महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे प्रलयकालमें आग सम्पूर्ण प्राणियोंको भस्म करके प्रकाशित होती है, उसी प्रकार वह नरसंहार हो जानेपर अपने दुर्गम लक्ष्यतक पहुँचकर अश्वत्थामा अधिक शोभा पाने लगा ।। १४४ १/२ ।।
यथाप्रतिज्ञं तत् कर्म कृत्वा द्रौणायनिः प्रभो ।। १४५ ।।
दुर्गामां पदवीं गच्छन् पितुरासीद् गतज्वरः ।
नरेश्वर! अपने पिताके दुर्गम पथपर चलता हुआ द्रोणकुमार अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार सारा कार्य पूर्ण करके शोक और चिन्तासे रहित हो गया ।। १४५ १/२ ।।
यथैव संसुप्तजने शिबिरे प्राविशन्निशि ।। १४६ ।।
तथैव हत्वा निःशब्दे निष्चक्राम नरर्षभः ।
जिस प्रकार रातके समय सबके सो जानेपर शान्त शिविरमें उसने प्रवेश किया था, उसी प्रकार वह नरश्रेष्ठ वीर सबको मारकर कोलाहलशून्य हुए शिविरसे बाहर निकला ।। १४६ १/२ ।।
निष्क्रम्य शिबिरात् तस्मात् ताभ्यां संगम्य वीर्यवान् ।। १४७ ।।
आचख्यौ कर्म तत् सर्वं हृष्टः संहर्षयन् विभो ।
प्रभो! उस शिविरसे निकलकर शक्तिशाली अश्वत्थामा उन दोनोंसे मिला और स्वयं हर्षमग्न हो उन दोनोंका हर्ष बढ़ाते हुए उसने अपना किया हुआ सारा कर्म उनसे कह सुनाया ।। १४७ १/२ ।।
तावथाचख्यतुस्तस्मै प्रियं प्रियकरौ तदा ।। १४८ ।।
पञ्चालान् सृञ्जयांश्चैव विनिकृत्तान् सहस्रशः ।
अश्वत्थामाका प्रिय करनेवाले उन दोनों वीरोंने भी उस समय उससे यह प्रिय समाचार निवेदन किया कि हम दोनोंने भी सहस्रों पांचालों और सृंजयोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले हैं ।। १४८ १/२ ।।
प्रीत्या चोच्चैरदक्रोशंस्तथैवास्फोटयंस्तलान् ।। १४९ ।।
एवंविधा हि सा रात्रिः सोमकानां जनक्षये ।
प्रसुप्तानां प्रमत्तानामासीत् सुभृशदारुणा ।। १५० ।।
फिर तो वे तीनों प्रसन्नताके मारे उच्चस्वरसे गर्जने और ताल ठोकने लगे। इस प्रकार वह रात्रि उस जन-संहारकी वेलामें असावधान होकर सोये हुए सोमकोंके लिये अत्यन्त भयंकर सिद्ध हुई ।। १४९-१५० ।।
असंशयं हि कालस्य पर्यायो दुरतिक्रमः ।
तादृशा निहता यत्र कृत्वास्माकं जनक्षयम् ।। १५१ ।।
राजन्! इसमें संशय नहीं कि कालकी गतिका उल्लंघन करना अत्यन्त कठिन है। जहाँ हमारे पक्षके लोगोंका संहार करके विजयको प्राप्त हुए वैसे-वैसे वीर मार डाले