भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 3153, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 3153

भीममाक्षिप्य पाणिभ्यां प्रददौ भीममायसम् ॥ १५ ॥ भीमसेनके प्रति उनके अशुभ संकल्पको जानकर श्रीकृष्णने भीमसेनको झटका देकर हटा दिया और दोनों हाथोंसे उनकी लोहमयी मूर्ति धृतराष्ट्रके सामने कर दी ॥ १५ ॥

प्रागेव तु महाबुद्धिर्बुद्ध्वा तस्येङ्गितं हरिः । संविधानं महाप्राज्ञस्तत्र चक्रे जनार्दनः ॥ १६ ॥ महाज्ञानी और परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णको पहलेसे ही उनका अभिप्राय ज्ञात हो गया था, इसलिये उन्होंने वहाँ यह व्यवस्था कर ली थी ॥ १६ ॥

तं गृहीत्वैव पाणिभ्यां भीमसेनमयस्मयम् । बभञ्ज बलवान् राजा मन्यमानो वृकोदरम् ॥ १७ ॥ बलवान् राजा धृतराष्ट्रने उस लोहमय भीमसेन-को ही असली भीम समझा और उसे दोनों बाँहोंसे दबाकर तोड़ डाला ॥ १७ ॥

नागायुतबलप्राणः स राजा भीममायसम् । भङ्क्त्वा विमथितोरस्कः सुस्राव रुधिरं मुखात् ॥ १८ ॥ राजा धृतराष्ट्रमें दस हजार हाथियोंका बल था तो भी भीमकी लोहमयी प्रतिमाको तोड़कर उनकी छाती व्यथित हो गयी और मुँहसे खून निकलने लगा ॥ १८ ॥

ततः पपात मेदिन्यां तथैव रुधिरोक्षितः । प्रपुष्पिताग्रशिखरः पारिजात इव द्रुमः ॥ १९ ॥ वे उसी अवस्थामें खूनसे भींगकर पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो ऊपरकी डालीपर खिले हुए लाल फूलोंसे सुशोभित पारिजातका वृक्ष धराशायी हो गया हो ॥ १९ ॥

प्रत्यगृह्णाच्च तं विद्वान् सूतो गावलगणिस्तदा । मैवमित्यब्रवीच्चैनं शमयन् सान्त्वयन्निव ॥ २० ॥ उस समय उनके विद्वान् सारथि गवलगणपुत्र संजयने उन्हें पकड़कर उठाया और समझा-बुझाकर शान्त करते हुए कहा—'आपको ऐसा नहीं करना चाहिये' ॥ २० ॥

स तु कोपं समुत्सृज्य गतमन्युर्महामनाः । हा हा भीमेति चुक्रोश नृपः शोकसमन्वितः ॥ २१ ॥ जब रोषका आवेश दूर हो गया, तब वे महामना नरेश क्रोध छोड़कर शोकमें डूब गये और 'हा भीम! हा भीम!' कहते हुए विलाप करने लगे ॥ २१ ॥

तं विदित्वा गतक्रोधं भीमसेनवधार्दितम् । वासुदेवो वरः पुंसामिदं वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥ उन्हें भीमसेनके वधकी आशंकासे पीड़ित और क्रोध-शून्य हुआ जान पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा— ॥

मा शुचो धृतराष्ट्र त्वं नैष भीमस्त्वया हतः । आयसी प्रतिमा ह्येषा त्वया निष्पातिता विभो ॥ २३ ॥