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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

भीममाक्षिप्य पाणिभ्यां प्रददौ भीममायसम् ॥ १५ ॥ भीमसेनके प्रति उनके अशुभ संकल्पको जानकर श्रीकृष्णने भीमसेनको झटका देकर हटा दिया और दोनों हाथोंसे उनकी लोहमयी मूर्ति धृतराष्ट्रके सामने कर दी ॥ १५ ॥

प्रागेव तु महाबुद्धिर्बुद्ध्वा तस्येङ्गितं हरिः । संविधानं महाप्राज्ञस्तत्र चक्रे जनार्दनः ॥ १६ ॥ महाज्ञानी और परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णको पहलेसे ही उनका अभिप्राय ज्ञात हो गया था, इसलिये उन्होंने वहाँ यह व्यवस्था कर ली थी ॥ १६ ॥

तं गृहीत्वैव पाणिभ्यां भीमसेनमयस्मयम् । बभञ्ज बलवान् राजा मन्यमानो वृकोदरम् ॥ १७ ॥ बलवान् राजा धृतराष्ट्रने उस लोहमय भीमसेन-को ही असली भीम समझा और उसे दोनों बाँहोंसे दबाकर तोड़ डाला ॥ १७ ॥

नागायुतबलप्राणः स राजा भीममायसम् । भङ्क्त्वा विमथितोरस्कः सुस्राव रुधिरं मुखात् ॥ १८ ॥ राजा धृतराष्ट्रमें दस हजार हाथियोंका बल था तो भी भीमकी लोहमयी प्रतिमाको तोड़कर उनकी छाती व्यथित हो गयी और मुँहसे खून निकलने लगा ॥ १८ ॥

ततः पपात मेदिन्यां तथैव रुधिरोक्षितः । प्रपुष्पिताग्रशिखरः पारिजात इव द्रुमः ॥ १९ ॥ वे उसी अवस्थामें खूनसे भींगकर पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो ऊपरकी डालीपर खिले हुए लाल फूलोंसे सुशोभित पारिजातका वृक्ष धराशायी हो गया हो ॥ १९ ॥

प्रत्यगृह्णाच्च तं विद्वान् सूतो गावलगणिस्तदा । मैवमित्यब्रवीच्चैनं शमयन् सान्त्वयन्निव ॥ २० ॥ उस समय उनके विद्वान् सारथि गवलगणपुत्र संजयने उन्हें पकड़कर उठाया और समझा-बुझाकर शान्त करते हुए कहा—'आपको ऐसा नहीं करना चाहिये' ॥ २० ॥

स तु कोपं समुत्सृज्य गतमन्युर्महामनाः । हा हा भीमेति चुक्रोश नृपः शोकसमन्वितः ॥ २१ ॥ जब रोषका आवेश दूर हो गया, तब वे महामना नरेश क्रोध छोड़कर शोकमें डूब गये और 'हा भीम! हा भीम!' कहते हुए विलाप करने लगे ॥ २१ ॥

तं विदित्वा गतक्रोधं भीमसेनवधार्दितम् । वासुदेवो वरः पुंसामिदं वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥ उन्हें भीमसेनके वधकी आशंकासे पीड़ित और क्रोध-शून्य हुआ जान पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा— ॥

मा शुचो धृतराष्ट्र त्वं नैष भीमस्त्वया हतः । आयसी प्रतिमा ह्येषा त्वया निष्पातिता विभो ॥ २३ ॥

'महाराज धृतराष्ट्र! आप शोक न करें। ये भीम आपके हाथसे नहीं मारे गये हैं। प्रभो! यह तो लोहेकी एक प्रतिमा थी, जिसे आपने चूर-चूर कर डाला ॥ २३ ॥

त्वां क्रोधवशमापन्नं विदित्वा भरतर्षभ ।
मयापकृष्टः कौन्तेयो मृत्योर्दंष्ट्रान्तरं गतः ॥ २४ ॥
'भरतश्रेष्ठ! आपको क्रोधके वशीभूत हुआ जान मैंने मृत्युकी दाढ़ोंमें फँसे हुए कुन्तीकुमार भीमसेनको पीछे खींच लिया था ॥ २४ ॥

न हि ते राजशार्दूल बले तुल्योऽस्ति कश्चन ।
कः सहेत महाबाहो बाह्रोर्विग्रहणं नरः ॥ २५ ॥
'राजसिंह! बलमें आपकी समानता करनेवाला कोई नहीं है। महाबाहो! आपकी दोनों भुजाओंकी पकड़ कौन मनुष्य सह सकता है? ॥ २५ ॥

यथान्तकमनुप्राप्य जीवन् कश्चिन्न मुच्यते ।
एवं बाह्वन्तरं प्राप्य तव जीवेन्न कश्चन ॥ २६ ॥
'जैसे यमराजके पास पहुँचकर कोई भी जीवित नहीं छूट सकता, उसी प्रकार आपकी भुजाओंके बीचमें पड़ जानेपर किसीके प्राण नहीं बच सकते ॥ २६ ॥

तस्मात् पुत्रेण या तेऽसौ प्रतिमा कारिताऽऽयसी ।
भीमस्य सेयं कौरव्य तवैवोपहृता मया ॥ २७ ॥
'कुरुनन्दन! इसलिये आपके पुत्रने जो भीमसेनकी लोहमयी प्रतिमा बनवा रखी थी, वही मैंने आपको भेंट कर दी ॥ २७ ॥

पुत्रशोकाभिसंतप्तं धर्मादपकृतं मनः ।
तव राजेन्द्र तेन त्वं भीमसेनं जिघांससि ॥ २८ ॥
'राजेन्द्र! आपका मन पुत्रशोकसे संतप्त हो धर्मसे विचलित हो गया है; इसीलिये आप भीमसेनको मार डालना चाहते हैं ॥ २८ ॥

न त्वेतत् ते क्षमं राजन् हन्यास्त्वं यद् वृकोदरम् ।
न हि पुत्रा महाराज जीवेयुस्ते कथंचन ॥ २९ ॥
'राजन्! आपके लिये यह कदापि उचित न होगा कि आप भीमका वध करें। महाराज! (भीमसेन न मारते तो भी) आपके पुत्र किसी तरह जीवित नहीं रह सकते थे (क्योंकि उनकी आयु पूरी हो चुकी थी) ॥ २९ ॥

तस्माद् यत् कृतमस्माभिर्मन्यमानैः शमं प्रति ।
अनुमन्यस्व तत् सर्वं मा च शोके मनः कृथाः ॥ ३० ॥
'अतः हमलोगोंने सर्वत्र शान्ति स्थापित करनेके उद्देश्यसे जो कुछ किया है, उन सब बातोंका आप भी अनुमोदन करें। मनको व्यर्थ शोकमें न डालें' ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि आयसभीमभङ्गे द्वादशोऽध्यायः ।। १२ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें भीमसेनकी लोहमयी प्रतिमाका भंग होनाविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२ ।।

अध्याय (पृष्ठ 3156)

त्रयोदशोऽध्यायः

श्रीकृष्णका धृतराष्ट्रको फटकारकर उनका क्रोध शान्त करना और धृतराष्ट्रका पाण्डवोंको हृदयसे लगाना

वैशम्पायन उवाच

तत एनमुपातिष्ठन् शौचार्थं परिचारकाः ।
कृतशौचं पुनश्चैनं प्रोवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर सेवक-गण शौच-सम्बन्धी कार्य सम्पन्न करानेके लिये राजा धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित हुए। जब वे शौचकृत्य पूर्ण कर चुके, तब भगवान् मधुसूदनने फिर उनसे कहा— ॥

राजन्नधीता वेदास्ते शास्त्राणि विविधानि च ।
श्रुतानि च पुराणानि राजधर्माश्च केवलाः ॥ २ ॥
‘राजन्! आपने वेदों और नाना प्रकारके शास्त्रोंका अध्ययन किया है। सभी पुराणों और केवल राजधर्मोंका भी श्रवण किया है ॥ २ ॥

एवं विद्वान् महाप्राज्ञः समर्थः सन् बलाबले ।
आत्मापराधात् कस्मात् त्वं कुरुषे कोपमीदृशम् ॥ ३ ॥
‘ऐसे विद्वान्, परम बुद्धिमान् और बलाबलका निर्णय करनेमें समर्थ होकर भी अपने ही अपराधसे होनेवाले इस विनाशको देखकर आप ऐसा क्रोध क्यों कर रहे हैं? ॥

उक्तवांस्त्वां तदैवाहं भीष्मद्रोणौ च भारत ।
विदुरः संजयश्चैव वाक्यं राजन् न तत् कृथाः ॥ ४ ॥
‘भरतनन्दन! मैंने तो उसी समय आपसे यह बात कह दी थी, भीष्म, द्रोणाचार्य, विदुर और संजयने भी आपको समझाया था। राजन्! परंतु आपने किसीकी बात नहीं मानी ॥ ४ ॥

स वार्यमाणो नास्माकमकार्षीर्वचनं तदा ।
पाण्डवानधिकाञ्जानन् बले शौर्ये च कौरव ॥ ५ ॥
‘कुरुनन्दन! हमलोगोंने आपको बहुत रोका; परंतु आपने बल और शौर्यमें पाण्डवोंको बढ़ा-चढ़ा जानकर भी हमारा कहना नहीं माना ॥ ५ ॥

राजा हि यः स्थिरप्रज्ञः स्वयं दोषानवेक्षते ।
देशकालविभागं च परं श्रेयः स विन्दति ॥ ६ ॥
‘जिसकी बुद्धि स्थिर है, ऐसा जो राजा स्वयं दोषोंको देखता और देश-कालके विभागको समझता है, वह परम कल्याणका भागी होता है ॥ ६ ॥

उच्यमानस्तु यः श्रेयो गृह्णीते नो हिताहिते ।
आपदः समनुप्राप्य स शोचत्यनये स्थितः ॥ ७ ॥
‘जो हितकी बात बतानेपर भी हिताहितकी बातको नहीं समझ पाता, वह अन्यायका आश्रय ले बड़ी भारी विपत्तिमें पड़कर शोक करता है ॥ ७ ॥
ततोऽन्यवृत्तमात्मानं समवेक्षस्व भारत ।
राजंस्त्वं ह्यविधेयात्मा दुर्योधनवशे स्थितः ॥ ८ ॥
‘भरतनन्दन! आप अपनी ओर तो देखिये। आपका बर्ताव सदा ही न्यायके विपरीत रहा है। राजन्! आप अपने मनको वशमें न करके सदा दुर्योधनके अधीन रहे हैं ॥
आत्मापराधादापन्नस्तत् किं भीमं जिघांससि ।
तस्मात् संयच्छ कोपं त्वं स्वमनुस्मर दुष्कृतम् ॥ ९ ॥
‘अपने ही अपराधसे विपत्तिमें पड़कर आप भीमसेनको क्यों मार डालना चाहते हैं? इसलिये क्रोधको रोकिये और अपने दुष्कर्मोंको याद कीजिये ॥ ९ ॥

अध्याय (पृष्ठ 3158)

व्यासजी गान्धारीको समझा रहे हैं

यस्तु तां स्पर्धया क्षुद्रः पाञ्चालीमानयत् सभाम् । स हतो भीमसेनेन वैरं प्रतिजिहीर्षता ॥ १० ॥ 'जिस नीच दुर्योधनने मनमें जलन रखनेके कारण पांचालराजकुमारी कृष्णाको भरी सभामें बुलाकर अपमानित किया, उसे वैरका बदला लेनेकी इच्छासे भीमसेनने मार डाला ॥ १० ॥

आत्मनोऽतिक्रमं पश्य पुत्रस्य च दुरात्मनः । यदनागसि पाण्डूनां परित्यागस्त्वया कृतः ॥ ११ ॥ 'आप अपने और दुरात्मा पुत्र दुर्योधनके उस अत्याचारपर तो दृष्टि डालिये, जब कि बिना किसी अपराधके ही आपने पाण्डवोंका परित्याग कर दिया था' ॥ ११ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः स कृष्णेन सर्वं सत्यं जनाधिप । उवाच देवकीपुत्रं धृतराष्ट्रो महीपतिः ॥ १२ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर! जब इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने सब सच्ची-सच्ची बातें कह डालीं, तब पृथ्वीपति धृतराष्ट्रने देवकीनन्दन श्रीकृष्णसे कहा— ॥

एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि माधव । पुत्रस्नेहस्तु बलवान् धैर्यान्मां समचालयत् ॥ १३ ॥ 'महाबाहु! माधव! आप जैसा कह रहे हैं, ठीक ऐसी ही बात है; परंतु पुत्रका स्नेह प्रबल होता है, जिसने मुझे धैर्यसे विचलित कर दिया था ॥ १३ ॥

दिष्ट्या तु पुरुषव्याघ्रो बलवान् सत्यविक्रमः । त्वद्गुप्तो नागमत् कृष्ण भीमो बाह्वन्तरं मम ॥ १४ ॥ 'श्रीकृष्ण! सौभाग्यकी बात है कि आपसे सुरक्षित होकर बलवान् सत्यपराक्रमी पुरुषसिंह भीमसेन मेरी दोनों भुजाओंके बीचमें नहीं आये ॥ १४ ॥

इदानीं त्वहमव्यग्रो गतमन्युर्गतज्वरः । मध्यमं पाण्डवं वीर द्रष्टुमिच्छामि माधव ॥ १५ ॥ 'माधव! अब इस समय मैं शान्त हूँ। मेरा क्रोध उतर गया है और चिन्ता भी दूर हो गयी है; अतः मैं मध्यम पाण्डव वीर अर्जुनको देखना चाहता हूँ ॥ १५ ॥

हतेषु पार्थिवेन्द्रेषु पुत्रेषु निहतेषु च । पाण्डुपुत्रेषु वै शर्म प्रीतिश्चाप्यवतिष्ठते ॥ १६ ॥ 'समस्त राजाओं तथा अपने पुत्रोंके मारे जानेपर अब मेरा प्रेम और हितचिन्तन पाण्डुके इन पुत्रोंपर ही आश्रित है' ॥ १६ ॥

ततः स भीमं च धनंजयं च माद्रयाश्च पुत्रौ पुरुषप्रवीरौ ।

पस्पर्श गात्रैः प्ररुदन् सुगात्रा- नाश्वास्य कल्याणमुवाच चैतान् ॥ १७ ॥

तदनन्तर रोते हुए धृतराष्ट्रने सुन्दर शरीरवाले भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीके दोनों पुत्र नरवीर नकुल-सहदेवको अपने अंगोंसे लगाया और उन्हें सान्त्वना देकर कहा—'तुम्हारा कल्याण हो' ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रकोपविमोचने पाण्डवपरिष्वङ्गो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें 'धृतराष्ट्रका क्रोध छोड़कर पाण्डवोंको हृदयसे लगाना' नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 3161)

चतुर्दशोऽध्यायः

पाण्डवोंको शाप देनेके लिये उद्यत हुई गान्धारीको व्यासजीका समझाना

वैशम्पायन उवाच

धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातास्ततस्ते कुरुपाण्डवाः ।
अभ्ययुर्भ्रातरः सर्वे गान्धारीं सह केशवाः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर धृतराष्ट्र-की आज्ञा लेकर वे कुरुवंशी पाण्डव सभी भाई भगवान् श्रीकृष्णके साथ गान्धारीके पास गये ॥ १ ॥

ततो ज्ञात्वा हतामित्रं युधिष्ठिरमुपागतम् ।
गान्धारी पुत्रशोकार्ता शप्तुमैच्छदनिन्दिता ॥ २ ॥
पुत्रशोकसे पीड़ित हुई, गान्धारीको जब यह मालूम हुआ कि युधिष्ठिर अपने शत्रुओंका संहार करके मेरे पास आये हैं, तब उन सती-साध्वी देवीने उन्हें शाप देनेकी इच्छा की ॥ २ ॥

तस्याः पापमभिप्रायं विदित्वा पाण्डवान् प्रति ।
ऋषिः सत्यवतीपुत्रः प्रागेव समबुध्यत ॥ ३ ॥
स गङ्गायामुपस्पृश्य पुण्यगन्धि पयः शुचि ।
तं देशमुपसम्प्रेदे परमर्षिर्मनोजवः ॥ ४ ॥
पाण्डवोंके प्रति गान्धारीके मनमें पापपूर्ण संकल्प है, इस बातको सत्यवतीनन्दन महर्षि व्यास पहले ही जान गये थे। उनके उस अभिप्रायको जानकर वे मनके समान वेगशाली महर्षि गंगाजीके पवित्र एवं सुगन्धित जलसे आचमन करके शीघ्र ही उस स्थानपर आ पहुँचे ॥

दिव्येन चक्षुषा पश्यन् मनसा तद्गतेन च ।
सर्वप्राणभृतां भावं स तत्र समबुध्यत ॥ ५ ॥
वे दिव्य दृष्टिसे तथा अपने मनको समस्त प्राणियोंके साथ एकाग्र करके उनके आन्तरिक भावको समझ लेते थे ॥ ५ ॥

स स्नुषामब्रवीत् काले कल्यवादी महातपाः ।
शापकालमवाक्षिप्य शमकालमुदीरयन् ॥ ६ ॥
अतः हितकी बात बतानेवाले वे महातपस्वी व्यास समयपर अपनी पुत्रवधूके पास जा पहुँचे और शापका अवसर हटाकर शान्तिका अवसर उपस्थित करते हुए इस प्रकार बोले— ॥ ६ ॥

न कोपः पाण्डवे कार्यो गान्धारि शममाप्नुहि । वचो निगृह्यतामेतच्छृणु चेदं वचो मम ॥ ७ ॥ 'गान्धारराजकुमारी! शान्त हो जाओ। तुम्हें पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरपर क्रोध नहीं करना चाहिये। अभी-अभी जो बात मुँहसे निकालना चाहती हो, उसे रोक लो और मेरी यह बात सुनो ॥ ७ ॥

उक्तास्यष्टादशाहानि पुत्रेण जयमिच्छता । शिवमाशास्व मे मातर्युध्यमानस्य शत्रुभिः ॥ ८ ॥ 'गत अठारह दिनोंमें विजयकी अभिलाषा रखनेवाला तुम्हारा पुत्र प्रतिदिन तुमसे जाकर कहता था कि 'माँ! मैं शत्रुओंके साथ युद्ध करने जा रहा हूँ। तुम मेरे कल्याणके लिये आशीर्वाद दो' ॥ ८ ॥

सा तथा याच्यमाना त्वं काले काले जयैषिणा । उक्तवत्यसि गान्धारि यतो धर्मस्ततो जयः ॥ ९ ॥ 'इस प्रकार जब विजयाभिलाषी दुर्योधन समय-समयपर तुमसे प्रार्थना करता था, तब तुम सदा यही उत्तर देती थी कि 'जहाँ धर्म है, वहीं विजय है' ॥ ९ ॥

न चाप्यतीतां गान्धारि वाचं ते वितथामहम् । स्मरामि भाषमाणायास्तथा प्राणिहिता ह्यसि ॥ १० ॥ 'गान्धारी! तुमने बातचीतके प्रसंगमें भी पहले कभी झूठ कहा हो, ऐसा मुझे स्मरण नहीं है तथा तुम सदा प्राणियोंके हितमें तत्पर रहती आयी हो ॥ १० ॥

विग्रहे तुमुले राज्ञां गत्वा पारमसंशयम् । जितं पाण्डुसुतैर्युद्धे नूनं धर्मस्ततोऽधिकः ॥ ११ ॥ 'राजाओंके इस घोर संग्रामसे पार होकर पाण्डवोंने जो युद्धमें विजय पायी है, इससे निःसंदेह यह बात सिद्ध हो गयी कि 'धर्मका बल सबसे अधिक है' ॥ ११ ॥

क्षमाशीला पुरा भूत्वा साद्य न क्षमसे कथम् । अधर्मं जहि धर्मज्ञे यतो धर्मस्ततो जयः ॥ १२ ॥ 'धर्मज्ञे! तुम तो पहले बड़ी क्षमाशील थी। अब क्यों नहीं क्षमा करती हो? अधर्म छोड़ो, क्योंकि जहाँ धर्म है, वहीं विजय है ॥ १२ ॥

स्वं च धर्मं परिस्मृत्य वाचं चोक्तां मनस्विनि । कोपं संयच्छ गान्धारि मैवं भूः सत्यवादिनि ॥ १३ ॥ 'मनस्विनी गान्धारी! अपने धर्म तथा कही हुई बातका स्मरण करके क्रोधको रोको। सत्यवादिनि! अब फिर तुम्हारा ऐसा बर्ताव नहीं होना चाहिये' ॥ १३ ॥

गान्धार्युवाच भगवन्नाभ्यसूयामि नैतानिच्छामि नश्यतः ।

पुत्रशोकेन तु बलान्मनो विह्वलतीव मे ॥ १४ ॥ गान्धारी बोली— भगवन्! मैं पाण्डवोंके प्रति कोई दुर्भाव नहीं रखती और न इनका विनाश ही चाहती हूँ; परंतु क्या करूँ? पुत्रोंके शोकसे मेरा मन हठात् व्याकुल-सा हो जाता है ॥ १४ ॥ यथैव कुन्त्या कौन्तेया रक्षितव्यास्तथा मया । तथैव धृतराष्ट्रेण रक्षितव्या यथा त्वया ॥ १५ ॥ कुन्तीके ये बेटे जिस प्रकार कुन्तीके द्वारा रक्षणीय हैं, उसी प्रकार मुझे भी इनकी रक्षा करनी चाहिये। जैसे आप इनकी रक्षा चाहते हैं, उसी प्रकार महाराज धृतराष्ट्रका भी कर्तव्य है कि इनकी रक्षा करें ॥ १५ ॥ दुर्योधनापराधेन शकुनेः सौबलस्य च । कर्णदुःशासनाभ्यां च कृतोऽयं कुरुसंक्षयः ॥ १६ ॥ कुरुकुलका यह संहार तो दुर्योधन, मेरे भाई शकुनि, कर्ण तथा दुःशासनके अपराधसे ही हुआ है ॥ १६ ॥ नापराध्यति बीभत्सुर्न च पार्थो वृकोदरः । नकुलः सहदेवश्च नैव जातु युधिष्ठिरः ॥ १७ ॥ इसमें न तो अर्जुनका अपराध है और न कुन्तीपुत्र भीमसेनका। नकुल-सहदेव और युधिष्ठिरको भी कभी इसके लिये दोष नहीं दिया जा सकता ॥ १७ ॥ युध्यमाना हि कौरव्याः कृन्तमानाः परस्परम् । निहताः सहिताश्चान्यैस्तच्च नास्त्यप्रियं मम ॥ १८ ॥ कौरव आपसमें ही जूझकर मारकाट मचाते हुए अपने दूसरे साथियोंके साथ मारे गये हैं; अतः इसमें मुझे अप्रिय लगनेवाली कोई बात नहीं है ॥ १८ ॥ किं तु कर्माकरोद् भीमो वासुदेवस्य पश्यतः । दुर्योधनं समाहूय गदायुद्धे महामनाः ॥ १९ ॥ शिक्षयाभ्यधिकं ज्ञात्वा चरन्तं बहुधा रणे । अधो नाभ्याः प्रहृतवांस्तन्मे कोपमवर्धयत् ॥ २० ॥ परंतु महामना भीमसेनने गदायुद्धके लिये दुर्योधनको बुलाकर श्रीकृष्णके देखते-देखते उसके प्रति जो बर्ताव किया है, वह मुझे अच्छा नहीं लगा। वह रणभूमिमें अनेक प्रकारके पैंतरे दिखाता हुआ विचर रहा था; अतः शिक्षामें उसे अपनेसे अधिक जान भीमने जो उसकी नाभिसे नीचे प्रहार किया, इनके इसी बर्तावने मेरे क्रोधको बढ़ा दिया है ॥ १९-२० ॥ कथं नु धर्मं धर्मज्ञैः समुद्दिष्टं महात्मभिः । त्यजेयुराहवे शूराः प्राणहेतोः कथंचन ॥ २१ ॥

धर्मज्ञ महात्माओंने गदायुद्धके लिये जिस धर्मका प्रतिपादन किया है, उसे शूरवीर योद्धा रणभूमिमें किसी तरह अपने प्राण बचानेके लिये कैसे त्याग सकते हैं? ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि गान्धारीसान्त्वनायां चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें गान्धारीकी सान्त्वनाविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥

अध्याय (पृष्ठ 3165)

पञ्चदशोऽध्यायः

भीमसेनका गान्धारीको अपनी सफाई देते हुए उनसे क्षमा माँगना, युधिष्ठिरका अपना अपराध स्वीकार करना, गान्धारीके दृष्टिपातसे युधिष्ठिरके पैरोंके नखोंका काला पड़ जाना, अर्जुनका भयभीत होकर श्रीकृष्णके पीछे छिप जाना, पाण्डवोंका अपनी मातासे मिलना, द्रौपदीका विलाप, कुन्तीका आश्वासन तथा गान्धारीका उन दोनोंको धीरज बँधाना

वैशम्पायन उवाच

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या भीमसेनोऽथ भीतवत् ।
गान्धारीं प्रत्युवाचेदं वचः सानुनयं तदा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! गान्धारीकी यह बात सुनकर भीमसेनने डरे हुएकी भाँति विनयपूर्वक उनकी बातका उत्तर देते हुए कहा— ॥ १ ॥

अधर्मो यदि वा धर्मस्त्रासात् तत्र मया कृतः ।
आत्मानं त्रातुकामेन तन्मे त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ २ ॥
‘माताजी! यह अधर्म हो या धर्म; मैंने दुर्योधनसे डरकर अपने प्राण बचानेके लिये ही वहाँ ऐसा किया था; अतः आप मेरे उस अपराधको क्षमा कर दें ॥ २ ॥

न हि युद्धेन पुत्रस्ते धर्म्येण स महाबलः ।
शक्यः केनचिदुद्धन्तुमतो विषममाचरम् ॥ ३ ॥
‘आपके उस महाबली पुत्रको कोई भी धर्मानुकूल युद्ध करके मारनेका साहस नहीं कर सकता था; अतः मैंने विषमतापूर्ण बर्ताव किया ॥ ३ ॥

अधर्मेण जितः पूर्वं तेन चापि युधिष्ठिरः ।
निकृताश्च सदैव स्म ततो विषममाचरम् ॥ ४ ॥
‘पहले उसने भी अधर्मसे ही राजा युधिष्ठिरको जीता था और हमलोगोंके साथ सदा ही धोखा किया था, इसलिये मैंने भी उसके साथ विषम बर्ताव किया ॥ ४ ॥

सैन्यस्यैकोऽवशिष्टोऽयं गदायुद्धेन वीर्यवान् ।
मां हत्वा न हरेद् राज्यमिति वै तत् कृतं मया ॥ ५ ॥
‘कौरव-सेनाका एकमात्र बचा हुआ यह पराक्रमी वीर गदायुद्धके द्वारा मुझे मारकर पुनः सारा राज्य हर न ले, इसी आशंकासे मैंने वह अयोग्य बर्ताव किया था ॥ ५ ॥

राजपुत्रीं च पाञ्चालीमेकवस्त्रां रजस्वलाम् । भवत्या विदितं सर्वमुक्तवान् यत् सुतस्तव ॥ ६ ॥ ‘राजकुमारी द्रौपदीसे, जो एक वस्त्र धारण किये रजस्वला-अवस्थामें थी, आपके पुत्रने जो कुछ कहा था, वह सब आप जानती हैं ॥ ६ ॥ सुयोधनमसंगृह्य न शक्या भूः ससागरा । केवला भोक्तुमस्माभिरतश्चैतत् कृतं मया ॥ ७ ॥ ‘दुर्योधनका संहार किये बिना हमलोग निष्कण्टक पृथ्वीका राज्य नहीं भोग सकते थे, इसलिये मैंने यह अयोग्य कार्य किया ॥ ७ ॥ तथाप्यप्रियमस्माकं पुत्रस्ते समुपाचरत् । द्रौपद्या यत् सभामध्ये सव्यमूरुमदर्शयत् ॥ ८ ॥ ‘आपके पुत्रने तो हम सब लोगोंका इससे भी बढ़कर अप्रिय किया था कि उसने भरी सभामें द्रौपदीको अपनी बाँयीं जाँघ दिखायी ॥ ८ ॥ तदैव वध्यः सोऽस्माकं दुराचारश्च ते सुतः । धर्मराजाज्ञया चैव स्थिताः स्म समये तदा ॥ ९ ॥ ‘आपके उस दुराचारी पुत्रको तो हमें उसी समय मार डालना चाहिये था; परंतु धर्मराजकी आज्ञासे हमलोग समयके बन्धनमें बँधकर चुप रह गये ॥ ९ ॥ वैरमुद्दीपितं राज्ञि पुत्रेण तव तन्महत् । क्लेशिताश्च वने नित्यं तत एतत् कृतं मया ॥ १० ॥ ‘रानी! आपके पुत्रने उस महान् वैरकी आगको और भी प्रज्वलित कर दिया और हमें वनमें भेजकर सदा क्लेश पहुँचाया; इसीलिये हमने उसके साथ ऐसा व्यवहार किया है ॥ १० ॥ वैरस्यास्य गतः पारं हत्वा दुर्योधनं रणे । राज्यं युधिष्ठिरः प्राप्तो वयं च गतमन्यवः ॥ ११ ॥ ‘रणभूमिमें दुर्योधनका वध करके हमलोग इस वैरसे पार हो गये। राजा युधिष्ठिरको राज्य मिल गया और हमलोगोंका क्रोध शान्त हो गया' ॥ ११ ॥

गान्धार्युवाच

न तस्यैष वधस्तात यत् प्रशंससि मे सुतम् । कृतवांश्चापि तत् सर्वं यदिदं भाषसे मयि ॥ १२ ॥ गान्धारी बोलीं— तात! तुम मेरे पुत्रकी इतनी प्रशंसा कर रहे हो; इसलिये यह उसका वध नहीं हुआ (वह अपने यशोमय शरीरसे अमर है) और मेरे सामने तुम जो कुछ कह रहे हो, वह सारा अपराध दुर्योधनने अवश्य किया है ॥ १२ ॥ हताश्वे नकुले यत्तु वृषेनेन भारत ।

अपिबः शोणितं संख्ये दुःशासनशरीरजम् ॥ १३ ॥ सद्भिर्विगर्हितं घोरमनार्यजनसेवितम् । क्रूरं कर्माकृथास्तस्मात्तदयुक्तं वृकोदर ॥ १४ ॥ भारत! परंतु वृषसेनने जब नकुलके घोड़ोंको मारकर उसे रथहीन कर दिया था, उस समय तुमने युद्धमें दुःशासनको मारकर जो उसका खून पी लिया, वह सत्पुरुषोंद्वारा निन्दित और नीच पुरुषोंद्वारा सेवित घोर क्रूरतापूर्ण कर्म है। वृकोदर! तुमने वही क्रूर कार्य किया है, इसलिये तुम्हारे द्वारा अत्यन्त अयोग्य कर्म बन गया है ॥

भीमसेन उवाच

अन्यस्यापि न पातव्यं रुधिरं किं पुनः स्वकम् । यथैवात्मा तथा भ्राता विशेषो नास्ति कश्चन ॥ १५ ॥ भीमसेन बोले—माताजी! दूसरेका भी खून नहीं पीना चाहिये; फिर अपना ही खून कोई कैसे पी सकता है? जैसे अपना शरीर है, वैसे ही भाईका शरीर है। अपनेमें और भाईमें कोई अन्तर नहीं है ॥ १५ ॥ रुधिरं न व्यतिक्रामद् दन्तोष्ठं मेऽम्ब मा शुचः । वैवस्वतस्तु तद् वेद हस्तौ मे रुधिरोक्षितौ ॥ १६ ॥ माँ! आप शोक न करें। वह खून मेरे दाँतों और ओठोंको लाँघकर आगे नहीं जा सका था। इस बातको सूर्यपुत्र यमराज जानते हैं कि केवल मेरे दोनों हाथ ही रक्तमें सने हुए थे ॥ १६ ॥ हताश्वं नकुलं दृष्ट्वा वृषसेनेन संयुगे । भ्रातॄणां सम्प्रहृष्टानां त्रासः संजनितो मया ॥ १७ ॥ युद्धमें वृषसेनके द्वारा नकुलके घोड़ोंको मारा गया देख जो दुःशासनके सभी भाई हर्षसे उल्लसित हो उठे थे, उनके मनमें वैसा करके मैंने केवल त्रास उत्पन्न किया था ॥ १७ ॥ केशपक्षपरामर्शे द्रौपद्या द्यूतकारिते । क्रोधाद् यदब्रुवं चाहं तच्च मे हृदि वर्तते ॥ १८ ॥ द्यूतक्रीडाके समय जब द्रौपदीका केश खींचा गया, उस समय क्रोधमें भरकर मैंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसकी याद हमारे हृदयमें बराबर बनी रहती थी ॥ १८ ॥ क्षत्रधर्माच्च्युतो राज्ञि भवेयं शाश्वतीः समाः । प्रतिज्ञां तामनिस्तीर्य ततस्तत् कृतवानहम् ॥ १९ ॥ रानीजी! यदि मैं उस प्रतिज्ञाको पूर्ण न करता तो सदाके लिये क्षत्रियधर्मसे गिर जाता, इसलिये मैंने यह काम किया था ॥ १९ ॥ न मामर्हसि गान्धारि दोषेण परिशङ्कितुम् ।

अनिगृह्य पुरा पुत्रानस्मास्वनपकारिषु ।
अधुना किं नु दोषेण परिशङ्कितुमर्हसि ॥ २० ॥
माता गान्धारी! आपको मुझमें दोषकी आशंका नहीं करनी चाहिये। पहले जब हमलोगोंने कोई अपराध नहीं किया था, उस समय हमपर अत्याचार करनेवाले अपने पुत्रोंको तो आपने रोका नहीं; फिर इस समय आप क्यों मुझपर दोषारोपण करती हैं? ॥ २० ॥

गान्धार्युवाच

वृद्धस्यास्य शतं पुत्रान् निघ्नंस्त्वमपराजितः ।
कस्मान्नावशेषयः कंचिद् येनाल्पमपराधितम् ॥ २१ ॥
**गान्धारी बोलीं—**बेटा! तुम अपराजित वीर हो। तुमने इन बूढ़े महाराजके सौ पुत्रोंको मारते समय किसी एकको भी, जिसने बहुत थोड़ा अपराध किया था, क्यों नहीं जीवित छोड़ दिया? ॥ २१ ॥

संतानमावयोस्तात वृद्धयोर्हृतराज्ययोः ।
कथमन्धद्वयस्यास्य यष्टिरेका न वर्जिता ॥ २२ ॥
तात! हम दोनों बूढ़े हुए। हमारा राज्य भी तुमने छीन लिया। ऐसी दशामें हमारी एक ही संतानको—हम दो अन्धोंके लिये एक ही लाठीके सहारेको तुमने क्यों नहीं जीवित छोड़ दिया? ॥ २२ ॥

शेषे ह्यवस्थिते तात पुत्राणामन्तके त्वयि ।
न मे दुःखं भवेदेतद् यदि त्वं धर्ममाचरेः ॥ २३ ॥
तात! तुम मेरे सारे पुत्रोंके लिये यमराज बन गये। यदि तुम धर्मका आचरण करते और मेरा एक पुत्र भी शेष रह जाता तो मुझे इतना दुःख नहीं होता ॥ २३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा तु गान्धारी युधिष्ठिरमपृच्छत ।
क्व स राजेति सक्रोधा पुत्रपौत्रवधार्दिता ॥ २४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! भीमसेनसे ऐसा कहकर अपने पुत्रों और पौत्रोंके वधसे पीड़ित हुई गान्धारीने कुपित होकर पूछा—'कहाँ है वह राजा युधिष्ठिर?' ॥ २४ ॥

तमभ्यगच्छद् राजेन्द्रो वेपमानः कृताञ्जलिः ।
युधिष्ठिरस्त्विदं तत्र मधुरं वाक्यमब्रवीत् ॥ २५ ॥
पुत्रहन्ता नृशंसोऽहं तव देवि युधिष्ठिरः ।
शापार्हः पृथिवीनाशे हेतुभूतः शपस्व माम् ॥ २६ ॥
यह सुनकर महाराज युधिष्ठिर काँपते हुए हाथ जोड़े उनके सामने आये और बड़ी मीठी वाणीमें बोले—'देवि! आपके पुत्रोंका संहार करनेवाला क्रूरकर्मा युधिष्ठिर मैं हूँ। पृथ्वीभरके

राजाओंका नाश करानेमें मैं ही हेतु हूँ, इसलिये शापके योग्य हूँ। आप मुझे शाप दे दीजिये ।। २५-२६ ।।

न हि मे जीवितेनार्थो न राज्येन धनेन वा ।
तादृशान् सुहृदो हत्वा मूढस्यास्य सुहृद्द्रुहः ॥ २७ ॥
'मैं अपने सुहृदोंका द्रोही और अविवेकी हूँ। वैसे-वैसे श्रेष्ठ सुहृदोंका वध करके अब मुझे जीवन, राज्य अथवा धनसे कोई प्रयोजन नहीं है' ।। २७ ।।

तमेवंवादिनं भीतं संनिकर्षगतं तदा ।
नोवाच किंचिद् गान्धारी निःश्वासपरमा भृशम् ॥ २८ ॥
जब निकट आकर डरे हुए राजा युधिष्ठिरने ऐसी बातें कहीं, तब गान्धारी देवी जोर-जोरसे साँस खींचती हुई सिसकने लगीं। वे मुँहसे कुछ बोल न सकीं ।। २८ ।।

तस्यावनतदेहस्य पादयोर्निपतिष्यतः ।
युधिष्ठिरस्य नृपतेर्धर्मज्ञा दीर्घदर्शिनी ॥ २९ ॥
अंगुल्यग्राणि ददृशे देवी पट्टान्तरेण सा ।
ततः स कुनखीभूतो दर्शनीयनखो नृपः ॥ ३० ॥
राजा युधिष्ठिर शरीरको झुकाकर गान्धारीके चरणोंपर गिर जाना चाहते थे। इतनेहीमें धर्मको जाननेवाली दूर-दर्शिनी देवी गान्धारीने पट्टीके भीतरसे ही राजा युधिष्ठिरके पैरोंकी अंगुलियोंके अग्रभाग देख लिये। इतनेहीसे राजाके नख काले पड़ गये। इसके पहले उनके नख बड़े ही सुन्दर और दर्शनीय थे ।। २९-३० ।।

तं दृष्ट्वा चार्जुनोऽगच्छद् वासुदेवस्य पृष्ठतः ।
एवं संचेष्टमानांस्तानितश्चेतश्च भारत ॥ ३१ ॥
गान्धारी विगतक्रोधा सान्त्वयामास मातृवत् ।
उनकी यह अवस्था देख अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण-के पीछे जाकर छिप गये। भारत! उन्हें इस प्रकार इधर-उधर छिपनेकी चेष्टा करते देख गान्धारीका क्रोध उतर गया और उन्होंने उन सबको स्नेहमयी माताके समान सान्त्वना दी ।। ३१ १/२ ।।

तया ते समनुज्ञाता मातरं वीरमातरम् ॥ ३२ ॥
अभ्यगच्छन्त सहिताः पृथां पृथुलवक्षसः ।
फिर उनकी आज्ञा ले चौड़ी छातीवाले सभी पाण्डव एक साथ वीरजननी माता कुन्तीके पास गये ।।

चिरस्य दृष्ट्वा पुत्रान् सा पुत्राधिभिरभिप्लुता ॥ ३३ ॥
बाष्पमाहारयद् देवी वस्त्रेणावृत्य वै मुखम् ।
कुन्तीदेवी दीर्घकालके बाद अपने पुत्रोंको देखकर उनके कष्टोंका स्मरण करके करुणामें डूब गयीं और अंचलसे मुँह ढककर आँसू बहाने लगीं ।। ३३ १/२ ।।

ततो बाष्पं समुत्सृज्य सह पुत्रैस्तदा पृथा ॥ ३४ ॥

अपश्यदेतान् शस्त्रौघैर्बहुधा क्षतविक्षतान् ।
पुत्रोंसहित आँसू बहाकर उन्होंने उनके शरीरोंपर बारंबार दृष्टिपात किया। वे सभी अस्त्र-शस्त्रोंकी चोटसे घायल हो रहे थे ।। ३४ १/२ ।।
सा तानेकैकशः पुत्रान् संस्पृशन्ती पुनः पुनः ।। ३५ ।।
अन्वशोचत दुःखार्ता द्रौपदीं च हतात्मजाम् ।
रुदतीमथ पाञ्चालीं ददर्श पतितां भुवि ।। ३६ ।।
बारी-बारीसे पुत्रोंके शरीरपर बारंबार हाथ फेरती हुई कुन्ती दुःखसे आतुर हो उस द्रौपदीके लिये शोक करने लगीं, जिसके सभी पुत्र मारे गये थे। इतनेमें ही उन्होंने देखा कि द्रौपदी पास ही पृथ्वीपर गिरकर रो रही है ।।

द्रौपद्युवाच

आर्ये पौत्राः क्व ते सर्वे सौभद्रसहिता गताः ।
न त्वां तेऽद्याभिगच्छन्ति चिरं दृष्ट्वा तपस्विनीम् ।। ३७ ।।
किं नु राज्येन वै कार्यं विहीनायाः सुतैर्मम ।
**द्रौपदी बोली—**आर्ये! अभिमन्युसहित वे आपके सभी पौत्र कहाँ चले गये? वे दीर्घकालके बाद आयी हुई आज आप तपस्विनी देवीको देखकर आपके निकट क्यों नहीं आ रहे हैं? अपने पुत्रोंसे हीन होकर अब इस राज्यसे हमें क्या कार्य है? ।। ३७ १/२ ।।
तां समाश्वासयामास पृथा पृथुललोचना ।। ३८ ।।
उत्थाप्य याज्ञसेनीं तु रुदतीं शोककर्शिताम् ।
तयैव सहिता चापि पुत्रैरनुगता नृप ।। ३९ ।।
अभ्यगच्छत गान्धारीमार्तामार्ततरा स्वयम् ।
नरेश्वर! विशाल नेत्रोंवाली कुन्तीने शोकसे कातर हो रोती हुई द्रुपदकुमारीको उठाकर धीरज बँधाया और उसके साथ ही वे स्वयं भी अत्यन्त आर्त होकर शोकाकुल गान्धारीके पास गयीं। उस समय उनके पुत्र पाण्डव भी उनके पीछे-पीछे गये ।। ३८-३९ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

तामुवाचाथ गान्धारी सह वध्वा यशस्विनीम् ।। ४० ।।
मैवं पुत्रीति शोकार्ता पश्य मामपि दुःखिताम् ।
मन्ये लोकविनाशोऽयं कालपर्यायनोदितः ।। ४१ ।।
अवश्यभावी सम्प्राप्तः स्वभावाल्लोमहर्षणः ।
इदं तत् समनुप्राप्तं विदुरस्य वचो महत् ।। ४२ ।।
असिद्धानुनये कृष्णे यदुवाच महामतिः ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! गान्धारीने बहू द्रौपदी और यशस्विनी कुन्तीसे कहा—‘बेटी! इस प्रकार शोकसे व्याकुल न होओ। देखो, मैं भी तो दुःखमें डूबी हुई हूँ। मैं

समझती हूँ, समयके उलट-फेरसे प्रेरित होकर यह सम्पूर्ण जगत्‌का विनाश हुआ है, जो स्वभावसे ही रोमांचकारी है। यह काण्ड अवश्यम्भावी था, इसीलिये प्राप्त हुआ है। जब संधि करानेके विषयमें श्रीकृष्णकी अनुनय-विनय सफल नहीं हुई, उस समय परम बुद्धिमान् विदुरजीने जो महत्त्वपूर्ण बात कही थी, उसीके अनुसार यह सब कुछ सामने आया है।। ४०—४२ १/२ ।। तस्मिन्नपरिहार्येऽर्थे व्यतीते च विशेषतः ॥ ४३ ॥ मा शुचो न हि शोच्यास्ते संग्रामे निधनं गताः । यथैवाहं तथैव त्वं को नावाश्वासयिष्यति । ममैव ह्यपराधेन कुलमग्र्यं विनाशितम् ॥ ४४ ॥ ‘जब यह विनाश किसी तरह टल नहीं सकता था, विशेषतः जब सब कुछ होकर समाप्त हो गया, तो अब तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। वे सभी वीर संग्राममें मारे गये हैं, अतः शोक करनेके योग्य नहीं हैं। आज जैसी मैं हूँ, वैसी ही तुम भी हो। हम दोनोंको कौन धीरज बँधायेगा? मेरे ही अपराधसे इस श्रेष्ठ कुलका संहार हुआ है’ ।। ४३-४४ ।।

इति श्रीमद्भारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि पृथापुत्रदर्शने पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें कुन्तीको अपने पुत्रोंका दर्शनविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५ ।।

(स्त्रीविलापपर्व)

(स्त्रीविलापपर्व)

षोडशोऽध्यायः

वेदव्यासजीके वरदानसे दिव्य दृष्टिसम्पन्न हुई गान्धारीका युद्धस्थलमें मारे गये योद्धाओं तथा रोती हुई बहुओंको देखकर श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा तु गान्धारी कुरूणामवकर्तनम् ।
अपश्यत्तत्र तिष्ठन्ती सर्वं दिव्येन चक्षुषा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऐसा कहकर गान्धारी देवीने वहीं खड़ी रहकर अपनी दिव्य दृष्टिसे कौरवोंका वह सारा विनाशस्थल देखा ॥ १ ॥

पतिव्रता महाभागा समानव्रतचारिणी ।
उग्रेण तपसा युक्ता सततं सत्यवादिनी ॥ २ ॥
गान्धारी बड़ी ही पतिव्रता, परम सौभाग्यवती, पतिके समान व्रतका पालन करनेवाली, उग्र तपस्यासे युक्त तथा सदा सत्य बोलनेवाली थीं ॥ २ ॥

वरदानेन कृष्णस्य महर्षेः पुण्यकर्मणः ।
दिव्यज्ञानबलोपेता विविधं पर्यदेवयत् ॥ ३ ॥
पुण्यात्मा महर्षि व्यासके वरदानसे वे दिव्य ज्ञान-बलसे सम्पन्न हो गयी थीं; अतः रणभूमिका दृश्य देखकर अनेक प्रकारसे विलाप करने लगीं ॥ ३ ॥

ददर्श सा बुद्धिमती दूरादपि यथान्तिके ।
रणाजिरं नृवीराणामद्भुतं लोमहर्षणम् ॥ ४ ॥
बुद्धिमती गान्धारीने नरवीरोंके उस अद्भुत एवं रोमांचकारी समरांगणको दूरसे भी उसी तरह देखा, जैसे निकटसे देखा जाता है ॥ ४ ॥

अस्थिकेशवसाकीर्णं शोणितौघपरिप्लुतम् ।
शरीरैर्बहुसाहस्रैर्विनिकीर्णं समन्ततः ॥ ५ ॥
वह रणक्षेत्र हड्डियों, केशों और चर्बियोंसे भरा था, रक्तके प्रवाहसे आप्लावित हो रहा था, कई हजार लाशें वहाँ चारों ओर बिखरी हुई थीं ॥ ५ ॥

गजाश्वरथयोधानामावृतं रुधिराविलैः ।
शरीरैरशिरस्कैश्च विदेहेश्च शिरोगणैः ॥ ६ ॥