महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभ्रममाणा न मुह्यन्ति संसारे न भ्रमन्ति ते ।
किंतु जो संयमशील होकर बुद्धिके द्वारा उन इन्द्रियरूपी अश्वोंको काबूमें रखते हैं, वे फिर इस संसारमें नहीं लौटते। जो लोग चक्रकी भाँति घूमनेवाले इस संसारचक्रमें घूमते हुए भी मोहके वशीभूत नहीं होते हैं, उन्हें फिर संसारमें नहीं भटकना पड़ता ।। १५ १/२ ।।
संसारे भ्रमतां राजन् दुःखमेतद्धि जायते ।। १६ ।।
तस्मादस्य निवृत्त्यर्थं यत्नमेवाचरेद् बुधः ।
उपेक्षा नात्र कर्तव्या शतशाखः प्रवर्धते ।। १७ ।।
राजन्! संसारमें भटकनेवालोंको यह दुःख प्राप्त होता ही है; अतः विज्ञ पुरुषको इस संसारबन्धनकी निवृत्तिके लिये अवश्य यत्न करना चाहिये। इस विषयमें कदापि उपेक्षा नहीं करनी चाहिये; नहीं तो यह संसार सैकड़ों शाखाओंमें फैलकर बहुत बड़ा हो जाता है ।। १६-१७ ।।
यतेन्द्रियो नरो राजन् क्रोधलोभनिराकृतः ।
संतुष्टः सत्यवादी यः स शान्तिमधिगच्छति ।। १८ ।।
राजन्! जो मनुष्य जितेन्द्रिय, क्रोध और लोभसे शून्य, संतोषी तथा सत्यवादी होता है, उसे शान्ति प्राप्त होती है ।। १८ ।।
याम्यमाहू रथं ह्येनं मुह्यन्ते येन दुर्बुधाः ।
स चैतत् प्राप्नुयाद् राजन् यत् त्वं प्राप्तो नराधिप ।। १९ ।।
नरेश्वर! इस संसारको याम्य (यमलोककी प्राप्ति करानेवाला) रथ कहते हैं, जिससे मूर्ख मनुष्य मोहित हो जाते हैं। राजन्! जो दुःख आपको प्राप्त हुआ है, वही प्रत्येक अज्ञानी पुरुषको उपलब्ध होता है ।। १९ ।।
अनुतर्षुलमैवैतद् दुःखं भवति मारिष ।
राज्यनाशं सुहृन्नाशं सुतनाशं च भारत ।। २० ।।
माननीय भारत! जिसकी तृष्णा बढ़ी हुई है, उसीको राज्य, सुहृद् और पुत्रोंका नाशरूपी यह महान् दुःख प्राप्त होता है ।। २० ।।
साधुः परमदुःखानां दुःखभैषज्यमाचरेत् ।
ज्ञानौषधमवाप्येह दूरपारं महौषधम् ।
छिन्द्याद् दुःखमहाव्याधिं नरः संयतमानसः ।। २१ ।।
साधु पुरुषको चाहिये कि वह अपने मनको वशमें करके ज्ञानरूपी महान् ओषधि प्राप्त करे, जो परम दुर्लभ है। उससे अपने बड़े-से-बड़े दुःखोंकी चिकित्सा करे। उस ज्ञानरूपी ओषधिसे दुःखरूपी महान् व्याधिका नाश कर डाले ।। २१ ।।
न विक्रमो न चाप्यर्थो न मित्रं न सुहृज्जनः ।
तथोन्मोचयते दुःखाद् यथाऽऽत्मा स्थिरसंयमः ।। २२ ।।