महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः
वेदव्यासजीकी आज्ञासे अर्जुनके द्वारा अपने अस्त्रका उपसंहार तथा अश्वत्थामाका अपनी मणि देकर पाण्डवोंके गर्भोंपर दिव्यास्त्र छोड़ना
वैशम्पायन उवाच
दृष्ट्वैव नरशार्दूल तावग्निसमतेजसौ ।
गाण्डीवधन्वा संचिन्त्य प्राप्तकालं महारथः ।
संजहार शरं दिव्यं त्वरमाणो धनंजयः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नरश्रेष्ठ! उन अग्निके समान तेजस्वी दोनों महर्षियोंके देखते ही गाण्डीवधारी महारथी अर्जुनने समयोचित कर्तव्यका विचार करके बड़ी फुर्तीसे अपने दिव्यास्त्रका उपसंहार आरम्भ किया ॥ १ ॥
उवाच भरतश्रेष्ठ तावृषी प्राञ्जलिस्तदा ।
प्रमुक्तमस्त्रमस्त्रेण शाम्यतामिति वै मया ॥ २ ॥
संहृते परमास्त्रेऽस्मिन् सर्वानस्मानशेषतः ।
पापकर्मा ध्रुवं द्रौणिः प्रधक्ष्यत्यस्त्रतेजसा ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस समय उन्होंने हाथ जोड़कर उन दोनों महर्षियोंसे कहा—'मुनिवरो! मैंने तो इसी उद्देश्यसे यह अस्त्र छोड़ा था कि इसके द्वारा शत्रु का छोड़ा हुआ ब्रह्मास्त्र शान्त हो जाय। अब इस उत्तम अस्त्रको लौटा लेनेपर पापाचारी अश्वत्थामा अपने अस्त्रके तेजसे अवश्य ही हम सब लोगोंको भस्म कर डालेगा ॥ २-३ ॥
यदत्र हितमस्माकं लोकानां चैव सर्वथा ।
भवन्तौ देवसंकाशौ तथा सम्मन्तुमर्हतः ॥ ४ ॥
'आप दोनों देवताके तुल्य हैं; अतः इस समय जैसा करनेसे हमारा और सब लोगोंका सर्वथा हित हो, उसीके लिये आप हमें सलाह दें' ॥ ४ ॥
इत्युक्त्वा संजहारास्त्रं पुनरेवं धनंजयः ।
संहारो दुष्करस्तस्य देवैरपि हि संयुगे ॥ ५ ॥
विसृष्टस्य रणे तस्य परमास्त्रस्य संग्रहे ।
अशक्तः पाण्डवादन्यः साक्षादपि शतक्रतुः ॥ ६ ॥
ऐसा कहकर अर्जुनने पुनः उस अस्त्रको पीछे लौटा लिया। युद्धमें उसे लौटा लेना देवताओंके लिये भी दुष्कर था। संग्राममें एक बार उस दिव्य अस्त्रको छोड़ देनेपर पुनः उसे लौटा लेनेमें पाण्डुपुत्र अर्जुनके सिवा साक्षात् इन्द्र भी समर्थ नहीं थे ॥ ५-६ ॥