महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवह उस वनका अनुसरण करता इधर-उधर दौड़ता तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें ढूँढ़ता फिरता था कि कहीं मुझे शरण मिले ।। ६१/२ ।। स तेषां छिद्रमन्विच्छन् प्रद्रुतो भयपीडितः ।। ७ ।। न च निर्याति वै दूरं न वा तैर्विप्रमोच्यते । वह उन हिंसक जन्तुओंका छिद्र देखता हुआ भयसे पीड़ित हो भागने लगा; परंतु न तो वहाँसे दूर निकल पाता था और न वे ही उसका पीछा छोड़ते थे ।। ७१/२ ।। अथापश्यद् वनं घोरं समन्ताद् वागुरावृतम् ।। ८ ।। बाहुभ्यां सम्परिक्षिप्तं स्त्रिया परमघोरया । इतनेहीमें उसने देखा कि वह भयानक वन चारों ओरसे जालसे घिरा हुआ है और एक बड़ी भयानक स्त्रीने अपनी दोनों भुजाओंसे उसको आवेष्टित कर रखा है ।। पञ्चशीर्षधरैर्नागैः शैलैरिव समुन्नतैः ।। ९ ।। नभःस्पृशैर्महावृक्षैः परिक्षिप्तं महावनम् । पर्वतोंके समान ऊँचे और पाँच सिरवाले नागों तथा बड़े-बड़े गगनचुम्बी वृक्षोंसे वह विशाल वन व्याप्त हो रहा है ।। ९१/२ ।। वनमध्ये च तत्राभूदुदपानः समावृतः ।। १० ।। वल्लीभिस्तृणछन्नाभिर्दृढाभिरभिसंवृतः । उस वनके भीतर एक कुआँ था, जो घासोंसे ढकी हुई सुदृढ़ लताओंके द्वारा सब ओरसे आच्छादित हो गया था ।। पपात स द्विजस्तत्र निगूढे सलिलाशये ।। ११ ।। विलग्नश्चाभवत् तस्मिन् लतासंतानसंकुले । वह ब्राह्मण उस छिपे हुए कुएँमें गिर पड़ा; परंतु लतावेलोंसे व्याप्त होनेके कारण वह उसमें फँसकर नीचे नहीं गिरा, ऊपर ही लटका रह गया ।। १११/२ ।। पनसस्य यथा जातं वृन्तबद्धं महाफलम् ।। १२ ।। स तथा लम्बते तत्र ह्यूर्ध्वपादो ह्यधःशिराः । जैसे कटहलका विशाल फल वृन्तमें बँधा हुआ लटकता रहता है, उसी प्रकार वह ब्राह्मण ऊपरको पैर और नीचेको सिर किये उस कुएँमें लटक गया ।। १२१/२ ।। अथ तत्रापि चान्योऽस्य भूयो जात उपद्रवः ।। १३ ।। कूपमध्ये महानागमपश्यत महाबलम् । कूपवीनाहवेलायामपश्यत महागजम् ।। १४ ।। षड्वक्त्रं कृष्णशुक्लं च द्विषट्कपदचारिणम् ।