महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआप मुझसे वह दिव्य अस्त्र लेकर रणभूमिमें शत्रुओंका नाश करनेवाला अपना चक्र नामक अस्त्र मुझे दे दीजिये' ।। १३—१५ ।।
स राजन् प्रीयमाणेन मयाप्युक्तः कृताञ्जलिः । याचमानः प्रयत्नेन मत्तोऽस्त्रं भरतर्षभ ।। १६ ।।
‘भरतश्रेष्ठ! वह हाथ जोड़कर बड़े प्रयत्नके द्वारा मुझसे अस्त्रकी याचना कर रहा था, तब मैंने भी प्रसन्नतापूर्वक ही उससे कहा— ।। १६ ।।
देवदानवगन्धर्वमनुष्यपतगोरगाः । न समा मम वीर्यस्य शतांशेनापि पिण्डिताः ।। १७ ।।
“ब्रह्मन्! देवता, दानव, गन्धर्व, मनुष्य, पक्षी और नाग—ये सब मिलकर मेरे पराक्रमके सौवें अंशकी भी समानता नहीं कर सकते ।। १७ ।।
इदं धनुरियं शक्तिरिदं चक्रमियं गदा । यद्यदिच्छसि चेदस्त्रं मत्तस्तत् तद् ददामि ते ।। १८ ।।
“यह मेरा धनुष है, यह शक्ति है, यह चक्र है और यह गदा है। तुम जो-जो अस्त्र मुझसे लेना चाहते हो, वही वह तुम्हें दिये देता हूँ ।। १८ ।।
यच्छक्नोषि समुद्यन्तुं प्रयोक्तुमपि वा रणे । तद् गृहाण विनास्त्रेण यन्मे दातुमभीप्ससि ।। १९ ।।
“तुम मुझे जो अस्त्र देना चाहते हो, उसे दिये बिना ही रणभूमिमें मेरे जिस आयुधको उठा अथवा चला सको, उसे ही ले लो' ।। १९ ।।
स सुनाभं सहस्रारं वज्रनाभमयस्मयम् । वव्रे चक्रं महाभागो मत्तः स्पर्धन्मया सह ।। २० ।।
‘तब उस महाभागने मेरे साथ स्पर्धा रखते हुए मुझसे मेरा वह लोहमय चक्र माँगा, जिसकी सुन्दर नाभिमें वज्र लगा हुआ है तथा जो एक सहस्र अरोंसे सुशोभित होता है! ।। २० ।।
गृहाण चक्रमित्युक्तो मया तु तदनन्तरम् । जग्राहोत्पत्य सहसा चक्रं सव्येन पाणिना ।। २१ ।।
‘मैंने भी कह दिया—‘ले लो चक्र,' मेरे इतना कहते ही उसने सहसा उछलकर बायें हाथसे चक्रको पकड़ लिया ।। २१ ।।
न चैनमशकत् स्थानात् संचालयितुमप्युत । अथैनं दक्षिणेनापि गृहीतुमुपचक्रमे ।। २२ ।।
‘परंतु वह उसे अपनी जगहसे हिला भी न सका। तब उसने उसे दाहिने हाथसे उठानेका प्रयत्न आरम्भ किया ।। २२ ।।
सर्वयत्नबलेनापि गृह्णन्नेवमिदं ततः । ततः सर्वबलेनापि यदैनं न शशाक ह ।। २३ ।।