतिगन्तुमियेष सः ।
नृशोणितावसिक्तस्य द्रौणेरासीदसित्सरुः ॥ १४३ ॥
पाणिना सह संश्लिष्ट एकीभूत इव प्रभो ।
प्रातःकाल पौ फटते ही अश्वत्थामाने शिविरसे बाहर निकल जानेका विचार किया। प्रभो! उस समय नररक्तसे नहाये हुए अश्वत्थामाके हाथसे सटकर उसकी तलवारकी मूठ ऐसी जान पड़ती थी, मानो वह उससे अभिन्न हो ॥ १४३ १/२ ॥
दुर्गामां पदवीं गत्वा विरराज जनक्षये ॥ १४४ ॥
युगान्ते सर्वभूतानि भस्म कृत्वेव पावकः ।
जैसे प्रलयकालमें आग सम्पूर्ण प्राणियोंको भस्म करके प्रकाशित होती है, उसी प्रकार वह नरसंहार हो जानेपर अपने दुर्गम लक्ष्यतक पहुँचकर अश्वत्थामा अधिक शोभा पाने लगा ।। १४४ १/२ ।।
यथाप्रतिज्ञं तत् कर्म कृत्वा द्रौणायनिः प्रभो ।। १४५ ।।
दुर्गामां पदवीं गच्छन् पितुरासीद् गतज्वरः ।
नरेश्वर! अपने पिताके दुर्गम पथपर चलता हुआ द्रोणकुमार अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार सारा कार्य पूर्ण करके शोक और चिन्तासे रहित हो गया ।। १४५ १/२ ।।
यथैव संसुप्तजने शिबिरे प्राविशन्निशि ।। १४६ ।।
तथैव हत्वा निःशब्दे निष्चक्राम नरर्षभः ।
जिस प्रकार रातके समय सबके सो जानेपर शान्त शिविरमें उसने प्रवेश किया था, उसी प्रकार वह नरश्रेष्ठ वीर सबको मारकर कोलाहलशून्य हुए शिविरसे बाहर निकला ।। १४६ १/२ ।।
निष्क्रम्य शिबिरात् तस्मात् ताभ्यां संगम्य वीर्यवान् ।। १४७ ।।
आचख्यौ कर्म तत् सर्वं हृष्टः संहर्षयन् विभो ।
प्रभो! उस शिविरसे निकलकर शक्तिशाली अश्वत्थामा उन दोनोंसे मिला और स्वयं हर्षमग्न हो उन दोनोंका हर्ष बढ़ाते हुए उसने अपना किया हुआ सारा कर्म उनसे कह सुनाया ।। १४७ १/२ ।।
तावथाचख्यतुस्तस्मै प्रियं प्रियकरौ तदा ।। १४८ ।।
पञ्चालान् सृञ्जयांश्चैव विनिकृत्तान् सहस्रशः ।
अश्वत्थामाका प्रिय करनेवाले उन दोनों वीरोंने भी उस समय उससे यह प्रिय समाचार निवेदन किया कि हम दोनोंने भी सहस्रों पांचालों और सृंजयोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले हैं ।। १४८ १/२ ।।
प्रीत्या चोच्चैरदक्रोशंस्तथैवास्फोटयंस्तलान् ।। १४९ ।।
एवंविधा हि सा रात्रिः सोमकानां जनक्षये ।
प्रसुप्तानां प्रमत्तानामासीत् सुभृशदारुणा ।। १५० ।।
फिर तो वे तीनों प्रसन्नताके मारे उच्चस्वरसे गर्जने और ताल ठोकने लगे। इस प्रकार वह रात्रि उस जन-संहारकी वेलामें असावधान होकर सोये हुए सोमकोंके लिये अत्यन्त भयंकर सिद्ध हुई ।। १४९-१५० ।।
असंशयं हि कालस्य पर्यायो दुरतिक्रमः ।
तादृशा निहता यत्र कृत्वास्माकं जनक्षयम् ।। १५१ ।।
राजन्! इसमें संशय नहीं कि कालकी गतिका उल्लंघन करना अत्यन्त कठिन है। जहाँ हमारे पक्षके लोगोंका संहार करके विजयको प्राप्त हुए वैसे-वैसे वीर मार डाले
गये ।। १५१ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
प्रागेव सुमहत् कर्म द्रौणिरेतन्महारथः ।
नाकरोदीदृशं कस्मान्मत्पुत्रविजये धृतः ॥ १५२ ॥
**राजा धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! अश्वत्थामा तो मेरे पुत्रको विजय दिलानेका दृढ़ निश्चय कर चुका था। फिर उस महारथी वीरने पहले ही ऐसा महान् पराक्रम क्यों नहीं किया? ।। १५२ ।।
अथ कस्माद्धते क्षुद्रं कर्मेदं कृतवानसौ ।
द्रोणपुत्रो महात्मा स तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ १५३ ॥
जब दुर्योधन मार डाला गया, तब उस महामनस्वी द्रोणपुत्रने ऐसा नीच कर्म क्यों किया? यह सब मुझे बताओ ।। १५३ ।।
संजय उवाच
तेषां नूनं भयान्नासौ कृतवान् कुरुनन्दन ।
असांनिध्याद्धि पार्थानां केशवस्य च धीमतः ॥ १५४ ॥
सात्यकेश्चापि कर्मेदं द्रोणपुत्रेण साधितम् ।
**संजयने कहा—**कुरुनन्दन! अश्वत्थामाको पाण्डव, श्रीकृष्ण और सात्यकिसे सदा भय बना रहता था; इसीलिये पहले उसने ऐसा नहीं किया। इस समय कुन्तीके पुत्र, बुद्धिमान् श्रीकृष्ण तथा सात्यकिके दूर चले जानेसे अश्वत्थामाने अपना यह कार्य सिद्ध कर लिया ।। १५४ १/२ ।।
को हि तेषां समक्षं तान् हन्यादपि मरुत्पतिः ॥ १५५ ॥
एतदीदृशकं वृत्तं राजन् सुप्तजने विभो ।
उन पाण्डव आदिके समक्ष कौन उन्हें मार सकता था? साक्षात् देवराज इन्द्र भी उस दशामें उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे। प्रभो! नरेश्वर! उस रात्रिमें सब लोगोंके सो जानेपर यह इस प्रकारकी घटना घटित हुई ।।
ततो जनक्षयं कृत्वा पाण्डवानां महात्ययम् ॥ १५६ ॥
दिष्ट्या दिष्ट्यैव चान्योन्यं समेत्योचुर्महारथाः ।
उस समय पाण्डवोंके लिये महान् विनाशकारी जनसंहार करके वे तीनों महारथी जब परस्पर मिले, तब आपसमें कहने लगे—'बड़े सौभाग्यसे यह कार्य सिद्ध हुआ है' ।।
पर्यष्वजत् ततो द्रौणिस्ताभ्यां सम्प्रतिनन्दितः ॥ १५७ ॥
इदं हर्षात् तु सुमहदाददे वाक्यमुत्तमम् ।
तदनन्तर उन दोनोंका अभिनन्दन स्वीकार करके द्रोणपुत्रने उन्हें हृदयसे लगाया और बड़े हर्षसे यह महत्त्वपूर्ण उत्तम वचन मुँहसे निकाला— ।। १५७ १/२ ।।
पञ्चाला निहताः सर्वे द्रौपदेयाश्च सर्वशः ॥ १५८ ॥
सोमका मत्स्यशेषाश्च सर्वे विनिहता मया ।
‘सारे पांचाल, द्रौपदीके सभी पुत्र, सोमकवंशी क्षत्रिय तथा मत्स्य देशके अवशिष्ट सैनिक ये सभी मेरे हाथसे मारे गये ॥ १५८ १/३ ॥
इदानीं कृतकृत्याः स्म याम तत्रैव मा चिरम् ।
यदि जीवति नो राजा तस्मै शंसमहे वयम् ॥ १५९ ॥
‘इस समय हम कृतकृत्य हो गये। अब हमें शीघ्र वहीं चलना चाहिये। यदि हमारे राजा दुर्योधन जीवित हों तो हम उन्हें भी यह समाचार कह सुनावें’ ॥ १५९ ॥
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि रात्रियुद्धे पाञ्चालादिवधेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें पांचाल आदिका वधविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल १५९ १/३ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 3045)
नवमोऽध्यायः
दुर्योधनकी दशा देखकर कृपाचार्य और अश्वत्थामाका विलाप तथा उनके मुखसे पांचालोंके वधका वृत्तान्त जानकर दुर्योधनका प्रसन्न होकर प्राणत्याग करना
संजय उवाच
ते हत्वा सर्वपञ्चालान् द्रौपदेयांश्च सर्वशः ।
आगच्छन् सहितास्तत्र यत्र दुर्योधनो हतः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! वे तीनों महारथी समस्त पांचालों और द्रौपदीके सभी पुत्रोंका वध करके एक साथ उस स्थानमें आये, जहाँ राजा दुर्योधन मारा गया था ॥ १ ॥
गत्वा चैनमपश्यन्त किञ्चित्प्राणं जनाधिपम् ।
ततो रथेभ्यः प्रस्कन्द्य परिवव्रुस्तवात्मजम् ॥ २ ॥
वहाँ जाकर उन्होंने राजा दुर्योधनको देखा, उसकी कुछ-कुछ साँस चल रही थी। फिर वे रथोंसे कूद पड़े और आपके पुत्रके पास जा उसे सब ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ २ ॥
तं भग्नसक्थं राजेन्द्र कृच्छ्रप्राणमचेतसम् ।
वमन्तं रुधिरं वक्त्रादपश्यन् वसुधातले ॥ ३ ॥
वृतं समन्ताद् बहुभिः श्वापदैर्घोरदर्शनैः ।
शालावृकगणैश्चैव भक्षयिष्यद्भिरन्तिकात् ॥ ४ ॥
निवारयन्तं कृच्छ्रात्तान् श्वापदांश्च चिखादिषून् ।
विचेष्टमानं मह्यां च सुभृशं गाढवेदनम् ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! उन्होंने देखा कि राजाकी जाँघें टूट गयी हैं। ये बड़े कष्टसे प्राण धारण करते हैं। इनकी चेतना लुप्त-सी हो गयी है और ये अपने मुँहसे पृथ्वीपर खून उगल रहे हैं। इन्हें चट कर जानेके लिये बहुत-से भयंकर दिखायी देनेवाले हिंसक जीव और कुत्ते चारों ओरसे घेरकर आसपास ही खड़े हैं। ये अपनेको खा जानेकी इच्छा रखनेवाले उन हिंसक जन्तुओंको बड़ी कठिनाईसे रोकते हैं। इन्हें बड़ी भारी पीड़ा हो रही है, जिसके कारण ये पृथ्वीपर पड़े-पड़े छटपटा रहे हैं ॥
तं शयानं तथा दृष्ट्वा भूमौ सुरुधिरोक्षितम् ।
हतशिष्टास्त्रयो वीराः शोकार्ताः पर्यवारयन् ॥ ६ ॥
अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ।
दुर्योधनको इस प्रकार खूनसे लथपथ हो पृथ्वीपर पड़ा देख मरनेसे बचे हुए वे तीनों वीर अश्वत्थामा, कृपाचार्य और सात्वतवंशी कृतवर्मा शोकसे व्याकुल हो उसे तीन ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ ६ १/२ ॥
तैस्त्रिभिः शोणितादिग्धैर्निःश्वसद्भिर्महारथैः ॥ ७ ॥
शुशुभे स वृतो राजा वेदी त्रिभिरिवाग्निभिः ।
वे तीनों महारथी वीर खूनसे रँग गये थे और लंबी साँसें खींच रहे थे। उनसे घिरा हुआ राजा दुर्योधन तीन अग्नियोंसे घिरी हुई वेदीके समान सुशोभित हो रहा था ॥
ते तं शयानं सम्प्रेक्ष्य राजानमथथोचितम् ॥ ८ ॥
अविषह्येन दुःखेन ततस्ते रुरुदुस्त्रयः ।
राजाको इस प्रकार अयोग्य अवस्थामें सोया देख वे तीनों असह्य दुःखसे पीड़ित हो रोने लगे ॥ ८ १/२ ॥
ततस्तु रुधिरं हस्तैर्मुखान्निर्मृज्य तस्य हि ।
रणे राज्ञः शयानस्य कृपणं पर्यदेवयन् ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् रणभूमिमें सोये हुए राजा दुर्योधनके मुखसे बहते हुए रक्तको हाथोंसे पोंछकर वे तीनों दीन वाणीमें विलाप करने लगे ॥ ९ ॥
कृप उवाच
न दैवस्यातिभारोऽस्ति यदयं रुधिरोक्षितः ।
एकादशचमूभर्ता शेते दुर्योधनो हतः ॥ १० ॥
**कृपाचार्य बोले—**हाय! विधाताके लिये कुछ भी करना कठिन नहीं है। जो कभी ग्यारह अक्षौहिणी सेनाके स्वामी थे, वे ही ये राजा दुर्योधन यहाँ मारे जाकर खूनसे लथपथ हुए पड़े हैं ॥ १० ॥
पश्य चामीकराभास्य चामीकरविभूषिताम् ।
गदां गदाप्रियस्येमां समीपे पतितां भुवि ॥ ११ ॥
देखो, सुवर्णके समान कान्तिवाले इन गदाप्रेमी नरेशके समीप यह सुवर्णभूषित गदा पृथ्वीपर पड़ी है ॥
इयमेनं गदा शूरं न जहाति रणे रणे ।
स्वर्गायापि व्रजन्तं हि न जहाति यशस्विनम् ॥ १२ ॥
यह गदा इन शूरवीर भूपालका साथ किसी भी युद्धमें नहीं छोड़ती थी और आज स्वर्गलोकमें जाते समय भी यशस्वी नरेशका साथ नहीं छोड़ रही है ॥
पश्येमां सह वीरेण जाम्बूनदविभूषिताम् ।
शयानां शयने हर्म्ये भार्यां प्रीतिमतीमिव ॥ १३ ॥