महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3130, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपराक्रम, धन, मित्र और सुहृद् भी उस तरह दुःखसे छुटकारा नहीं दिला सकते, जैसा कि दृढ़तापूर्वक संयममें रहनेवाला अपना मन दिला सकता है ॥ २२ ॥ तस्मान्मैत्रं समास्थाय शीलमापद्य भारत । दमस्त्यागोऽप्रमादश्च ते त्रयो ब्रह्मणो हयाः ॥ २३ ॥ शीलरश्मिसमायुक्तः स्थितो यो मानसे रथे । त्यक्त्वा मृत्युभयं राजन् ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥ २४ ॥ भरतनन्दन! इसलिये सर्वत्र मैत्रीभाव रखते हुए शील प्राप्त करना चाहिये। दम, त्याग और अप्रमाद—ये तीन परमात्माके धाममें ले जानेवाले घोड़े हैं। जो मनुष्य शीलरूपी लगामको पकड़कर इन तीनों घोड़ोंसे जुते हुए मनरूपी रथपर सवार होता है, वह मृत्युका भय छोड़कर ब्रह्मलोकमें चला जाता है ॥ २३-२४ ॥ अभयं सर्वभूतेभ्यो यो ददाति महीपते । स गच्छति परं स्थानं विष्णोः पदमनामयम् ॥ २५ ॥ भूपाल! जो सम्पूर्ण प्राणियोंको अभयदान देता है, वह भगवान् विष्णुके अविनाशी परमधाममें चला जाता है ॥ २५ ॥ न तत् क्रतुसहस्रेण नोपवासैश्च नित्यशः । अभयस्य च दानेन यत् फलं प्राप्नुयान्नरः ॥ २६ ॥ अभयदानसे मनुष्य जिस फलको पाता है, वह उसे सहस्रों यज्ञ और नित्यप्रति उपवास करनेसे भी नहीं मिल सकता है ॥ २६ ॥ न ह्यात्मनः प्रियतरं किंचिद् भूतेषु निश्चितम् । अनिष्टं सर्वभूतानां मरणं नाम भारत ॥ २७ ॥ तस्मात् सर्वेषु भूतेषु दया कार्या विपश्चिता । भारत! यह बात निश्चितरूपसे कही जा सकती है कि प्राणियोंको अपने आत्मासे अधिक प्रिय कोई भी वस्तु नहीं है; इसीलिये मरना किसी भी प्राणीको अच्छा नहीं लगता; अतः विद्वान् पुरुषको सभी प्राणियोंपर दया करनी चाहिये ॥ २७ १/२ ॥ नानामोहसमायुक्ता बुद्धिजालेन संवृताः ॥ २८ ॥ असूक्ष्मदृष्टयो मन्दा भ्राम्यन्ते तत्र तत्र ह । जो मूढ़ नाना प्रकारके मोहमें डूबे हुए हैं, जिन्हें बुद्धिके जालने बाँध रखा है और जिनकी दृष्टि स्थूल है, वे भिन्न-भिन्न योनियोंमें भटकते रहते हैं ॥ २८ १/२ ॥ सुसूक्ष्मदृष्टयो राजन् व्रजन्ति ब्रह्म शाश्वतम् ॥ २९ ॥ (एवं ज्ञात्वा महाप्राज्ञ स तेषामौर्ध्वदेहिकम् । कर्तुमर्हसि तेनैव फलं प्राप्स्यति वै भवान् ॥) राजन्! महाप्राज्ञ! सूक्ष्मदर्शी ज्ञानी पुरुष सनातन ब्रह्मको प्राप्त होते हैं, ऐसा जानकर आप अपने मरे हुए सगे-सम्बन्धियोंका और्ध्वदेहिक संस्कार कीजिये। इसीसे आपको उत्तम