भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3039

यत् कृतं नः प्रसुप्तानां रक्षोभिः क्रूरकर्मभिः ॥ १२२ ॥ कुछ लोग भाइयोंको, कुछ पिताओंको और दूसरे लोग पुत्रोंको पुकार रहे थे। कुछ लोग कहने लगे—'भाइयो! रोषमें भरे हुए धृतराष्ट्रके पुत्रोंने भी रणभूमिमें हमारी वैसी दुर्गति नहीं की थी, जो आज इन क्रूरकर्मा राक्षसोंने हम सोये हुए लोगोंकी कर डाली है ॥

असांनिध्याद्धि पार्थानामिदं नः कदनं कृतम् । न चासुरैर्न गन्धर्वैर्न यक्षैर्न च राक्षसैः ॥ १२३ ॥ शक्यो विजेतुं कौन्तेयो गोप्ता यस्य जनार्दनः । ब्रह्मण्यः सत्यवाग् दान्तः सर्वभूतानुकम्पकः ॥ १२४ ॥ 'आज कुन्तीके पुत्र हमारे पास नहीं हैं, इसीलिये हमलोगोंका यह संहार किया गया है। कुन्तीपुत्र अर्जुनको तो असुर, गन्धर्व, यक्ष तथा राक्षस कोई भी नहीं जीत सकते; क्योंकि साक्षात् श्रीकृष्ण उनके रक्षक हैं। वे ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, जितेन्द्रिय तथा सम्पूर्ण भूतोंपर दया करनेवाले हैं ॥ १२३-१२४ ॥

न च सुप्तं प्रमत्तं वा न्यस्तशस्त्रं कृताञ्जलिम् । धावन्तं मुक्तकेशं वा हन्ति पार्थो धनंजयः ॥ १२५ ॥ 'कुन्तीनन्दन अर्जुन सोये हुए, असावधान, शस्त्रहीन, हाथ जोड़े हुए, भागते हुए अथवा बाल खोलकर दीनता दिखाते हुए मनुष्यको कभी नहीं मारते हैं ॥ १२५ ॥

तदिदं नः कृतं घोरं रक्षोभिः क्रूरकर्मभिः । इति लालप्यमानाः स्म शेरते बहवो जनाः ॥ १२६ ॥ 'आज क्रूरकर्मा राक्षसोंद्वारा हमारी यह भयंकर दुर्दशा की गयी है।' इस प्रकार विलाप करते हुए बहुत-से मनुष्य रणभूमिमें सो रहे थे ॥ १२६ ॥

स्तनतां च मनुष्याणामपरेषां च कूजताम् । ततो मुहूर्तात् प्राशाम्यत् स शब्दस्तुमुलो महान् ॥ १२७ ॥ तदनन्तर दो ही घड़ीमें कराहते और विलाप करते हुए मनुष्योंका वह भयंकर कोलाहल शान्त हो गया ॥

शोणितव्यतिषिक्तायां वसुधायां च भूमिप । तद्रजस्तुमुलं घोरं क्षणेनान्तरधीयत ॥ १२८ ॥ राजन्! खूनसे भीगी हुई पृथ्वीपर गिरकर वह भयानक धूल क्षणभरमें अदृश्य हो गयी ॥ १२८ ॥

स चेष्टमानानूद्विग्नान् निरुत्साहान् सहस्रशः । न्यपातयन्नरान् क्रुद्धः पशून् पशुपतिर्यथा ॥ १२९ ॥ जैसे प्रलयके समय क्रोधमें भरे हुए पशुपति रुद्र समस्त पशुओं (प्राणियों)-का संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार कुपित हुए अश्वत्थामाने ऐसे सहस्रों मनुष्योंको भी मार डाला,