भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 3122, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 3122

वहाँ भी उसके सामने पुनः दूसरा उपद्रव खड़ा हो गया। उसने कूपके भीतर एक महाबली महानाग बैठा हुआ देखा तथा कुएँके ऊपरी तटपर उसके मुखबन्धके पास एक विशाल हाथीको खड़ा देखा, जिनके छः मुँह थे। वह सफेद और काले रंगका था तथा बारह पैरोंसे चला करता था ।। १३-१४ १/२ ।। क्रमेण परिसर्पन्तं वल्लीवृक्षसमावृतम् ॥ १५ ॥ तस्य चापि प्रशाखासु वृक्षशाखावलम्बिनः । नानारूपा मधुकरा घोररूपा भयावहाः ॥ १६ ॥ आसते मधु संवृत्य पूर्वमेव निकेतजाः । वह लताओं तथा वृक्षोंसे घिरे हुए उस कूपमें क्रमशः बढ़ा आ रहा था। वह ब्राह्मण, जिस वृक्षकी शाखापर लटका था, उसकी छोटी-छोटी टहनियोंपर पहलेसे ही मधुके छत्तोंसे पैदा हुई अनेक रूपवाली, घोर एवं भयंकर मधुमक्खियाँ मधुको घेरकर बैठी हुई थीं ।। १५-१६ १/२ ।। भूयो भूयः समीहन्ते मधूनि भरतर्षभ ॥ १७ ॥ स्वादनीयानि भूतानां यैर्बालो विप्रकृष्यते । भरतश्रेष्ठ! समस्त प्राणियोंको स्वादिष्ट प्रतीत होनेवाले उस मधुको, जिसपर बालक आकृष्ट हो जाते हैं, वे मक्खियाँ बारंबार पीना चाहती थीं ।। १७ १/२ ।। तेषां मधूनां बहुधा धारा प्रस्रवते तदा ॥ १८ ॥ आलम्बमानः स पुमान् धारां पिबति सर्वदा । उस समय उस मधुकी अनेक धाराएँ वहाँ झर रही थीं और वह लटका हुआ पुरुष निरन्तर उस मधुधाराको पी रहा था ।। १८ १/२ ।। न चास्य तृष्णा विरता पिबमानस्य संकटे ॥ १९ ॥ अभीप्सति तदा नित्यमतृप्तः स पुनः पुनः । यद्यपि वह संकटमें था तो भी उस मधुको पीते-पीते उसकी तृष्णा शान्त नहीं होती थी। वह सदा अतृप्त रहकर ही बारंबार उसे पीनेकी इच्छा रखता था ।। १९ १/२ ।। न चास्य जीविते राजन् निर्वेदः समजायत ॥ २० ॥ तत्रैव च मनुष्यस्य जीविताशा प्रतिष्ठिता । राजन्! उसे अपने उस संकटपूर्ण जीवनसे वैराग्य नहीं हुआ है। उस मनुष्यके मनमें वहीं उसी दशासे जीवित रहकर मधु पीते रहनेकी आशा जड़ जमाये हुए है ।। २० १/२ ।। कृष्णाः श्वेताश्च तं वृक्षं कुट्टयन्ति च मूषिकाः ॥ २१ ॥ व्यालैश्च वनदुर्गान्ते स्त्रिया च परमोग्रया । कूपाधस्ताच्च नागेन वीनाहे कुञ्जरेण च ॥ २२ ॥ वृक्षप्रपाताच्च भयं मूषिकेभ्यश्च पञ्चमम् ।