भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3134

शत्रुसंतापी नरेश! जाननेयोग्य जो कोई भी तत्त्व है, वह तुमसे अज्ञात नहीं है। तुम मानव-जीवनकी अनित्यताको अच्छी तरह जानते हो, इसमें संशय नहीं है ॥ १४ ॥ अध्रुवे जीवलोके च स्थाने वा शाश्वते सति । जीविते मरणान्ते च कस्माच्छोचसि भारत ॥ १५ ॥ भरतनन्दन! जब जीव-जगत् अनित्य है, सनातन परम पद नित्य है और इस जीवनका अन्त मृत्युमें ही है, तब तुम इसके लिये शोक क्यों करते हो? ॥ १५ ॥ प्रत्यक्षं तव राजेन्द्र वैरस्यास्य समुद्भवः । पुत्रं ते कारणं कृत्वा कालयोगेन कारितः ॥ १६ ॥ राजेन्द्र! तुम्हारे पुत्रको निमित्त बनाकर कालकी प्रेरणासे इस वैरकी उत्पत्ति तो तुम्हारे सामने ही हुई थी ॥ अवश्यं भवितव्ये च कुरूणां वैशसे नृप । कस्माच्छोचसि तान् शूरान् गतान् परमिकां गतिम् ॥ १७ ॥ नरेश्वर! जब कौरवोंका यह विनाश अवश्यम्भावी था, तब परम गतिको प्राप्त हुए शूरवीरोंके लिये तुम क्यों शोक कर रहे हो? ॥ १७ ॥ जानता च महाबाहो विदुरेण महात्मना । यतितं सर्वयत्नेन शमं प्रति जनेश्वर ॥ १८ ॥ महाबाहु नरेश्वर! महात्मा विदुर इस भावी परिणामको जानते थे, इसीलिये इन्होंने सारी शक्ति लगाकर संधिके लिये प्रयत्न किया था ॥ १८ ॥ न च दैवकृतो मार्गः शक्यो भूतेन केनचित् । घटतापि चिरं कालं नियन्तुमिति मे मतिः ॥ १९ ॥ मेरा तो ऐसा विश्वास है कि दीर्घ कालतक प्रयत्न करके भी कोई प्राणी दैवके विधानको रोक नहीं सकता ॥ देवतानां हि यत् कार्यं मया प्रत्यक्षतः श्रुतम् । तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथा स्थैर्यं भवेत् तव ॥ २० ॥ देवताओंका जो कार्य मैंने प्रत्यक्ष अपने कानोंसे सुना है, वह तुम्हें बता रहा हूँ, जिससे तुम्हारा मन स्थिर हो सके ॥ २० ॥ पुराहं त्वरितो यातः सभामैन्द्रीं जितक्लमः । अपश्यं तत्र च तदा समवेतान् दिवौकसः ॥ २१ ॥ पूर्वकालकी बात है, एक बार मैं यहाँसे शीघ्रतापूर्वक इन्द्रकी सभामें गया। वहाँ जानेपर भी मुझे कोई थकावट नहीं हुई; क्योंकि मैं इन सबपर विजय पा चुका हूँ। वहाँ उस समय मैंने देखा कि इन्द्रकी सभामें सम्पूर्ण देवता एकत्र हुए हैं ॥ २१ ॥ नारदप्रमुखाश्चापि सर्वे देवर्षयोऽनघ । तत्र चापि मया दृष्टा पृथिवी पृथिवीपते ॥ २२ ॥