महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3154, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'महाराज धृतराष्ट्र! आप शोक न करें। ये भीम आपके हाथसे नहीं मारे गये हैं। प्रभो! यह तो लोहेकी एक प्रतिमा थी, जिसे आपने चूर-चूर कर डाला ॥ २३ ॥
त्वां क्रोधवशमापन्नं विदित्वा भरतर्षभ ।
मयापकृष्टः कौन्तेयो मृत्योर्दंष्ट्रान्तरं गतः ॥ २४ ॥
'भरतश्रेष्ठ! आपको क्रोधके वशीभूत हुआ जान मैंने मृत्युकी दाढ़ोंमें फँसे हुए कुन्तीकुमार भीमसेनको पीछे खींच लिया था ॥ २४ ॥
न हि ते राजशार्दूल बले तुल्योऽस्ति कश्चन ।
कः सहेत महाबाहो बाह्रोर्विग्रहणं नरः ॥ २५ ॥
'राजसिंह! बलमें आपकी समानता करनेवाला कोई नहीं है। महाबाहो! आपकी दोनों भुजाओंकी पकड़ कौन मनुष्य सह सकता है? ॥ २५ ॥
यथान्तकमनुप्राप्य जीवन् कश्चिन्न मुच्यते ।
एवं बाह्वन्तरं प्राप्य तव जीवेन्न कश्चन ॥ २६ ॥
'जैसे यमराजके पास पहुँचकर कोई भी जीवित नहीं छूट सकता, उसी प्रकार आपकी भुजाओंके बीचमें पड़ जानेपर किसीके प्राण नहीं बच सकते ॥ २६ ॥
तस्मात् पुत्रेण या तेऽसौ प्रतिमा कारिताऽऽयसी ।
भीमस्य सेयं कौरव्य तवैवोपहृता मया ॥ २७ ॥
'कुरुनन्दन! इसलिये आपके पुत्रने जो भीमसेनकी लोहमयी प्रतिमा बनवा रखी थी, वही मैंने आपको भेंट कर दी ॥ २७ ॥
पुत्रशोकाभिसंतप्तं धर्मादपकृतं मनः ।
तव राजेन्द्र तेन त्वं भीमसेनं जिघांससि ॥ २८ ॥
'राजेन्द्र! आपका मन पुत्रशोकसे संतप्त हो धर्मसे विचलित हो गया है; इसीलिये आप भीमसेनको मार डालना चाहते हैं ॥ २८ ॥
न त्वेतत् ते क्षमं राजन् हन्यास्त्वं यद् वृकोदरम् ।
न हि पुत्रा महाराज जीवेयुस्ते कथंचन ॥ २९ ॥
'राजन्! आपके लिये यह कदापि उचित न होगा कि आप भीमका वध करें। महाराज! (भीमसेन न मारते तो भी) आपके पुत्र किसी तरह जीवित नहीं रह सकते थे (क्योंकि उनकी आयु पूरी हो चुकी थी) ॥ २९ ॥
तस्माद् यत् कृतमस्माभिर्मन्यमानैः शमं प्रति ।
अनुमन्यस्व तत् सर्वं मा च शोके मनः कृथाः ॥ ३० ॥
'अतः हमलोगोंने सर्वत्र शान्ति स्थापित करनेके उद्देश्यसे जो कुछ किया है, उन सब बातोंका आप भी अनुमोदन करें। मनको व्यर्थ शोकमें न डालें' ॥ ३० ॥