महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3036, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरस्पर आघात करते हुए वे हाथी, घोड़े स्वयं भी घायल होकर गिर जाते थे तथा दूसरोंको भी गिरा देते और गिराकर उनका कचूमर निकाल देते थे ।। ९९ १/२ ।। विचेतसः सनिद्राश्च तमसा चावृता नराः ।। १०० ।। जग्मुः स्वानेव तत्राथ कालेनैव प्रचोदिताः । कितने ही मनुष्य निद्रामें अचेत पड़े थे और घोर अन्धकारसे घिर गये थे। वे सहसा उठकर कालसे प्रेरित हो आत्मीय जनोंका ही वध करने लगे ।। १०० १/२ ।। त्यक्त्वा द्वाराणि च द्वाःस्थास्तथा गुल्मानि गौल्मिकाः ।। १०१ ।। प्राद्रवन्त यथाशक्ति कांदिशीका विचेतसः । द्वारपाल दरवाजोंको और तम्बूकी रक्षा करनेवाले सैनिक तम्बूओंको छोड़कर यथाशक्ति भागने लगे। वे सब-के-सब अपनी सुध-बुध खो बैठे थे और यह भी नहीं जानते थे कि ‘उन्हें किस दिशामें भागकर जाना है’ ।। १०१ १/२ ।। विप्रणष्टाश्च तेऽन्योन्यं नाजानन्त तथा विभो ।। १०२ ।। क्रोशन्तस्तात पुत्रेति दैवोपहतचेतसः । प्रभो! वे भागे हुए सैनिक एक-दूसरेको पहचान नहीं पाते थे। दैववश उनकी बुद्धि मारी गयी थी। वे ‘हा तात! हा पुत्र!’ कहकर अपने स्वजनोंको पुकार रहे थे ।। १०२ १/२ ।। पलायतां दिशस्तेषां स्वानप्युत्सृज्य बान्धवान् ।। १०३ ।। गोत्रनामभिरन्योन्यमाक्रन्दन्त ततो जनाः । हाहाकारं च कुर्वाणाः पृथिव्यां शेरते परे ।। १०४ ।। अपने सगे सम्बन्धियोंको भी छोड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें भागते हुए योद्धाओंके नाम और गोत्रको पुकार-पुकारकर लोग परस्पर बुला रहे थे। कितने ही मनुष्य हाहाकार करते हुए धरतीपर पड़ गये थे ।। तान् बुद्ध्वा रणमत्तोऽसौ द्रोणपुत्रो व्यपोथयत् । तत्रापरे वध्यमाना मुहुर्मुहुरचेतसः ।। १०५ ।। शिबिरान् निष्पतन्ति स्म क्षत्रिया भयपीडिताः । युद्धके लिये उन्मत्त हुआ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा उन सबको पहचान-पहचानकर मार गिराता था। बारंबार उसकी मार खाते हुए दूसरे बहुत-से क्षत्रिय भयसे पीड़ित और अचेत हो शिविरसे बाहर निकलने लगे ।। १०५ १/२ ।। तांस्तु निष्पतितांस्त्रस्तान् शिबिराज्जीवितैषिणः ।। १०६ ।। कृतवर्मा कृपश्चैव द्वारदेशे निजघ्नतुः । प्राण बचानेकी इच्छासे भयभीत हो शिविरसे निकले हुए उन क्षत्रियोंको कृतवर्मा और कृपाचार्यने दरवाजेपर ही मार डाला ।। १०६ १/२ ।। विस्रस्तयन्त्रकवचान् मुक्तकेशान् कृताञ्जलीन् ।। १०७ ।।