महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3070, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाक्षात् तेजस्वी सनत्कुमारने ही मेरे यहाँ अवतार लिया है, वह प्रद्युम्न मेरा प्रिय पुत्र है। परंतु रणभूमिमें जिसकी कहीं तुलना नहीं है, मेरे इस परम दिव्य चक्रको कभी उस प्रद्युम्नने भी नहीं माँगा था, जिसकी आज तुमने माँग की है ।। रामेणातिबलेनैतन्नोक्तपूर्वं कदाचन । न गदेन न साम्बेन यदिदं प्रार्थितं त्वया ॥ ३३ ॥ “अत्यन्त बलशाली बलरामजीने भी पहले कभी ऐसी बात नहीं कही है। जिसे तुमने माँगा है, उसे गद और साम्बने भी कभी लेनेकी इच्छा नहीं की ॥ ३३ ॥ द्वारकावासिभिश्चान्यैर्वृष्ण्यन्धकमहारथैः । नोक्तपूर्वमिदं जातु यदिदं प्रार्थितं त्वया ॥ ३४ ॥ “द्वारकामें निवास करनेवाले जो अन्य वृष्णि तथा अन्धकवंशके महारथी हैं, उन्होंने भी कभी मेरे सामने ऐसा प्रस्ताव नहीं किया था, जैसा कि तुमने इस चक्रको माँगते हुए किया है ॥ ३४ ॥ भारताचार्यपुत्रस्त्वं मानितः सर्वयादवैः । चक्रेण रथिनां श्रेष्ठ कं नु तात युयुत्ससे ॥ ३५ ॥ “तात! रथियोंमें श्रेष्ठ! तुम तो भरतकुलके आचार्यके पुत्र हो। सम्पूर्ण यादवोंने तुम्हारा बड़ा सम्मान किया है। फिर बताओ तो सही, इस चक्रके द्वारा तुम किसके साथ युद्ध करना चाहते हो?' ॥ ३५ ॥ एवमुक्तो मया द्रौणिर्मामिदं प्रत्युवाच ह । प्रयुज्य भवते पूजां योत्स्ये कृष्ण त्वया सह ॥ ३६ ॥ प्रार्थितं ते मया चक्रं देवदानवपूजितम् । अजेयः स्यामिति विभो सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ३७ ॥ 'जब मैंने इस तरह पूछा, तब द्रोणकुमारने मुझे इस प्रकार उत्तर दिया—'श्रीकृष्ण! मैं आपकी पूजा करके फिर आपके ही साथ युद्ध करूँगा। प्रभो! मैं यह सच कहता हूँ कि मैंने इस देव-दानवपूजित चक्रको आपसे इसीलिये माँगा था कि इसे पाकर अजेय हो जाऊँ ।। त्वत्तोऽहं दुर्लभं काममनवाप्यैव केशव । प्रतियास्यामि गोविन्द शिवेनाभिवदस्व माम् ॥ ३८ ॥ “किंतु केशव! अब मैं अपनी इस दुर्लभ कामनाको आपसे प्राप्त किये बिना ही लौट जाऊँगा। गोविन्द! आप मुझसे केवल इतना कह दें कि 'तेरा कल्याण हो' ॥ ३८ ॥ एतत् सुभीमं भीमानावृषभेण त्वया धृतम् । चक्रमप्रतिचक्रेण भुवि नान्योऽभिपद्यते ॥ ३९ ॥ “यह चक्र अत्यन्त भयंकर है और आप भी भयानक वीरोंके शिरोमणि हैं। आपके किसी विरोधीके पास ऐसा चक्र नहीं है। आपने ही इसे धारण कर रखा है। इस भूतलपर दूसरा कोई पुरुष इसे नहीं उठा सकता' ॥ ३९ ॥