महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3037, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंवेपमानान् क्षितौ भीतान् नैव कांश्चिदमुञ्चताम् । नामुच्यत तयोः कश्चिन्निष्क्रान्तः शिबिराद् बहिः ॥ १०८ ॥ उनके यन्त्र और कवच गिर गये थे। वे बाल खोले, हाथ जोड़े, भयभीत हो थरथर काँपते हुए पृथ्वीपर खड़े थे, किंतु उन दोनोंने उनमेंसे किसीको भी जीवित नहीं छोड़ा। शिविरसे निकला हुआ कोई भी क्षत्रिय उन दोनोंके हाथसे जीवित नहीं छूट सका ॥
कृपश्चैव महाराज हार्दिक्यश्चैव दुर्मतिः । भूयश्चैव चिकीर्षन्तौ द्रोणपुत्रस्य तौ प्रियम् ॥ १०९ ॥ त्रिषु देशेषु ददतुः शिबिरस्य हुताशनम् । महाराज! कृपाचार्य तथा दुर्बुद्धि कृतवर्मा दोनों ही द्रोणपुत्र अश्वत्थामाका अधिक-से-अधिक प्रिय करना चाहते थे; अतः उन्होंने उस शिविरमें तीन ओरसे आग लगा दी ॥ १०९ १/२ ॥
ततः प्रकाशे शिबिरे खड्गेन पितृनन्दनः ॥ ११० ॥ अश्वत्थामा महाराज व्यचरत् कृतहस्तवत् । महाराज! उससे सारे शिविरमें उजाला हो गया और उस उजालेमें पिताको आनन्दित करनेवाला अश्वत्थामा हाथमें खड्ग लिये एक सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति बेखटके विचरने लगा ॥ ११० १/२ ॥
कांश्चिदापततो वीरानपरांश्चैव धावतः ॥ १११ ॥ व्ययोजयत खड्गेन प्राणैर्द्विजवरोत्तमः । उस समय कुछ वीर क्षत्रिय आक्रमण कर रहे थे और दूसरे पीठ दिखाकर भागे जा रहे थे। ब्राह्मणशिरोमणि अश्वत्थामाने उन दोनों ही प्रकारके योद्धाओंको तलवारसे मारकर प्राणहीन कर दिया ॥ १११ १/२ ॥
कांश्चिद् योधान् स खड्गेन मध्ये संछिद्य वीर्यवान् ॥ ११२ ॥ अपातयद् द्रोणपुत्रः संरब्धस्तिलकाण्डवत् । क्रोधसे भरे हुए शक्तिशाली द्रोणपुत्रने कुछ योद्धाओंको तिलके डंठलोंकी भाँति बीचसे ही तलवारसे काट गिराया ॥ ११२ १/२ ॥
निनदद्भिर्भृशायस्तैर्नराश्वद्विरदोत्तमैः ॥ ११३ ॥ पतितैरभवत् कीर्णा मेदिनी भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! अत्यन्त घायल हो पृथ्वीपर गिरकर चिल्लाते हुए मनुष्यों, घोड़ों और बड़े-बड़े हाथियोंसे वहाँकी भूमि ढँक गयी थी ॥ ११३ १/२ ॥
मानुषाणां सहस्रेषु हतेषु पतितेषु च ॥ ११४ ॥ उदतिष्ठन् कबन्धानि बहून्युत्थाय चापतन् ।