महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3128, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यक्षाश्च परोक्षाश्च ते व्यालाः कथिता बुधैः ॥ ७ ॥ मनुष्योंकी जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शारीरिक और मानसिक व्याधियाँ हैं, उन्हींको विद्वानोंने सर्प एवं हिंसक जीव बताया है ॥ ७ ॥ क्लिश्यमानाश्च तैर्नित्यं वार्यमाणाश्च भारत । स्वकर्मभिर्महाव्यालैर्नोद्विजन्त्यल्पबुद्धयः ॥ ८ ॥ भरतनन्दन! अपने कर्मरूपी इन महान् हिंसक जन्तुओंसे सदा सताये तथा रोके जानेपर भी मन्दबुद्धि मानव संसारसे उद्विग्न या विरक्त नहीं होते हैं ॥ ८ ॥ अथापि तैर्विमुच्येत व्याधिभिः पुरुषो नृप । आवृणोत्येव तं पश्चाज्जरा रूपविनाशिनी ॥ ९ ॥ शब्दरूपरसस्पर्शैर्गन्धैश्च विविधैरपि । मज्जमांसमहापङ्के निरालम्बे समन्ततः ॥ १० ॥ नरेश्वर! यदि शब्द, स्पर्श, रूप, रस और नाना प्रकारकी गन्धोंसे युक्त, मज्जा और मांसरूपी बड़ी भारी कीचड़से भरे हुए एवं सब ओरसे अवलम्बशून्य इस शरीररूपी कूपमें रहनेवाला मनुष्य इन व्याधियोंसे किसी तरह मुक्त हो जाय तो भी अन्तमें रूप-सौन्दर्यका विनाश करनेवाली वृद्धावस्था तो उसे घेर ही लेती है ॥ संवत्सराश्च मासाश्च पक्षाहोरात्रसंधयः । क्रमेणास्योपयुञ्जन्ति रूपमायुस्तथैव च ॥ ११ ॥ एते कालस्य निधयो नैतान् जानन्ति दुर्बुधाः । धात्राभिलिखितान्याहुः सर्वभूतानि कर्मणा ॥ १२ ॥ वर्ष, मास, पक्ष, दिन-रात और संध्याएँ क्रमशः इसके रूप और आयुका शोषण करती ही रहती हैं। ये सब कालके प्रतिनिधि हैं। मूढ़ मनुष्य इन्हें इस रूपमें नहीं जानते हैं। श्रेष्ठ पुरुषोंका कथन है कि विधाताने सम्पूर्ण भूतोंके ललाटमें कर्मके अनुसार रेखा खींच दी है (प्रारब्धके अनुसार उनकी आयु और सुख-दुःखके भोग नियत कर दिये हैं) ॥ रथः शरीरं भूतानां सत्त्वमाहुस्तु सारथिम् । इन्द्रियाणि हयानाहुः कर्मबुद्धिस्तु रश्मयः ॥ १३ ॥ तेषां हयानां यो वेगं धावतामनुधावति । स तु संसारचक्रेऽस्मिंश्चक्रवत् परिवर्तते ॥ १४ ॥ विद्वान् पुरुष कहते हैं कि प्राणियोंका शरीर रथके समान है, सत्त्व (सत्त्वगुणप्रधान बुद्धि) सारथि है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं और मन लगाम है। जो पुरुष स्वेच्छापूर्वक दौड़ते हुए उन घोड़ोंके वेगका अनुसरण करता है, वह तो इस संसारचक्रमें पहियेके समान घूमता रहता है ॥ यस्तान् संयमते बुद्ध्या संयतो न निवर्तते । ये तु संसारचक्रेऽस्मिंश्चक्रवत् परिवर्तते ॥ १५ ॥