भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 3043

गये ।। १५१ ।।

धृतराष्ट्र उवाच

प्रागेव सुमहत् कर्म द्रौणिरेतन्महारथः ।
नाकरोदीदृशं कस्मान्मत्पुत्रविजये धृतः ॥ १५२ ॥
**राजा धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! अश्वत्थामा तो मेरे पुत्रको विजय दिलानेका दृढ़ निश्चय कर चुका था। फिर उस महारथी वीरने पहले ही ऐसा महान् पराक्रम क्यों नहीं किया? ।। १५२ ।।

अथ कस्माद्धते क्षुद्रं कर्मेदं कृतवानसौ ।
द्रोणपुत्रो महात्मा स तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ १५३ ॥
जब दुर्योधन मार डाला गया, तब उस महामनस्वी द्रोणपुत्रने ऐसा नीच कर्म क्यों किया? यह सब मुझे बताओ ।। १५३ ।।

संजय उवाच

तेषां नूनं भयान्नासौ कृतवान् कुरुनन्दन ।
असांनिध्याद्धि पार्थानां केशवस्य च धीमतः ॥ १५४ ॥
सात्यकेश्चापि कर्मेदं द्रोणपुत्रेण साधितम् ।
**संजयने कहा—**कुरुनन्दन! अश्वत्थामाको पाण्डव, श्रीकृष्ण और सात्यकिसे सदा भय बना रहता था; इसीलिये पहले उसने ऐसा नहीं किया। इस समय कुन्तीके पुत्र, बुद्धिमान् श्रीकृष्ण तथा सात्यकिके दूर चले जानेसे अश्वत्थामाने अपना यह कार्य सिद्ध कर लिया ।। १५४ १/२ ।।

को हि तेषां समक्षं तान् हन्यादपि मरुत्पतिः ॥ १५५ ॥
एतदीदृशकं वृत्तं राजन् सुप्तजने विभो ।
उन पाण्डव आदिके समक्ष कौन उन्हें मार सकता था? साक्षात् देवराज इन्द्र भी उस दशामें उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे। प्रभो! नरेश्वर! उस रात्रिमें सब लोगोंके सो जानेपर यह इस प्रकारकी घटना घटित हुई ।।

ततो जनक्षयं कृत्वा पाण्डवानां महात्ययम् ॥ १५६ ॥
दिष्ट्या दिष्ट्यैव चान्योन्यं समेत्योचुर्महारथाः ।
उस समय पाण्डवोंके लिये महान् विनाशकारी जनसंहार करके वे तीनों महारथी जब परस्पर मिले, तब आपसमें कहने लगे—'बड़े सौभाग्यसे यह कार्य सिद्ध हुआ है' ।।

पर्यष्वजत् ततो द्रौणिस्ताभ्यां सम्प्रतिनन्दितः ॥ १५७ ॥
इदं हर्षात् तु सुमहदाददे वाक्यमुत्तमम् ।
तदनन्तर उन दोनोंका अभिनन्दन स्वीकार करके द्रोणपुत्रने उन्हें हृदयसे लगाया और बड़े हर्षसे यह महत्त्वपूर्ण उत्तम वचन मुँहसे निकाला— ।। १५७ १/२ ।।