महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3041, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिखायी देते थे। उनके स्त्री और पुत्र भी साथ ही थे। वे अत्यन्त क्रूर और निर्दय थे। उनकी ओर देखना भी बहुत कठिन था। वहाँ उन राक्षसोंके भाँति-भाँतिके रूप दृष्टिगोचर हो रहे थे॥
पीत्वा च शोणितं हृष्टाः प्रानृत्यन् गणशोऽपरे ।
इदं परमिदं मेध्यमिदं स्वाद्विति चाब्रुवन् ॥ १३८ ॥
कोई रक्त पीकर हर्षसे खिल उठे थे। दूसरे अलग-अलग झुंड बनाकर नाच रहे थे। वे आपसमें कहते थे—‘यह उत्तम है, यह पवित्र है और यह बहुत स्वादिष्ट है’ ॥ १३८ ॥
मेदोमज्जास्थिरक्तानां वसानां च भृशाशिताः ।
परमांसानि खादन्तः क्रव्यादा मांसजीविनः ॥ १३९ ॥
मेदा, मज्जा, हड्डी, रक्त और चर्बीका विशेष आहार करनेवाले मांसजीवी राक्षस एवं हिंसक जन्तु दूसरोंके मांस खा रहे थे ॥ १३९ ॥
वसाश्चैवापरे पीत्वा पर्यधावन् विकुक्षिकाः ।
नानावक्त्रास्तथा रौद्राः क्रव्यादाः पिशिताशनाः ॥ १४० ॥
दूसरे कुक्षिरहित राक्षस चर्वियोंका पान करके चारों ओर दौड़ लगा रहे थे। कच्चा मांस खानेवाले उन भयंकर राक्षसोंके अनेक मुख थे ॥ १४० ॥
अयुतानि च तत्रासन् प्रयुतान्यर्बुदानि च ।
रक्षसां घोररूपाणां महतां क्रूरकर्मणाम् ॥ १४१ ॥
मुदितानां वितृप्तानां तस्मिन् महति वैशसे ।
समेतानि बहून्यासन् भूतानि च जनाधिप ॥ १४२ ॥
वहाँ उस महान् जनसंहारमें तृप्त और आनन्दित हुए क्रूर कर्म करनेवाले घोर रूपधारी महाकाय राक्षसोंके कई दल थे। किसी दलमें दस हजार, किसीमें एक लाख और किसीमें एक अर्बुद (दस लाख) राक्षस थे। नरेश्वर! वहाँ और भी बहुत-से मांसभक्षी प्राणी एकत्र हो गये थे ॥ १४१-१४२ ॥
प्रत्यूषकाले शिबिरात् प्रतिगन्तुमियेष सः ।
नृशोणितावसिक्तस्य द्रौणेरासीदसित्सरुः ॥ १४३ ॥
पाणिना सह संश्लिष्ट एकीभूत इव प्रभो ।
प्रातःकाल पौ फटते ही अश्वत्थामाने शिविरसे बाहर निकल जानेका विचार किया। प्रभो! उस समय नररक्तसे नहाये हुए अश्वत्थामाके हाथसे सटकर उसकी तलवारकी मूठ ऐसी जान पड़ती थी, मानो वह उससे अभिन्न हो ॥ १४३ १/२ ॥
दुर्गामां पदवीं गत्वा विरराज जनक्षये ॥ १४४ ॥
युगान्ते सर्वभूतानि भस्म कृत्वेव पावकः ।