महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3177, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्रव्यादैः कृष्यमाणानामपरेषां महात्मनाम् । शातकौम्भ्यः स्रजश्चित्रा विप्रकीर्णाः समन्ततः ॥ ३९ ॥ 'दूसरे महामनस्वी वीरोंको मांसाहारी जीव इधर-उधर खींच रहे हैं, जिससे सोनेकी बनी हुई उनकी विचित्र मालाएँ सब ओर बिखर गयी हैं ॥ ३९ ॥
एते गोमायवो भीमा निहतानां यशस्विनाम् । कण्ठान्तरगतान् हारानाक्षिपन्ति सहस्रशः ॥ ४० ॥ 'यहाँ मारे गये यशस्वी वीरोंके कण्ठमें पड़े हुए हारोंको ये सहस्रों भयानक गीदड़ खींचते और झटकते हैं ॥ ४० ॥
सर्वेष्वपररात्रेषु यानानन्दन्त बन्दिनः । स्तुतिभिश्च पराग्र्याभिरुपचारैश्च शिक्षिताः ॥ ४१ ॥ तानिमाः परिदेवन्ति दुःखार्ताः परमाङ्गनाः । कृपणं वृष्णिशार्दूल दुःखशोकार्दिता भृशम् ॥ ४२ ॥ 'वृष्णिसिंह! प्रायः प्रत्येक रात्रिके पिछले पहरमें सुशिक्षित बन्दीजन उत्तम स्तुतियों और उपचारोंद्वारा जिन्हें आनन्दित करते थे, उन्हींके पास आज ये दुःख और शोकसे अत्यन्त पीड़ित हुई सुन्दरी युवतियाँ करुण विलाप कर रही हैं ॥ ४१-४२ ॥
रक्तोत्पलवनानीव विभान्ति रुचिराणि च । मुखानि परमस्त्रीणां परिशुष्काणि केशव ॥ ४३ ॥ 'केशव! इन सुन्दरियोंके सूखे हुए सुन्दर मुख लाल कमलोंके समूहकी भाँति शोभा पा रहे हैं ॥ ४३ ॥
रुदिताद् विरता ह्येता ध्यायन्त्यः सपरिच्छदाः । कुरुस्त्रियोऽभिगच्छन्ति तेन तेनैव दुःखिताः ॥ ४४ ॥ 'ये कुरुकुलकी स्त्रियाँ रोना बंद करके स्वजनोंका चिन्तन करती हुई परिजनोंसहित उन्हींकी खोजमें जाती और दुःखी होकर उन-उन व्यक्तियोंसे मिल रही हैं ॥ ४४ ॥
एतान्यादित्यवर्णानि तपनीयनिभानि च । रोषरोदनताम्राणि वक्त्राणि कुरुयोषिताम् ॥ ४५ ॥ 'कौरववंशकी युवतियोंके ये सूर्य और सुवर्णके समान कान्तिमान् मुख रोष और रोदनसे ताम्रवर्णके हो गये हैं ।।
श्यामानां वरवर्णानां गौरीणामेकवाससाम् । दुर्योधनवरस्त्रीणां पश्य वृन्दानि केशव ॥ ४६ ॥ 'केशव! सुन्दर कान्तिसे सम्पन्न, एकवस्त्रधारिणी तथा श्याम-गौरवर्णवाली दुर्योधनकी इन सुन्दरी स्त्रियोंकी टोलियोंको देखो ॥ ४६ ॥
आसामपरिपूर्णार्थं निशम्य परिदेवितम् । इतरेतरसंक्रन्दान्न विजानन्ति योषितः ॥ ४७ ॥