भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 3038

सहस्रों मनुष्य मारे जाकर पृथ्वीपर पड़े थे। उनमेंसे बहुतेरे कबन्ध (धड़) उठकर खड़े हो जाते और पुनः गिर पड़ते थे ॥ ११४ १/२ ॥
सायुधान् साङ्गदान् बाहून् विचकर्त शिरांसि च ॥ ११५ ॥
हस्तिहस्तोपमानूरून् हस्तान् पादांश्च भारत ।
भारत! उसने आयुधों और भुजबंदोंसहित बहुत-सी भुजाओं तथा मस्तकोंको काट डाला। हाथीकी सूँड़के समान दिखायी देनेवाली जाँघों, हाथों और पैरोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ११५ १/२ ॥
पृष्ठच्छिन्नान् पार्श्वच्छिन्नान् शिरश्छिन्नांस्तथा परान् ॥ ११६ ॥
स महात्माकरोद् द्रौणिः कांश्चिच्चापि पराङ्मुखान् ।
महामनस्वी द्रोणकुमारने किन्हींकी पीठ काट डाली, किन्हींकी पसलियाँ उड़ा दीं, किन्हींके सिर उतार लिये तथा कितनोंको उसने मार भगाया ॥ ११६ १/२ ॥
मध्यदेशे नरानन्यांश्छिच्छेदान्यांश्च कर्णतः ॥ ११७ ॥
अंसदेशे निहत्यान्यान् काये प्रावेशयच्छिरः ।
बहुत-से मनुष्योंको अश्वत्थामाने कटिभागसे ही काट डाला और कितनोंको कर्णहीन कर दिया। दूसरे-दूसरे योद्धाओंके कंधेपर चोट करके उनके सिरको धड़में घुसेड़ दिया ॥ ११७ १/२ ॥
एवं विचरतस्तस्य निघ्नतः सुबहून् नरान् ॥ ११८ ॥
तमसा रजनी घोरा बभौ दारुणदर्शना ।
इस प्रकार अनेकों मनुष्योंका संहार करता हुआ वह शिविरमें विचरण करने लगा। उस समय दारुण दिखायी देनेवाली वह रात्रि अन्धकारके कारण और भी घोर तथा भयानक प्रतीत होती थी ॥ ११८ १/२ ॥
किञ्चित्प्राणैश्च पुरुषैर्हतैश्चान्यैः सहस्रशः ॥ ११९ ॥
बहुना च गजाश्वेन भूरभूद् भीमदर्शना ।
मरे और अधमरे सहस्रों मनुष्यों और बहुसंख्यक हाथी-घोड़ोंसे पटी हुई भूमि बड़ी डरावनी दिखायी देती थी ॥ ११९ १/२ ॥
यक्षरक्षःसमाकीर्णे रथाश्वद्विपदारुणे ॥ १२० ॥
क्रुद्धेन द्रोणपुत्रेण संछन्नाः प्रापतन् भुवि ।
यक्षों तथा राक्षसोंसे भरे हुए एवं रथों, घोड़ों और हाथियोंसे भयंकर दिखायी देनेवाले रणक्षेत्रमें कुपित हुए द्रोणपुत्रके हाथोंसे कटकर कितने ही क्षत्रिय पृथ्वीपर पड़े थे ॥ १२० १/२ ॥
भ्रातॄनन्ये पितॄनन्ये पुत्रानन्ये विचुक्रुशुः ॥ १२१ ॥
केचिदूचुर्न तत् क्रुद्धैर्धार्तराष्ट्रैः कृतं रणे ।