महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अर्जुनार्जुन यद्दिव्यमस्त्रं ते हृदि वर्तते । द्रोणोपदिष्टं तस्यायं कालः सम्प्रति पाण्डव ॥ २ ॥ ‘अर्जुन! अर्जुन! पाण्डुनन्दन! आचार्य द्रोणका उपदेश किया हुआ जो दिव्य अस्त्र तुम्हारे हृदयमें विद्यमान है, उसके प्रयोगका अब यह समय आ गया है ॥ २ ॥ भ्रातॄणामात्मनश्चैव परित्राणाय भारत । विसृजैतत् त्वमप्याजावस्त्रमस्त्रनिवारणम् ॥ ३ ॥ ‘भरतनन्दन! भाइयोंकी और अपनी रक्षाके लिये तुम भी युद्धमें इस ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करो। अश्वत्थामाके अस्त्रका निवारण इसीके द्वारा हो सकता है’ ॥ ३ ॥ केशवेनैवमुक्तोऽथ पाण्डवः परवीरहा । अवातरद् रथात् तूर्णं प्रगृह्य सशरं धनुः ॥ ४ ॥ भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पाण्डुपुत्र अर्जुन धनुष-बाण हाथमें लेकर तुरंत ही रथसे नीचे उतर गये ॥ ४ ॥ पूर्वमाचार्यपुत्राय ततोऽनन्तरमात्मने । भ्रातृभ्यश्चैव सर्वेभ्यः स्वस्तीत्युक्त्वा परंतपः ॥ ५ ॥ देवताभ्यो नमस्कृत्य गुरुभ्यश्चैव सर्वशः । उत्ससर्ज शिवं ध्यायन्नस्त्रमस्त्रेण शाम्यताम् ॥ ६ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुनने सबसे पहले यह कहा कि ‘आचार्यपुत्रका कल्याण हो’। तत्पश्चात् अपने और सम्पूर्ण भाइयोंके लिये मंगल-कामना करके उन्होंने देवताओं और सभी गुरुजनोंको नमस्कार किया। इसके बाद ‘इस ब्रह्मास्त्रसे शत्रुका ब्रह्मास्त्र शान्त हो जाय’ ऐसा संकल्प करके सबके कल्याणकी भावना करते हुए अपना दिव्य अस्त्र छोड़ दिया ॥ ५-६ ॥ ततस्तदस्त्रं सहसा सृष्टं गाण्डीवधन्वना । प्रजज्वाल महार्चिष्मद् युगान्तानलसंनिभम् ॥ ७ ॥ गाण्डीवधारी अर्जुनके द्वारा छोड़ा गया वह ब्रह्मास्त्र सहसा प्रज्वलित हो उठा। उससे प्रलयाग्निके समान बड़ी-बड़ी लपटें उठने लगीं ॥ ७ ॥ तथैव द्रोणपुत्रस्य तदस्त्रं तिग्मतेजसः । प्रजज्वाल महाज्वालं तेजोमण्डलसंवृतम् ॥ ८ ॥ इसी प्रकार प्रचण्ड तेजस्वी द्रोणपुत्रका वह अस्त्र भी तेजोमण्डलसे घिरकर बड़ी-बड़ी ज्वालाओंके साथ जलने लगा ॥ ८ ॥ निर्घाता बहवश्चासन् पेतुरुल्काः सहस्रशः । महद् भयं च भूतानां सर्वेषां समजायत ॥ ९ ॥ उस समय बारंबार वज्रपातके समान शब्द होने लगे, आकाशसे सहस्रों उल्काएँ टूट-टूटकर गिरने लगीं और समस्त प्राणियोंपर महान् भय छा गया ॥ ९ ॥
सशब्दमभवद् व्योम ज्वालामालाकुलं भृशम् ।
चचाल च मही कृत्स्ना सपर्वतवनद्रुमा ॥ १० ॥
सारा आकाश आगकी प्रचण्ड ज्वालाओंसे व्याप्त हो उठा और वहाँ जोर-जोरसे शब्द होने लगा। पर्वत, वन, और वृक्षोंसहित सारी पृथ्वी हिलने लगी ॥ १० ॥
ते त्वस्त्रतेजसी लोकांस्तापयन्ती व्यवस्थिते ।
महर्षी सहितौ तत्र दर्शयामासतुस्तदा ॥ ११ ॥
नारदः सर्वभूतात्मा भरतानां पितामहः ।
उन दोनों अस्त्रोंके तेज समस्त लोकोंको संतप्त करते हुए वहाँ स्थित हो गये। उस समय वहाँ सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा नारद तथा भरतवंशके पितामह व्यास—इन दो महर्षियोंने एक साथ दर्शन दिया ॥ ११ १/२ ॥
उभौ शमयितुं वीरौ भारद्वाजधनंजयौ ॥ १२ ॥
तौ मुनी सर्वधर्मज्ञौ सर्वभूतहितैषिणौ ।
दीप्तयोरस्त्रयोर्मध्ये स्थितौ परमतेजसौ ॥ १३ ॥
सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता तथा समस्त प्राणियोंके हितैषी वे दोनों परम तेजस्वी मुनि अश्वत्थामा और अर्जुन—इन दोनों वीरोंको शान्त करनेके लिये इनके प्रज्वलित अस्त्रोंके बीचमें खड़े हो गये ॥ १२-१३ ॥
तदन्तरमथाधृष्यावुपगम्य यशस्विनौ ।
आस्तामृषिवरौ तत्र ज्वलिताविव पावकौ ॥ १४ ॥
उन अस्त्रोंके बीचमें आकर वे दुर्धर्ष एवं यशस्वी महर्षिप्रवर दो प्रज्वलित अग्नियोंके समान वहाँ स्थित हो गये ॥ १४ ॥
प्राणभृद्भिरनाधृष्यौ देवदानवसंमतौ ।
अस्त्रतेजः शमयितुं लोकानां हितकाम्यया ॥ १५ ॥
कोई भी प्राणी उन दोनोंका तिरस्कार नहीं कर सकता था। देवता और दानव दोनों ही उनका सम्मान करते थे। वे समस्त लोकोंके हितकी कामनासे उन अस्त्रोंके तेजको शान्त करानेके लिये वहाँ आये थे ॥ १५ ॥
ऋषी ऊचतुः
नानाशस्त्रविदः पूर्वे येऽप्यतीता महारथाः ।
नैतदस्त्रं मनुष्येषु तैः प्रयुक्तं कथंचन ।
किमिदं साहसं वीरौ कृतवन्तौ महात्ययम् ॥ १६ ॥
उन दोनों ऋषियोंने उन दोनों वीरोंसे कहा—‘वीरो! पूर्वकालमें भी जो बहुत-से महारथी हो चुके हैं, वे नाना प्रकारके शस्त्रोंके जानकार थे, परंतु उन्होंने किसी प्रकार भी
मनुष्योंपर इस अस्त्रका प्रयोग नहीं किया था। तुम दोनोंने यह महान् विनाशकारी दुःसाहस क्यों किया है? ।। १६ ।।
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि अर्जुनास्त्रत्यागे चतुर्दशोऽध्यायः ।। १४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें अर्जुनके द्वारा ब्रह्मास्त्रका प्रयोगविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४ ।।
अध्याय (पृष्ठ 3081)
पञ्चदशोऽध्यायः
वेदव्यासजीकी आज्ञासे अर्जुनके द्वारा अपने अस्त्रका उपसंहार तथा अश्वत्थामाका अपनी मणि देकर पाण्डवोंके गर्भोंपर दिव्यास्त्र छोड़ना
वैशम्पायन उवाच
दृष्ट्वैव नरशार्दूल तावग्निसमतेजसौ ।
गाण्डीवधन्वा संचिन्त्य प्राप्तकालं महारथः ।
संजहार शरं दिव्यं त्वरमाणो धनंजयः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नरश्रेष्ठ! उन अग्निके समान तेजस्वी दोनों महर्षियोंके देखते ही गाण्डीवधारी महारथी अर्जुनने समयोचित कर्तव्यका विचार करके बड़ी फुर्तीसे अपने दिव्यास्त्रका उपसंहार आरम्भ किया ॥ १ ॥
उवाच भरतश्रेष्ठ तावृषी प्राञ्जलिस्तदा ।
प्रमुक्तमस्त्रमस्त्रेण शाम्यतामिति वै मया ॥ २ ॥
संहृते परमास्त्रेऽस्मिन् सर्वानस्मानशेषतः ।
पापकर्मा ध्रुवं द्रौणिः प्रधक्ष्यत्यस्त्रतेजसा ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस समय उन्होंने हाथ जोड़कर उन दोनों महर्षियोंसे कहा—'मुनिवरो! मैंने तो इसी उद्देश्यसे यह अस्त्र छोड़ा था कि इसके द्वारा शत्रु का छोड़ा हुआ ब्रह्मास्त्र शान्त हो जाय। अब इस उत्तम अस्त्रको लौटा लेनेपर पापाचारी अश्वत्थामा अपने अस्त्रके तेजसे अवश्य ही हम सब लोगोंको भस्म कर डालेगा ॥ २-३ ॥
यदत्र हितमस्माकं लोकानां चैव सर्वथा ।
भवन्तौ देवसंकाशौ तथा सम्मन्तुमर्हतः ॥ ४ ॥
'आप दोनों देवताके तुल्य हैं; अतः इस समय जैसा करनेसे हमारा और सब लोगोंका सर्वथा हित हो, उसीके लिये आप हमें सलाह दें' ॥ ४ ॥
इत्युक्त्वा संजहारास्त्रं पुनरेवं धनंजयः ।
संहारो दुष्करस्तस्य देवैरपि हि संयुगे ॥ ५ ॥
विसृष्टस्य रणे तस्य परमास्त्रस्य संग्रहे ।
अशक्तः पाण्डवादन्यः साक्षादपि शतक्रतुः ॥ ६ ॥
ऐसा कहकर अर्जुनने पुनः उस अस्त्रको पीछे लौटा लिया। युद्धमें उसे लौटा लेना देवताओंके लिये भी दुष्कर था। संग्राममें एक बार उस दिव्य अस्त्रको छोड़ देनेपर पुनः उसे लौटा लेनेमें पाण्डुपुत्र अर्जुनके सिवा साक्षात् इन्द्र भी समर्थ नहीं थे ॥ ५-६ ॥
ब्रह्मतेजोद्भवं तद्धि विसृष्टमकृतात्मना । न शक्यमावर्तयितुं ब्रह्मचारिव्रतादृते ॥ ७ ॥ वह अस्त्र ब्रह्मतेजसे प्रकट हुआ था। यदि अजितेन्द्रिय पुरुषके द्वारा इसका प्रयोग किया गया हो तो उसके लिये इसे पुनः लौटाना असम्भव है; क्योंकि ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किये बिना कोई इसे लौटा नहीं सकता ॥ ७ ॥
अचीर्णब्रह्मचर्यो यः सृष्ट्वा वर्तयते पुनः । तदस्त्रं सानुबन्धस्य मूर्धानं तस्य कृन्तति ॥ ८ ॥ जिसने ब्रह्मचर्यका पालन नहीं किया हो, वह पुरुष यदि उसका एक बार प्रयोग करके उसे फिर लौटानेका प्रयत्न करे तो वह अस्त्र सगे-सम्बन्धियोंसहित उसका सिर काट लेता था ॥ ८ ॥
ब्रह्मचारी व्रती चापि दुरवापमवाप्य तत् । परमव्यसनार्तोऽपि नार्जुनोऽस्त्रं व्यमुञ्चत ॥ ९ ॥ अर्जुनने ब्रह्मचारी तथा व्रतधारी रहकर ही उस दुर्लभ अस्त्रको प्राप्त किया था। वे बड़े-से-बड़े संकटमें पड़नेपर भी कभी उस अस्त्रका प्रयोग नहीं करते थे ॥ ९ ॥
सत्यव्रतधरः शूरो ब्रह्मचारी च पाण्डवः । गुरुवर्ती च तेनास्त्रं संजहारार्जुनः पुनः ॥ १० ॥ सत्यव्रतधारी, ब्रह्मचारी, शूरवीर पाण्डव अर्जुन गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाले थे; इसलिये उन्होंने फिर उस अस्त्रको लौटा लिया ॥ १० ॥
द्रौणिर्प्यथ सम्प्रेक्ष्य तावृषी पुरतः स्थितौ । न शशाक पुनर्घोरमस्त्रं संहर्तुमोजसा ॥ ११ ॥ अश्वत्थामाने भी जब उन ऋषियोंको अपने सामने खड़ा देखा तो उस घोर अस्त्रको बलपूर्वक लौटा लेनेका प्रयत्न किया, किंतु वह उसमें सफल न हो सका ॥ ११ ॥
अशक्तः प्रतिसंहारे परमास्त्रस्य संयुगे । द्रौणिर्दीनमना राजन् द्वैपायनमभाषत ॥ १२ ॥ राजन्! युद्धमें उस दिव्य अस्त्रका उपसंहार करनेमें समर्थ न होनेके कारण द्रोणकुमार मन-ही-मन बहुत दुःखी हुआ और व्यासजीसे इस प्रकार बोला— ॥ १२ ॥
उत्तमव्यसनार्तेन प्राणत्राणमभीप्सुना । मयैतदस्त्रमुत्सृष्टं भीमसेनभयान्मुने ॥ १३ ॥ 'मुने! मैंने भीमसेनके भयसे भारी संकटमें पड़कर अपने प्राणोंको बचानेके लिये ही यह अस्त्र छोड़ा था ॥
अधर्मश्च कृतोऽनेन धार्तराष्ट्रं जिघांसता । मिथ्याचारेण भगवन् भीमसेनेन संयुगे ॥ १४ ॥
‘भगवन्! दुर्योधनके वधकी इच्छासे इस भीमसेनने संग्रामभूमिमें मिथ्याचारका आश्रय लेकर महान् अधर्म किया था ।। १४ ।।
अतः सृष्टमिदं ब्रह्मन् मयास्त्रमकृतात्मना ।
तस्य भूयोऽद्य संहारं कर्तुं नाहमिहोत्सहे ।। १५ ।।
‘ब्रह्मन्! यद्यपि मैं जितेन्द्रिय नहीं हूँ, तथापि मैंने इस अस्त्रका प्रयोग कर दिया है। अब पुनः इसे लौटा लेनेकी शक्ति मुझमें नहीं है ।। १५ ।।
विसृष्टं हि मया दिव्यमेतदस्त्रं दुरासदम् ।
अपाण्डवायेति मुने वह्नितेजोऽनुमन्त्र्य वै ।। १६ ।।
‘मुने! मैंने इस दुर्जय दिव्यास्त्रको अग्निके तेजसे युक्त एवं अभिमन्त्रित करके इस उद्देश्यसे छोड़ा था कि पाण्डवोंका नामो-निशान मिट जाय ।। १६ ।।
तदिदं पाण्डवेयानामन्तकायाभिसंहितम् ।
अद्य पाण्डुसुतान् सर्वान् जीविताद् भ्रंशयिष्यति ।। १७ ।।
‘पाण्डवोंके विनाशका संकल्प लेकर छोड़ा गया यह दिव्यास्त्र आज समस्त पाण्डुपुत्रोंको जीवनशून्य कर देगा ।।
कृतं पापमिदं ब्रह्मन् रोषाविष्टेन चेतसा ।
वधमाशास्य पार्थानां मयास्त्रं सृजता रणे ।। १८ ।।
‘ब्रह्मन्! मैंने मनमें रोष भरकर रणभूमिमें कुन्तीपुत्रोंके वधकी इच्छासे इस अस्त्रका प्रयोग करके अवश्य ही बड़ा भारी पाप किया है’ ।। १८ ।।
व्यास उवाच
अस्त्रं ब्रह्मशिरस्तात विद्वान् पार्थो धनंजयः ।
उत्सृष्टवान्न रोषेण न नाशाय तवाहवे ।। १९ ।।
व्यासजीने कहा— तात! कुन्तीपुत्र धनंजय भी तो इस ब्रह्मास्त्रके ज्ञाता हैं; किंतु उन्होंने रोषमें भरकर युद्धमें तुम्हें मारनेके लिये उसे नहीं छोड़ा है ।। १९ ।।
अस्त्रमस्त्रेण तु रणे तव संशमयिष्यता ।
विसृष्टमर्जुनेनेदं पुनश्च प्रतिसंहृतम् ।। २० ।।
देखो, रणभूमिमें अपने अस्त्रद्वारा तुम्हारे अस्त्रको शान्त करनेके उद्देश्यसे ही अर्जुनने उसका प्रयोग किया था और अब पुनः उसे लौटा लिया है ।। २० ।।
ब्रह्मास्त्रमप्यवाप्यैतदुपदेशात् पितुस्तव ।
क्षत्रधर्मान्महाबाहुर्नाकम्पत धनंजयः ।। २१ ।।
इस ब्रह्मास्त्रको पाकर भी महाबाहु अर्जुन तुम्हारे पिताजीका उपदेश मानकर कभी क्षात्रधर्मसे विचलित नहीं हुए हैं ।। २१ ।।
एवं धृतिमतरु साधोः सर्वास्त्रविदुषः सतः ।
सभ्रातृबन्धोः कस्मात् त्वं वधमस्य चिकीर्षसि ॥ २२ ॥ ये ऐसे धैर्यवान्, साधु, सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता तथा सत्पुरुष हैं, तथापि तुम भाई-बन्धुओंसहित इनका वध करनेकी इच्छा क्यों रखते हो? ॥ २२ ॥ अस्त्रं ब्रह्मशिरो यत्र परमास्त्रेण वध्यते । समा द्वादश पर्जन्यस्तद्राष्ट्रं नाभिवर्षति ॥ २३ ॥ जिस देशमें एक ब्रह्मास्त्रको दूसरे उत्कृष्ट अस्त्रसे दबा दिया जाता है, उस राष्ट्रमें बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं होती है ॥ एतदर्थं महाबाहुः शक्तिमानपि पाण्डवः । न विहन्त्येतदस्त्रं तु प्रजाहितचिकीर्षया ॥ २४ ॥ इसीलिये प्रजावर्गके हितकी इच्छासे महाबाहु अर्जुन शक्तिशाली होते हुए भी तुम्हारे इस अस्त्रको नष्ट नहीं कर रहे हैं ॥ २४ ॥ पाण्डवास्त्वं च राष्ट्रं च सदा संरक्ष्यमेव हि । तस्मात् संहर दिव्यं त्वमस्त्रमेतन्महाभुज ॥ २५ ॥ महाबाहो! तुम्हें पाण्डवोंकी, अपनी और इस राष्ट्रकी भी सदा रक्षा ही करनी चाहिये; इसलिये तुम अपने इस दिव्यास्त्रको लौटा लो ॥ २५ ॥ अरोषस्तव चैवास्तु पार्थाः सन्तु निरामयाः । न ह्यधर्मेण राजर्षिः पाण्डवो जेतुमिच्छति ॥ २६ ॥ तुम्हारा रोष शान्त हो और पाण्डव भी स्वस्थ रहें। पाण्डुपुत्र राजर्षि युधिष्ठिर किसीको भी अधर्मसे नहीं जीतना चाहते हैं ॥ २६ ॥ मणिं चैव प्रयच्छाद्य यस्ते शिरसि तिष्ठति । एतदादाय ते प्राणान् प्रतिदास्यन्ति पाण्डवाः ॥ २७ ॥ तुम्हारे सिरमें जो मणि है, इसे आज इन्हें दे दो। इस मणिको ही लेकर पाण्डव बदलेमें तुम्हें प्राणदान देंगे ॥ २७ ॥
द्रौणिरुवाच
पाण्डवैर्यानि रत्नानि यच्चान्यत् कौरवैर्धनम् । अवाप्तमिह तेभ्योऽयं मणिर्मम विशिष्यते ॥ २८ ॥ **अश्वत्थामा बोला—**पाण्डवोंने अबतक जो-जो रत्न प्राप्त किये हैं तथा कौरवोंने भी यहाँ जो धन पाया है, मेरी यह मणि उन सबसे अधिक मूल्यवान् है ॥ २८ ॥ यमाबध्य भयं नास्ति शस्त्रव्याधिक्षुधाश्रयम् । देवेभ्यो दानवेभ्यो वा नागेभ्यो वा कथंचन ॥ २९ ॥ इसे बाँध लेनेपर शस्त्र, व्याधि, क्षुधा, देवता, दानव अथवा नाग किसीसे भी किसी तरहका भय नहीं रहता ॥
न च रक्षोगणभयं न तस्करभयं तथा ।
एवंवीर्यो मणिरयं न मे त्याज्यः कथंचन ॥ ३० ॥
न राक्षसोंका भय रहता है न चोरोंका। मेरी इस मणिका ऐसा अद्भुत प्रभाव है। इसलिये मुझे इसका त्याग तो किसी प्रकार भी नहीं करना चाहिये ॥ ३० ॥
यत्तु मे भगवान्नाह तन्मे कार्यमनन्तरम् ।
अयं मणिरयं चाहमीषीका तु पतिष्यति ॥ ३१ ॥
गर्भेषु पाण्डवेयानाममोघं चैतदुत्तमम् ।
न च शक्तोऽस्मि भगवन् संहर्तुं पुनरुद्यतम् ॥ ३२ ॥
परंतु आप पूज्यपाद महर्षि मुझे जो आज्ञा देते हैं उसीका अब मुझे पालन करना है, अतः यह रही मणि और यह रहा मैं। किंतु यह दिव्यास्त्रसे अभिमन्त्रित की हुई सींक तो पाण्डवोंके गर्भस्थ शिशुओंपर गिरेगी ही; क्योंकि यह उत्तम अस्त्र अमोघ है। भगवन्! इस उठे हुए अस्त्रको मैं पुनः लौटा लेनेमें असमर्थ हूँ ॥ ३१-३२ ॥
एतदस्त्वमतश्चैव गर्भेषु विसृजाम्यहम् ।
न च वाक्यं भगवतो न करिष्ये महामुने ॥ ३३ ॥
महामुने! अतः यह अस्त्र मैं पाण्डवोंके गर्भोपर ही छोड़ रहा हूँ। आपकी आज्ञाका मैं कदापि उल्लंघन नहीं करूँगा ॥ ३३ ॥
व्यास उवाच
एवं कुरु न चान्या तु बुद्धिः कार्या त्वयानघ ।
गर्भेषु पाण्डवेयानां विसृज्यैतदुपारम ॥ ३४ ॥
व्यासजीने कहा— अनघ! अच्छा, ऐसा ही करो। अब अपने मनमें दूसरा कोई विचार न लाना। इस अस्त्रको पाण्डवोंके गर्भोपर ही छोड़कर शान्त हो जाओ ॥ ३४ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः परममस्त्रं तु द्रौणिरुद्यतमाहवे ।
द्वैपायनवचः श्रुत्वा गर्भेषु प्रमुमोच ह ॥ ३५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! व्यासजीका यह वचन सुनकर द्रोणकुमारने युद्धमें उठे हुए उस दिव्यास्त्रको पाण्डवोंके गर्भोपर ही छोड़ दिया ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि ब्रह्मशिरोऽस्त्रस्य पाण्डवेयगर्भप्रवेशने पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें ब्रह्मास्त्रका पाण्डवोंके गर्भमें प्रवेशविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 3086)
षोडशोऽध्यायः
श्रीकृष्णसे शाप पाकर अश्वत्थामाका वनको प्रस्थान तथा पाण्डवोंका मणि देकर द्रौपदीको शान्त करना
वैशम्पायन उवाच
तदाज्ञाय हृषीकेशो विसृष्टं पापकर्मणा ।
हृष्यमाण इदं वाक्यं द्रौणिं प्रत्यब्रवीत्तदा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! पापी अश्वत्थामाने अपना अस्त्र पाण्डवोंके गर्भपर छोड़ दिया, यह जानकर भगवान् श्रीकृष्णको बड़ी प्रसन्नता हुई। उस समय उन्होंने द्रोणपुत्रसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
विराटस्य सुतां पूर्वं स्नुषां गाण्डीवधन्वनः ।
उपप्लव्यगतां दृष्ट्वा व्रतवान् ब्राह्मणोऽब्रवीत् ॥ २ ॥
‘पहलेकी बात है, राजा विराटकी कन्या और गाण्डीवधारी अर्जुनकी पुत्रवधू जब उपप्लव्यनगरमें रहती थी, उस समय किसी व्रतवान् ब्राह्मणने उसे देखकर कहा— ॥
परिक्षीणेषु कुरुषु पुत्रस्तव भविष्यति ।
एतदस्य परिक्षित्त्वं गर्भस्थस्य भविष्यति ॥ ३ ॥
‘बेटी! जब कौरववंश परिक्षीण हो जायगा, तब तुम्हें एक पुत्र प्राप्त होगा और इसीलिये उस गर्भस्थ शिशुका नाम परीक्षित् होगा’ ॥ ३ ॥
तस्य तद् वचनं साधोः सत्यमेतद् भविष्यति ।
परिक्षिद् भविता ह्येषां पुनर्वंशकरः सुतः ॥ ४ ॥
‘उस साधु ब्राह्मणका वह वचन सत्य होगा। उत्तराका पुत्र परीक्षित् ही पुनः पाण्डववंशका प्रवर्तक होगा?’ ॥ ४ ॥
एवं ब्रुवाणं गोविन्दं सात्वतां प्रवरं तदा ।
द्रौणिः परमसंरब्धः प्रत्युवाचेदमुत्तरम् ॥ ५ ॥
सात्वतवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय द्रोणकुमार अश्वत्थामा अत्यन्त कुपित हो उठा और उन्हें उत्तर देता हुआ बोला— ॥ ५ ॥
नैतदेवं यथाऽऽत्थ त्वं पक्षपातेन केशव ।
वचनं पुण्डरीकाक्ष न च मद्वाक्यमन्यथा ॥ ६ ॥
‘कमलनयन केशव! तुम पाण्डवोंका पक्षपात करते हुए इस समय जैसी बात कह गये हो, वह कभी हो नहीं सकती। मेरा वचन झूठा नहीं होगा ॥ ६ ॥
पतिष्यति तदस्त्रं हि गर्भे तस्या मयोद्यतम् ।
विराटदुहितुः कृष्ण यं त्वं रक्षितुमिच्छसि ॥ ७ ॥
‘श्रीकृष्ण! मेरे द्वारा चलाया गया वह अस्त्र विराटपुत्री उत्तराके गर्भपर ही, जिसकी तुम
रक्षा करना चाहते हो, गिरेगा’ ॥
श्रीभगवानुवाच
अमोघः परमास्त्रस्य पातस्तस्य भविष्यति ।
स तु गर्भो मृतो जातो दीर्घमायुरवाप्स्यति ॥ ८ ॥
श्रीभगवान् बोले—द्रोणकुमार! उस दिव्य अस्त्रका प्रहार तो अमोघ ही होगा।
उत्तराका वह गर्भ मरा हुआ ही पैदा होगा; फिर उसे लंबी आयु प्राप्त हो जायगी ॥
त्वां तु कापुरुषं पापं विदुः सर्वे मनीषिणः ।
असकृत्पापकर्माणं बालजीवितघातकम् ॥ ९ ॥
तस्मात्त्वमस्य पापस्य कर्मणः फलमाप्नुहि ।
त्रीणि वर्षसहस्राणि चरिष्यसि महीमिमाम् ॥ १० ॥
अप्राप्नुवन् क्वचित् काञ्चित् संविदं जातु केनचित् ।
निर्जनानसहायस्त्वं देशान् प्रविचरिष्यसि ॥ ११ ॥
परंतु तुझे सभी मनीषी पुरुष कायर, पापी, बारंबार पापकर्म करनेवाला और बाल-
हत्यारा समझते हैं। इसलिये तू इस पाप-कर्मका फल प्राप्त कर ले। आजसे तीन हजार
वर्षोंतक तू इस पृथ्वीपर भटकता फिरेगा। तुझे कभी कहीं और किसीके साथ भी बातचीत
करनेका सुख नहीं मिल सकेगा। तू अकेला ही निर्जन-स्थानोंमें घूमता रहेगा ॥
भवित्री न हि ते क्षुद्र जनमध्येषु संस्थितिः ।
पूयशोणितगन्धी च दुर्गकान्तारसंश्रयः ॥ १२ ॥
विचरिष्यसि पापात्मन् सर्वव्याधिसमन्वितः ।
ओ नीच! तू जनसमुदायमें नहीं ठहर सकेगा। तेरे शरीरसे पीव और लोहूकी दुर्गन्ध
निकलती रहेगी; अतः तुझे दुर्गम स्थानोंका ही आश्रय लेना पड़ेगा। पापात्मन्! तू सभी
रोगोंसे पीड़ित होकर इधर-उधर भटकेगा ॥ १२ १/२ ॥
वयः प्राप्य परिक्षित् तु वेदव्रतमवाप्य च ॥ १३ ॥
कृपाच्छारद्वताच्छूरः सर्वास्त्राण्युपपत्स्यते ।
परीक्षित् तो दीर्घ आयु प्राप्त करके ब्रह्मचर्यपालन एवं वेदाध्ययनका व्रत धारण करेगा
और वह शूरवीर बालक शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यसे ही सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त
करेगा ॥ १३ १/२ ॥
विदित्वा परमास्त्राणि क्षत्रधर्मव्रते स्थितः ॥ १४ ॥
षष्टिं वर्षाणि धर्मात्मा वसुधां पालयिष्यति ।
इस प्रकार उत्तम अस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके क्षत्रियधर्ममें स्थित हो साठ वर्षोंतक इस पृथ्वीका पालन करेगा॥ १४ १/२ ॥
इतश्चोर्ध्वं महाबाहुः कुरुराजो भविष्यति ॥ १५ ॥
परिक्षिन्नाम नृपतिर्मिषतस्ते सुदुर्मते ।
दुर्मते! इसके बाद तेरे देखते-देखते महाबाहु कुरुराज परीक्षित् ही इस भूमण्डलका सम्राट् होगा॥ १५ १/२ ॥
अहं तं जीवयिष्यामि दग्धं शस्त्राग्नितेजसा ।
पश्य मे तपसो वीर्यं सत्यस्य च नराधम ॥ १६ ॥
नराधम! तेरी शस्त्राग्निके तेजसे दग्ध हुए उस बालकको मैं जीवित कर दूँगा। उस समय तू मेरे तप और सत्यका प्रभाव देख लेना॥ १६ ॥
व्यास उवाच
यस्मादनादृत्य कृतं त्वयास्मान् कर्म दारुणम् ।
ब्राह्मणस्य सतश्चैव यस्मात् ते वृत्तमीदृशम् ॥ १७ ॥
तस्माद् यद् देवकीपुत्र उक्तवानुत्तमं वचः ।
असंशयं ते तद् भावि क्षत्रधर्मस्त्वयाऽऽश्रितः ॥ १८ ॥
व्यासजीने कहा—द्रोणकुमार! तूने हमलोगोंका अनादर करके यह भयंकर कर्म किया है, ब्राह्मण होनेपर भी तेरा आचार ऐसा गिर गया है और तूने क्षत्रियधर्मको अपना लिया है; इसलिये देवकीनन्दन श्रीकृष्णने जो उत्तम बात कही है, वह सब तेरे लिये होकर ही रहेगी, इसमें संशय नहीं है॥
अश्वत्थामोवाच
सहैव भवता ब्रह्मन् स्थास्यामि पुरुषेष्विह ।
सत्यवागस्तु भगवानयं च पुरुषोत्तमः ॥ १९ ॥
अश्वत्थामा बोला—ब्रह्मन्! अब मैं मनुष्योंमें केवल आपके ही साथ रहूँगा। इन भगवान् पुरुषोत्तमकी बात सत्य हो॥ १९ ॥
वैशम्पायन उवाच
प्रदायाथ मणिं द्रौणिः पाण्डवानां महात्मनाम् ।
जगाम विमनास्तेषां सर्वेषां पश्यतां वनम् ॥ २० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इसके बाद महात्मा पाण्डवोंको मणि देकर द्रोणकुमार अश्वत्थामा उदास मनसे उन सबके देखते-देखते वनमें चला गया॥
पाण्डवाश्चापि गोविन्दं पुरस्कृत्य हतद्विषः ।
कृष्णद्वैपायनं चैव नारदं च महामुनिम् ॥ २१ ॥
द्रोणपुत्रस्य सहजं मणिमादाय सत्वराः । द्रौपदीमभ्यधावन्त प्रायोपेतां मनस्विनीम् ॥ २२ ॥ इधर जिनके शत्रु मारे गये थे, वे पाण्डव भी भगवान् श्रीकृष्ण, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास तथा महामुनि नारदजीको आगे करके द्रोणपुत्रके साथ ही उत्पन्न हुई मणि लिये आमरण अनशनका निश्चय किये बैठी हुई मनस्विनी द्रौपदीके पास पहुँचनेके लिये शीघ्रतापूर्वक चले ॥ २१-२२ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते पुरुषव्याघ्राः सदश्वैरनिलोपमैः । अभ्ययुः सहदाशार्हाः शिविरं पुनरेव हि ॥ २३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण-सहित वे पुरुषसिंह पाण्डव वहाँसे वायुके समान वेगशाली उत्तम घोड़ोंद्वारा पुनः अपने शिविरमें आ पहुँचे ॥ २३ ॥ अवतीर्य रथेभ्यस्तु त्वरमाणा महारथाः । ददृशुर्द्रौपदीं कृष्णामार्तामार्ततराः स्वयंम् ॥ २४ ॥ वहाँ रथोंसे उतरकर वे महारथी वीर बड़ी उतावलीके साथ आकर शोकपीड़ित द्रुपदकुमारी कृष्णासे मिले। वे स्वयं भी शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो रहे थे ॥ तामुपेत्य निरानन्दां दुःखशोकसमन्विताम् । परिवार्य व्यतिष्ठन्त पाण्डवाः सहकेशवाः ॥ २५ ॥ दुःख-शोकमें डूबी हुई आनन्दशून्य द्रौपदीके पास पहुँचकर श्रीकृष्णसहित पाण्डव उसे चारों ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ २५ ॥ ततो राजाभ्यनुज्ञातो भीमसेनो महाबलः । प्रददौ तं मणिं दिव्यं वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २६ ॥ तब राजाकी आज्ञा पाकर महाबली भीमसेनने वह दिव्य मणि द्रौपदीके हाथमें दे दी और इस प्रकार कहा— ॥ अयं भद्रे तव मणिः पुत्रहन्तुर्जितः स ते । उत्तिष्ठ शोकमत्सृज्य क्षात्रधर्ममनुस्मर ॥ २७ ॥ ‘भद्रे! यह तुम्हारे पुत्रोंका वध करनेवाले अश्वत्थामा-की मणि है। तुम्हारे उस शत्रुको हमने जीत लिया। अब शोक छोड़कर उठो और क्षत्रियधर्मका स्मरण करो ॥ २७ ॥ प्रयाणे वासुदेवस्य शमार्थमसितेक्षणे । यान्युक्तानि त्वया भीरु वाक्यानि मधुघातिनि ॥ २८ ॥ ‘कजरारे नेत्रोंवाली भोली-भाली कृष्णे! जब मधुसूदन श्रीकृष्ण कौरवोंके पास संधि करानेके लिये जा रहे थे, उस समय तुमने इनसे जो बातें कही थीं, उन्हें याद तो करो ॥ नैव मे पतयः सन्ति न पुत्रा भ्रातरो न च ।
न वै त्वमिति गोविन्द शममिच्छति राजनि ॥ २९ ॥
उक्तवत्यसि तीव्राणि वाक्यानि पुरुषोत्तमम् ।
क्षत्रधर्मानुरूपाणि तानि संस्मर्तुमर्हसि ॥ ३० ॥
'जब राजा युधिष्ठिर शान्तिके लिये संधि कर लेना चाहते थे, उस समय तुमने पुरुषोत्तम श्रीकृष्णसे बड़े कठोर वचन कहे थे—'गोविन्द! (मेरे अपमानको भुलाकर शत्रुओंके साथ संधि की जा रही है, इसलिये मैं समझती हूँ कि) न मेरे पति हैं, न पुत्र हैं, न भाई हैं और न तुम्हीं हो'। क्षत्रियधर्मके अनुसार कहे गये उन वचनोंको तुम्हें आज स्मरण करना चाहिये ॥ २९-३० ॥
हतो दुर्योधनः पापो राज्यस्य परिपन्थिकः ।
दुःशासनस्य रुधिरं पीतं विस्फुरतो मया ॥ ३१ ॥
वैरस्य गतमानृण्यं न स्म वाच्या विवक्षताम् ।
जित्वा मुक्तो द्रोणपुत्रो ब्राह्मण्यद् गौरवेण च ॥ ३२ ॥
'हमारे राज्यका लुटेरा पापी दुर्योधन मारा गया और छटपटाते हुए दुःशासनका रक्त भी मैंने पी लिया। वैरका भरपूर बदला चुका लिया गया। अब कुछ कहनेकी इच्छावाले लोग हमलोगोंकी निन्दा नहीं कर सकते। हमने द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको जीतकर केवल ब्राह्मण और गुरुपुत्र होने-के कारण ही उसे जीवित छोड़ दिया है ॥ ३१-३२ ॥
यशोऽस्य पतितं देवि शरीरं त्ववशेषितम् ।
वियोजितश्च मणिना भ्रंशितश्चायुधं भुवि ॥ ३३ ॥
'देवि! उसका सारा यश धूलमें मिल गया। केवल शरीर शेष रह गया है। उसकी मणि भी छीन ली गयी और उससे पृथ्वीपर हथियार डलवा दिया गया है' ॥
द्रौपद्युवाच
केवलानृण्यमाप्तास्मि गुरुपुत्रो गुरुर्मम ।
शिरस्येतं मणिं राजा प्रतिबध्नातु भारत ॥ ३४ ॥
द्रौपदी बोली—भरतनन्दन! गुरुपुत्र तो मेरे लिये भी गुरुके ही समान हैं। मैं तो केवल पुत्रोंके वधका प्रतिशोध लेना चाहती थी, वह पा गयी। अब महाराज इस मणिको अपने मस्तकपर धारण करें ॥ ३४ ॥
तं गृहीत्वा ततो राजा शिरस्येवाकरोत् तदा ।
गुरोरुच्छिष्टमित्येव द्रौपद्या वचनादपि ॥ ३५ ॥
तब राजा युधिष्ठिरने वह मणि लेकर द्रौपदीके कथनानुसार उसे अपने मस्तकपर ही धारण कर लिया। उन्होंने उस मणिको गुरुका प्रसाद ही समझा ॥ ३५ ॥
ततो दिव्यं मणिवरं शिरसा धारयन् प्रभुः ।
शुशुभे स तदा राजा सचन्द्र इव पर्वतः ॥ ३६ ॥
उस दिव्य एवं उत्तम मणिको मस्तकपर धारण करके शक्तिशाली राजा युधिष्ठिर चन्द्रोदयकी शोभासे युक्त उदयाचलके समान सुशोभित हुए ॥ ३६ ॥
उत्तस्थौ पुत्रशोकार्ता ततः कृष्णा मनस्विनी ।
कृष्णं चापि महाबाहुः परिपप्रच्छ धर्मराट् ॥ ३७ ॥
तब पुत्रशोकसे पीड़ित हुई मनस्विनी कृष्णा अनशन छोड़कर उठ गयी और महाबाहु धर्मराजने भगवान् श्रीकृष्णसे एक बात पूछी ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि द्रौपदीसान्त्वनायां षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें द्रौपदीकी सान्त्वनाविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥
अध्याय (पृष्ठ 3092)
सप्तदशोऽध्यायः
अपने समस्त पुत्रों और सैनिकोंके मारे जानेके विषयमें युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे पूछना और उत्तरमें श्रीकृष्णके द्वारा महादेवजीकी महिमाका प्रतिपादन
वैशम्पायन उवाच
हतेषु सर्वसैन्येषु सौप्तिके तै रथेस्त्रिभिः ।
शोचन् युधिष्ठिरो राजा दाशार्हमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! रातको सोते समय उन तीन महारथियोंने पाण्डवोंकी सारी सेनाओंका जो संहार कर डाला था, उसके लिये शोक करते हुए राजा युधिष्ठिरने दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
कथं नु कृष्ण पापेन क्षुद्रेणाकृतकर्मणा ।
द्रौणिना निहताः सर्वे मम पुत्रा महारथाः ॥ २ ॥
‘श्रीकृष्ण! नीच एवं पापात्मा द्रोणकुमारने कोई विशेष तप या पुण्यकर्म भी तो नहीं किया था, जिससे उसमें अलौकिक शक्ति आ जाती। फिर उसने मेरे सभी महारथी पुत्रोंका वध कैसे कर डाला? ॥ २ ॥
तथा कृतास्त्रविक्रान्ताः सहस्रशतयोधिनः ।
द्रुपदस्यात्मजाश्चैव द्रोणपुत्रेण पातिताः ॥ ३ ॥
‘द्रुपदके पुत्र तो अस्त्र-विद्याके पूरे पण्डित, पराक्रमी तथा लाखों योद्धाओंके साथ युद्ध करनेमें समर्थ थे तो भी द्रोणपुत्रने उन्हें मार गिराया, यह कितने आश्चर्यकी बात है? ॥ ३ ॥
यस्य द्रोणो महेष्वासो न प्रादादाहवे मुखम् ।
निजघ्ने रथिनां श्रेष्ठं धृष्टद्युम्नं कथं नु सः ॥ ४ ॥
‘महाधनुर्धर द्रोणाचार्य युद्धमें जिसके सामने मुँह नहीं दिखाते थे, उसी रथियोंमें श्रेष्ठ धृष्टद्युम्नको अश्वत्थामाने कैसे मार डाला? ॥ ४ ॥
किं नु तेन कृतं कर्म तथायुक्तं नरर्षभ ।
यदेकः समरे सर्वानवधीन्नो गुरोः सुतः ॥ ५ ॥
‘नरश्रेष्ठ! आचार्यपुत्रने ऐसा कौन-सा उपयुक्त कर्म किया था, जिससे उसने अकेले ही समरांगणमें हमारे सभी सैनिकोंका वध कर डाला’ ॥ ५ ॥
श्रीभगवानुवाच
नूनं स देवदेवानामीश्वरेश्वरमव्ययम् ।
जगाम शरणं द्रौणिरेकस्तेनावधीद् बहून् ॥ ६ ॥
श्रीभगवान् बोले—राजन्! निश्चय ही अश्वत्थामाने ईश्वरोंके भी ईश्वर देवाधिदेव अविनाशी भगवान् शिवकी शरण ली थी, इसीलिये उसने अकेले ही बहुत-से वीरोंका विनाश कर डाला ॥ ६ ॥
प्रसन्नो हि महादेवो दद्यादमरतामपि ।
वीर्यं च गिरिशो दद्याद् येनेन्द्रमपि शातयेत् ॥ ७ ॥
पर्वतपर शयन करनेवाले महादेवजी तो प्रसन्न होनेपर अमरत्व भी दे सकते हैं। वे उपासकको इतनी शक्ति दे देते हैं, जिससे वह इन्द्रको भी नष्ट कर सकता है ॥ ७ ॥
वेदाहं हि महादेवं तत्त्वेन भरतर्षभ ।
यानि चास्य पुराणानि कर्माणि विविधानि च ॥ ८ ॥
भरतश्रेष्ठ! मैं महादेवजीको यथार्थरूपसे जानता हूँ। उनके जो नाना प्रकारके प्राचीन कर्म हैं, उनसे भी मैं पूर्ण परिचित हूँ ॥ ८ ॥
आदिरेष हि भूतानां मध्यमन्तश्च भारत ।
विचेष्टते जगच्चेदं सर्वमस्यैव कर्मणा ॥ ९ ॥
भरतनन्दन! ये भगवान् शिव सम्पूर्ण भूतोंके आदि, मध्य और अन्त हैं। उन्हींके प्रभावसे यह सारा जगत् भाँति-भाँतिकी चेष्टाएँ करता है ॥ ९ ॥
एवं सिसृक्षुर्भूतानि ददर्श प्रथमं विभुः ।
पितामहोऽब्रवीच्चैनं भूतानि सृज मा चिरम् ॥ १० ॥
प्रभावशाली ब्रह्माजीने प्राणियोंकी सृष्टि करनेकी इच्छासे सबसे पहले महादेवजीको ही देखा था। तब पितामह ब्रह्माने उनसे कहा—'प्रभो! आप अविलम्ब सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि कीजिये' ॥ १० ॥
हरिकेशस्तथेत्युक्त्वा भूतानां दोषदर्शिवान् ।
दीर्घकालं तपस्तेपे मग्नोऽम्भसि महातपाः ॥ ११ ॥
यह सुन महादेवजी 'तथास्तु' कहकर भूतगणोंके नाना प्रकारके दोष देख जलमें मग्न हो गये और महान् तपका आश्रय ले दीर्घकालतक तपस्या करते रहे ॥ ११ ॥
सुमहान्तं ततः कालं प्रतीक्ष्यैनं पितामहः ।
स्रष्टारं सर्वभूतानां ससर्ज मनसा परम् ॥ १२ ॥
इधर पितामह ब्रह्माने सुदीर्घकालतक उनकी प्रतीक्षा करके अपने मानसिक संकल्पसे दूसरे सर्वभूतस्रष्टाको उत्पन्न किया ॥ १२ ॥
सोऽब्रवीत् पितरं दृष्ट्वा गिरिशं सुप्तमम्भसि ।
यदि मे नाग्रजोऽस्त्यन्यस्ततः स्रक्ष्याम्यहं प्रजाः ॥ १३ ॥
उस विराट् पुरुष या स्रष्टाने महादेवजीको जलमें सोया देख अपने पिता ब्रह्माजीसे कहा—'यदि दूसरा कोई मुझसे ज्येष्ठ न हो तो मैं प्रजाकी सृष्टि करूँगा' ॥ १३ ॥
तमब्रवीत् पिता नास्ति त्वदन्यः पुरुषोऽग्रजः ।
स्थाणुरेष जले मग्नो विस्रब्धः कुरु वैकृतम् ॥ १४ ॥
यह सुनकर पिता ब्रह्माने स्रष्टासे कहा—‘तुम्हारे सिवा दूसरा कोई अग्रज पुरुष नहीं है। ये स्थाणु (शिव) हैं भी तो पानीमें डूबे हुए हैं; अतः तुम निश्चिन्त होकर सृष्टिका कार्य आरम्भ करो’ ॥ १४ ॥
भूतान्यन्वसृजत् सप्त दक्षादींस्तु प्रजापतीन् ।
यैरिमं व्यकरोत् सर्वं भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥ १५ ॥
तब स्रष्टाने सात प्रकारके प्राणियों और दक्ष आदि प्रजापतियोंको उत्पन्न किया, जिनके द्वारा उन्होंने इस चार प्रकारके समस्त प्राणिसमुदायका विस्तार किया ॥ १५ ॥
ताः सृष्टमात्राः क्षुधिताः प्रजाः सर्वाः प्रजापतिम् ।
बिभक्षयिषवो राजन् सहसा प्राद्रवंस्तदा ॥ १६ ॥
राजन्! सृष्टि होते ही समस्त प्रजा भूखसे पीड़ित हो प्रजापतिको ही खा जानेकी इच्छासे सहसा उनके पास दौड़ी गयी ॥ १६ ॥
स भक्ष्यमाणस्त्राणार्थी पितामहमुपाद्रवत् ।
आभ्यो मां भगवांस्त्रातु वृत्तिरासां विधीयताम् ॥ १७ ॥
जब प्रजा प्रजापतिको अपना आहार बनानेके लिये उद्यत हुई, तब वे आत्मरक्षाके लिये बड़े वेगसे भागकर पितामह ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुए और बोले—‘भगवन्! आप मुझे इन प्रजाओंसे बचाइये और इनके लिये कोई जीविका-वृत्ति नियत कर दीजिये’ ॥ १७ ॥
ततस्ताभ्यो ददावन्नमोषधीः स्थावराणि च ।
जङ्गमानि च भूतानि दुर्बलानि बलीयसाम् ॥ १८ ॥
तब ब्रह्माजीने उन प्रजाओंको अन्न और ओषधि आदि स्थावर वस्तुएँ जीवन-निर्वाहके लिये दीं और अत्यन्त बलवान् हिंसक जन्तुओंके लिये दुर्बल जंगम प्राणियोंको ही आहार निश्चित कर दिया ॥ १८ ॥
विहितान्नाः प्रजास्तास्तु जग्मुः सृष्टा यथागतम् ।
ततो ववृधिरे राजन् प्रीतिमत्यः स्वयोनिषु ॥ १९ ॥
जिनकी सृष्टि हुई थी, उनके लिये जब भोजनकी व्यवस्था कर दी गयी, तब वे प्रजावर्गके लोग जैसे आये थे, वैसे लौट गये। राजन्! तदनन्तर सारी प्रजा अपनी ही योनियोंमें प्रसन्नतापूर्वक रहती हुई उत्तरोत्तर बढ़ने लगी ॥ १९ ॥
भूतग्रामे विवृद्धे तु तुष्टे लोकगुरावपि ।
उदतिष्ठज्जलाज्ज्येष्ठः प्रजाश्चेमा ददर्श सः ॥ २० ॥
जब प्राणिसमुदायकी भलीभाँति वृद्धि हो गयी और लोकगुरु ब्रह्मा भी संतुष्ट हो गये, तब वे ज्येष्ठ पुरुष शिव जलसे बाहर निकले। निकलनेपर उन्होंने इन समस्त प्रजाओंको देखा ॥ २० ॥
बहुरूपाः प्रजाः सृष्टा विवृद्धाश्च स्वतेजसा । चुक्रोध भगवान् रुद्रो लिङ्गं स्वं चाप्यविध्यत ॥ २१ ॥ अनेक रूपवाली प्रजाकी सृष्टि हो गयी और वह अपने ही तेजसे भलीभाँति बढ़ भी गयी। यह देखकर भगवान् रुद्र कुपित हो उठे और उन्होंने अपना लिंग काटकर फेंक दिया ॥ २१ ॥
तत् प्रविद्धं तथा भूमौ तथैव प्रत्यतिष्ठत । तमुवाचाव्ययो ब्रह्मा वचोभिः शमयन्निव ॥ २२ ॥ इस प्रकार भूमिपर डाला गया वह लिंग उसी रूपमें प्रतिष्ठित हो गया। तब अविनाशी ब्रह्माने अपने वचनोंद्वारा उन्हें शान्त करते हुए-से कहा— ॥ २२ ॥
किं कृतं सलिले शर्व चिरकालस्थितेन ते । किमर्थं चेदमुत्पाद्य लिङ्गं भूमौ प्रवेशितम् ॥ २३ ॥ ‘रुद्रदेव! आपने दीर्घकालतक जलमें स्थित रहकर कौन-सा कार्य किया है? और इस लिंगको उत्पन्न करके किसलिये पृथ्वीपर डाल दिया है?’ ॥ २३ ॥
सोऽब्रवीज्जातसंरम्भस्तथा लोकगुरुर्गुरुम् । प्रजाः सृष्टाः परेणेमाः किं करिष्याम्यनेन वै ॥ २४ ॥ यह प्रश्न सुनकर कुपित हुए जगद्गुरु शिवने ब्रह्माजीसे कहा—‘प्रजाकी सृष्टि तो दूसरेने कर डाली; फिर इस लिंगको रखकर मैं क्या करूँगा ॥ २४ ॥
तपसाधिगतं चान्नं प्रजार्थं मे पितामह । ओषध्यः परिवर्तरेन् यथैवं सततं प्रजाः ॥ २५ ॥ ‘पितामह! मैंने जलमें तपस्या करके प्रजाके लिये अन्न प्राप्त किया है; वे अन्नरूप ओषधियाँ प्रजाओंके ही समान निरन्तर विभिन्न अवस्थाओंमें परिणत होती रहेंगी’ ॥
एवमुक्त्वा स संक्रोधो जगाम विमना भवः । गिरेर्मुञ्जवतः पादं तपस्तप्तुं महातपाः ॥ २६ ॥ ऐसा कहकर क्रोधमें भरे हुए महातपस्वी महादेवजी उदास मनसे मुंजवान् पर्वतकी घाटीपर तपस्या करनेके लिये चले गये ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि युधिष्ठिरकृष्णसंवादे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें युधिष्ठिर और श्रीकृष्णका संवादविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
अध्याय (पृष्ठ 3096)
अष्टादशोऽध्यायः
महादेवजीके कोपसे देवता, यज्ञ और जगत्की दुरवस्था तथा उनके प्रसादसे सबका स्वस्थ होना
श्रीभगवानुवाच
ततो देवयुगेऽतीते देवा वै समकल्पयन् ।
यज्ञं वेदप्रमाणेण विधिवद् यष्टुमीप्सवः ॥ १ ॥
**श्रीभगवान् बोले—**तदनन्तर सत्ययुग बीत जाने-पर देवताओंने विधिपूर्वक भगवान्का यजन करनेकी इच्छासे वैदिक प्रमाणके अनुसार यज्ञकी कल्पना की ॥ १ ॥
कल्पयामासुरथ ते साधनानि हवींषि च ।
भागार्हा देवताश्चैव यज्ञियं द्रव्यमेव च ॥ २ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने यज्ञके साधनों, हविष्यों, यज्ञभागके अधिकारी देवताओं और यज्ञोपयोगी द्रव्योंकी कल्पना की ॥ २ ॥
ता वै रुद्रमजानन्त्यो याथातथ्येन देवताः ।
नाकल्पयन्त देवस्य स्थाणोर्भागं नराधिप ॥ ३ ॥
नरेश्वर! उस समय देवता भगवान् रुद्रको यथार्थ-रूपसे नहीं जानते थे; इसलिये उन्होंने 'स्थाणु' नामधारी भगवान् शिवके भागकी कल्पना नहीं की ॥ ३ ॥
सोऽकल्प्यमाने भागे तु कृत्तिवासा मखेऽमरैः ।
ततः साधनमन्विच्छन् धनुरादौ ससर्ज ह ॥ ४ ॥
जब देवताओंने यज्ञमें उनका कोई भाग नियत नहीं किया, तब व्याघ्रचर्मधारी भगवान् शिवने उनके दमनके लिये साधन जुटानेकी इच्छा रखकर सबसे पहले धनुषकी सृष्टि की ॥ ४ ॥
लोकयज्ञः क्रियायज्ञो गृहयज्ञः सनातनः ।
पञ्चभूतनृयज्ञश्च जज्ञे सर्वमिदं जगत् ॥ ५ ॥
लोकयज्ञ, क्रियायज्ञ, सनातन गृहयज्ञ, पंचभूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ—ये पाँच प्रकारके यज्ञ हैं। इन्हींसे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है ॥ ५ ॥
लोकयज्ञैर्नृयज्ञैश्च कपर्दी विदधे धनुः ।
धनुः सृष्टमभूत् तस्य पञ्चकिष्कुप्रमाणतः ॥ ६ ॥
मस्तकपर जटाजूट धारण करनेवाले भगवान् शिवने लोकयज्ञ और मनुष्ययज्ञोंसे एक धनुषका निर्माण किया। उनका वह धनुष पाँच हाथ लंबा बनाया गया था ॥ ६ ॥
वषट्कारोऽभवज्ज्या तु धनुषस्तस्य भारत ।
यज्ञाङ्गानि च चत्वारि तस्य संहननेऽभवन् ॥ ७ ॥
भरतनन्दन! वषट्कार उस धनुषकी प्रत्यंचा था। यज्ञके चारों अंग स्नान, दान, होम और जप उन भगवान् शिवके लिये कवच हो गये ॥ ७ ॥
ततः क्रुद्धो महादेवस्तदुपादाय कार्मुकम् ।
आजगामाथ तत्रैव यत्र देवाः समीजिरे ॥ ८ ॥
तदनन्तर कुपित हुए महादेवजी उस धनुषको लेकर उसी स्थानपर आये, जहाँ देवतालोग यज्ञ कर रहे थे ॥ ८ ॥
तमात्तकार्मुकं दृष्ट्वा ब्रह्मचारिणमव्ययम् ।
विव्यथे पृथिवी देवी पर्वताश्च चकम्पिरे ॥ ९ ॥
उन ब्रह्मचारी एवं अविनाशी रुद्रको हाथमें धनुष उठाये देख पृथिवीदेवीको बड़ी व्यथा हुई और पर्वत भी काँपने लगे ॥ ९ ॥
न ववौ पवनश्चैव नाग्निर्जज्वाल वैधितः ।
व्यभ्रमच्चापि संविग्नं दिवि नक्षत्रमण्डलम् ॥ १० ॥
हवाकी गति रुक गयी, आग समिधा और घी आदिसे जलानेकी चेष्टा की जानेपर भी प्रज्वलित नहीं होती थी और आकाशमें नक्षत्रोंका समूह उद्विग्न होकर घूमने लगा ॥ १० ॥
न बभौ भास्करश्चापि सोमः श्रीमुक्तमण्डलः ।
तिमिरेणाकुलं सर्वमाकाशं चाभवद् वृतम् ॥ ११ ॥
सूर्य भी पूर्णतः प्रकाशित नहीं हो रहे थे, चन्द्रमण्डल भी श्रीहीन हो गया था तथा सारा आकाश अन्धकारसे व्याप्त हो रहा था ॥ ११ ॥
अभिभूतास्ततो देवा विषयान्न प्रजज्ञिरे ।
न प्रत्यभाच्च यज्ञः स देवतास्त्रेसिरे तथा ॥ १२ ॥
उससे अभिभूत होकर देवता किसी विषयको पहचान नहीं पाते थे, वह यज्ञ भी अच्छी तरह प्रतीत नहीं होता था। इससे सारे देवता भयसे थर्रा उठे ॥ १२ ॥
ततः स यज्ञं विव्याध रौद्रेण हृदि पत्रिणा ।
अपक्रान्तस्ततो यज्ञो मृगो भूत्वा सपावकः ॥ १३ ॥
तदनन्तर रुद्रदेवने भयंकर बाणके द्वारा उस यज्ञके हृदयमें आघात किया। तब अग्निसहित यज्ञ मृगका रूप धारण करके वहाँसे भाग निकला ॥ १३ ॥
स तु तेनैव रूपेण दिवं प्राप्य व्यराजत ।
अन्वीयमानो रुद्रेण युधिष्ठिर नभस्तले ॥ १४ ॥
वह उसी रूपसे आकाशमें पहुँचकर (मृगशिरा नक्षत्रके रूपमें) प्रकाशित होने लगा। युधिष्ठिर! आकाश-मण्डलमें रुद्रदेव उस दशामें भी (आर्द्रा नक्षत्रके रूपमें) उसके पीछे लगे रहते हैं ॥ १४ ॥
अपक्रान्ते ततो यज्ञे संज्ञा न प्रत्यभात् सुरान् ।
नष्टसंज्ञेषु देवेषु न प्राज्ञायत किंचन ॥ १५ ॥