भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 3078, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 3078

अर्जुनार्जुन यद्दिव्यमस्त्रं ते हृदि वर्तते । द्रोणोपदिष्टं तस्यायं कालः सम्प्रति पाण्डव ॥ २ ॥ ‘अर्जुन! अर्जुन! पाण्डुनन्दन! आचार्य द्रोणका उपदेश किया हुआ जो दिव्य अस्त्र तुम्हारे हृदयमें विद्यमान है, उसके प्रयोगका अब यह समय आ गया है ॥ २ ॥ भ्रातॄणामात्मनश्चैव परित्राणाय भारत । विसृजैतत् त्वमप्याजावस्त्रमस्त्रनिवारणम् ॥ ३ ॥ ‘भरतनन्दन! भाइयोंकी और अपनी रक्षाके लिये तुम भी युद्धमें इस ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करो। अश्वत्थामाके अस्त्रका निवारण इसीके द्वारा हो सकता है’ ॥ ३ ॥ केशवेनैवमुक्तोऽथ पाण्डवः परवीरहा । अवातरद् रथात् तूर्णं प्रगृह्य सशरं धनुः ॥ ४ ॥ भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पाण्डुपुत्र अर्जुन धनुष-बाण हाथमें लेकर तुरंत ही रथसे नीचे उतर गये ॥ ४ ॥ पूर्वमाचार्यपुत्राय ततोऽनन्तरमात्मने । भ्रातृभ्यश्चैव सर्वेभ्यः स्वस्तीत्युक्त्वा परंतपः ॥ ५ ॥ देवताभ्यो नमस्कृत्य गुरुभ्यश्चैव सर्वशः । उत्ससर्ज शिवं ध्यायन्नस्त्रमस्त्रेण शाम्यताम् ॥ ६ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुनने सबसे पहले यह कहा कि ‘आचार्यपुत्रका कल्याण हो’। तत्पश्चात् अपने और सम्पूर्ण भाइयोंके लिये मंगल-कामना करके उन्होंने देवताओं और सभी गुरुजनोंको नमस्कार किया। इसके बाद ‘इस ब्रह्मास्त्रसे शत्रुका ब्रह्मास्त्र शान्त हो जाय’ ऐसा संकल्प करके सबके कल्याणकी भावना करते हुए अपना दिव्य अस्त्र छोड़ दिया ॥ ५-६ ॥ ततस्तदस्त्रं सहसा सृष्टं गाण्डीवधन्वना । प्रजज्वाल महार्चिष्मद् युगान्तानलसंनिभम् ॥ ७ ॥ गाण्डीवधारी अर्जुनके द्वारा छोड़ा गया वह ब्रह्मास्त्र सहसा प्रज्वलित हो उठा। उससे प्रलयाग्निके समान बड़ी-बड़ी लपटें उठने लगीं ॥ ७ ॥ तथैव द्रोणपुत्रस्य तदस्त्रं तिग्मतेजसः । प्रजज्वाल महाज्वालं तेजोमण्डलसंवृतम् ॥ ८ ॥ इसी प्रकार प्रचण्ड तेजस्वी द्रोणपुत्रका वह अस्त्र भी तेजोमण्डलसे घिरकर बड़ी-बड़ी ज्वालाओंके साथ जलने लगा ॥ ८ ॥ निर्घाता बहवश्चासन् पेतुरुल्काः सहस्रशः । महद् भयं च भूतानां सर्वेषां समजायत ॥ ९ ॥ उस समय बारंबार वज्रपातके समान शब्द होने लगे, आकाशसे सहस्रों उल्काएँ टूट-टूटकर गिरने लगीं और समस्त प्राणियोंपर महान् भय छा गया ॥ ९ ॥

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व · पृष्ठ 3078, कुल 3237 में से · BharatKosha