महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3082, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मतेजोद्भवं तद्धि विसृष्टमकृतात्मना । न शक्यमावर्तयितुं ब्रह्मचारिव्रतादृते ॥ ७ ॥ वह अस्त्र ब्रह्मतेजसे प्रकट हुआ था। यदि अजितेन्द्रिय पुरुषके द्वारा इसका प्रयोग किया गया हो तो उसके लिये इसे पुनः लौटाना असम्भव है; क्योंकि ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किये बिना कोई इसे लौटा नहीं सकता ॥ ७ ॥
अचीर्णब्रह्मचर्यो यः सृष्ट्वा वर्तयते पुनः । तदस्त्रं सानुबन्धस्य मूर्धानं तस्य कृन्तति ॥ ८ ॥ जिसने ब्रह्मचर्यका पालन नहीं किया हो, वह पुरुष यदि उसका एक बार प्रयोग करके उसे फिर लौटानेका प्रयत्न करे तो वह अस्त्र सगे-सम्बन्धियोंसहित उसका सिर काट लेता था ॥ ८ ॥
ब्रह्मचारी व्रती चापि दुरवापमवाप्य तत् । परमव्यसनार्तोऽपि नार्जुनोऽस्त्रं व्यमुञ्चत ॥ ९ ॥ अर्जुनने ब्रह्मचारी तथा व्रतधारी रहकर ही उस दुर्लभ अस्त्रको प्राप्त किया था। वे बड़े-से-बड़े संकटमें पड़नेपर भी कभी उस अस्त्रका प्रयोग नहीं करते थे ॥ ९ ॥
सत्यव्रतधरः शूरो ब्रह्मचारी च पाण्डवः । गुरुवर्ती च तेनास्त्रं संजहारार्जुनः पुनः ॥ १० ॥ सत्यव्रतधारी, ब्रह्मचारी, शूरवीर पाण्डव अर्जुन गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाले थे; इसलिये उन्होंने फिर उस अस्त्रको लौटा लिया ॥ १० ॥
द्रौणिर्प्यथ सम्प्रेक्ष्य तावृषी पुरतः स्थितौ । न शशाक पुनर्घोरमस्त्रं संहर्तुमोजसा ॥ ११ ॥ अश्वत्थामाने भी जब उन ऋषियोंको अपने सामने खड़ा देखा तो उस घोर अस्त्रको बलपूर्वक लौटा लेनेका प्रयत्न किया, किंतु वह उसमें सफल न हो सका ॥ ११ ॥
अशक्तः प्रतिसंहारे परमास्त्रस्य संयुगे । द्रौणिर्दीनमना राजन् द्वैपायनमभाषत ॥ १२ ॥ राजन्! युद्धमें उस दिव्य अस्त्रका उपसंहार करनेमें समर्थ न होनेके कारण द्रोणकुमार मन-ही-मन बहुत दुःखी हुआ और व्यासजीसे इस प्रकार बोला— ॥ १२ ॥
उत्तमव्यसनार्तेन प्राणत्राणमभीप्सुना । मयैतदस्त्रमुत्सृष्टं भीमसेनभयान्मुने ॥ १३ ॥ 'मुने! मैंने भीमसेनके भयसे भारी संकटमें पड़कर अपने प्राणोंको बचानेके लिये ही यह अस्त्र छोड़ा था ॥
अधर्मश्च कृतोऽनेन धार्तराष्ट्रं जिघांसता । मिथ्याचारेण भगवन् भीमसेनेन संयुगे ॥ १४ ॥