महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3069, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंउद्यन्तुं वा चालयितुं द्रौणिः परमदुर्मनाः । कृत्वा यत्नं परिश्रान्तः स न्यवर्तत भारत ॥ २४ ॥ 'सारा प्रयत्न और सारी शक्ति लगाकर भी जब उसे पकड़कर उठा अथवा हिला न सका, तब द्रोणकुमार मन-ही-मन बहुत दुःखी हो गया। भारत! यत्न करके थक जानेपर वह उसे लेनेकी चेष्टासे निवृत्त हो गया ।। २३-२४ ।।
निवृत्तमनसं तस्मादभिप्रयाद् विचेतसम् । अहमामन्त्र्य संविग्नमश्वत्थामानमब्रुवम् ॥ २५ ॥ 'जब उस संकल्पसे उसका मन हट गया और वह दुःखसे अचेत एवं उद्विग्न हो गया, तब मैंने अश्वत्थामाको बुलाकर पूछा— ।। २५ ।।
यः सदैव मनुष्येषु प्रमाणं परमं गतः । गाण्डीवधन्वा श्वेताश्वः कपिप्रवरकेतनः ॥ २६ ॥ यः साक्षाद् देवदेवेशं शितिकण्ठमुमापतिम् । द्वन्द्वयुद्धे पराजिष्णुस्तोषायामास शङ्करम् ॥ २७ ॥ यस्मात् प्रियतरो नास्ति ममान्यः पुरुषो भुवि । नादेयं यस्य मे किञ्चिदपि दाराः सुतास्तथा ॥ २८ ॥ तेनापि सुहृदा ब्रह्मन् पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा । नोक्तपूर्वमिदं वाक्यं यत् त्वं मामभिभाषसे ॥ २९ ॥ “ब्रह्मन्! जो मनुष्य समाजमें सदा ही परम प्रामाणिक समझे जाते हैं, जिनके पास गाण्डीव धनुष और श्वेत घोड़े हैं, जिनकी ध्वजापर श्रेष्ठ वानर विराजमान होता है, जिन्होंने द्वन्द्वयुद्धमें साक्षात् देवदेवेश्वर नीलकण्ठ उमा-वल्लभ भगवान् शंकरको पराजित करनेका साहस करके उन्हें संतुष्ट किया था, इस भूमण्डलमें मुझे जिनसे बढ़कर परम प्रिय दूसरा कोई मनुष्य नहीं है, जिनके लिये मेरे पास स्त्री, पुत्र आदि कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो देने योग्य न हो, अनायास ही महान् कर्म करनेवाले मेरे उस प्रिय सुहृद् कुन्तीकुमार अर्जुनने भी पहले कभी ऐसी बात नहीं कही थी, जो आज तुम मुझसे कह रहे हो ।।
ब्रह्मचर्यं महत् घोरं तीर्त्वा द्वादशवार्षिकम् । हिमवत्पार्श्वमास्थाय यो मया तपसार्जितः ॥ ३० ॥ समानव्रतचारिण्यां रुक्मिण्यां योऽन्वजायत । सनत्कुमारस्तेजस्वी प्रद्युम्नो नाम मे सुतः ॥ ३१ ॥ तेनाप्येतन्महद् दिव्यं चक्रमप्रतिमं रणे । न प्रार्थितमभून्मूढ यदिदं प्रार्थितं त्वया ॥ ३२ ॥ “मूढ़ ब्राह्मण! मैंने बारह वर्षोंतक अत्यन्त घोर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करके हिमालयकी घाटीमें रहकर बड़ी भारी तपस्याके द्वारा जिसे प्राप्त किया था, मेरे समान व्रतका पालन करनेवाली रुक्मिणीदेवीके गर्भसे जिसका जन्म हुआ है, जिसके रूपमें