महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘प्रभो! पुत्र, धन, कुटुम्ब और सम्बन्धियोंका नाश होनेपर तो विष पीने और आगमें जलनेके समान बड़ा भारी दुःख भोगना पड़ता है ॥ ७ ॥ येन दह्यन्ति गात्राणि येन प्रज्ञा विनश्यति । येनाभिभूतः पुरुषो मरणं बहु मन्यते ॥ ८ ॥ ‘उस दुःखसे सारा शरीर जलने लगता है, बुद्धि नष्ट हो जाती है और उस असह्य शोकसे पीड़ित हुआ पुरुष जीनेकी अपेक्षा मर जाना अधिक अच्छा समझता है ॥ तदिदं व्यसनं प्राप्तं मया भाग्यविपर्ययात् । तस्यान्तं नाधिगच्छामि ऋते प्राणविमोक्षणात् ॥ ९ ॥ ‘आज भाग्यके फेरसे वही यह स्वजनोंके विनाशका महान् दुःख मुझे प्राप्त हुआ है। अब प्राण त्याग देनेके सिवा और किसी उपायद्वारा मैं इस दुःखसे पार नहीं पा सकता ॥ ९ ॥ तथैवाहं करिष्यामि अद्यैव द्विजसत्तम । इत्युक्त्वा तु महात्मानं पितरं ब्रह्मवित्तमम् ॥ १० ॥ धृतराष्ट्रोऽभवन्मूढः स शोकं परमं गतः । अभूच्च तूष्णीं राजासौ ध्यायमानो महीपते ॥ ११ ॥ ‘द्विजश्रेष्ठ! इसलिये आज ही मैं अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगा।’ अपने ब्रह्मवेत्ता पिता महात्मा व्यासजीसे ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्र अत्यन्त शोकमें डूब गये और सुध-बुध खो बैठे। राजन्! पुत्रोंका ही चिन्तन करते हुए वे बूढ़े नरेश वहाँ मौन होकर बैठे रह गये ॥ १०-११ ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृष्णद्वैपायनः प्रभुः । पुत्रशोकाभिसंतप्तं पुत्रं वचनमब्रवीत् ॥ १२ ॥ उनकी बात सुनकर शक्तिशाली महात्मा श्रीकृष्ण-द्वैपायन व्यास पुत्रशोकसे संतप्त हुए अपने बेटेसे इस प्रकार बोले— ॥ १२ ॥
व्यास उवाच
धृतराष्ट्र महाबाहो यत् त्वां वक्ष्यामि तच्छृणु । श्रुतवानसि मेधावी धर्मार्थकुशलः प्रभो ॥ १३ ॥ **व्यासजीने कहा—**महाबाहु धृतराष्ट्र! मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। प्रभो! तुम वेदशास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न, मेधावी तथा धर्म और अर्थके साधनमें कुशल हो ॥ १३ ॥ न तेऽस्त्यविदितं किंचिद् वेदितव्यं परंतप । अनित्यतां हि मर्त्यानां विजानासि न संशयः ॥ १४ ॥