भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3178

'एक-दूसरीकी रोदन-ध्वनिसे मिल जानेके कारण इनके विलापका अर्थ पूर्णरूपसे समझमें नहीं आता, उसे सुनकर अन्य स्त्रियाँ भी कुछ नहीं समझ पाती हैं।। एता दीर्घमिवोच्छ्वस्य विक्रुश्य च विलप्य च। विस्पन्दमाना दुःखेन वीरा जहति जीवितम्॥ ४८॥ 'ये वीर वनिताएँ लंबी साँस खींचकर स्वजनोंको पुकार-पुकारकर करुण विलाप करके दुःखसे छटपटाती हुई अपने प्राण त्याग देना चाहती हैं।। ४८।। बह्व्यो दृष्ट्वा शरीराणि क्रोशन्ति विलपन्ति च। पाणिभिश्चापरा घ्नन्ति शिरांसि मृदुपाणयः॥ ४९॥ 'बहुत-सी स्त्रियाँ स्वजनोंकी लाशोंको देखकर रोती, चिल्लाती और विलाप करती हैं। कितनी ही कोमल हाथोंवाली कामिनियाँ अपने हाथोंसे सिर पीट रही हैं।। शिरोभिः पतितैर्हस्तैः सर्वाङ्गैर्यूथशः कृतैः। इतरेतरसम्पृक्तैराकीर्णा भाति मेदिनी॥ ५०॥ 'कटकर गिरे हुए मस्तकों, हाथों और सम्पूर्ण अंगोंके ढेर लगे हैं। वे सभी एकके ऊपर एक करके पड़े हैं। उनसे यहाँकी सारी पृथ्वी ढँकी हुई जान पड़ती है।। विशिरस्कानथो कायान् दृष्ट्वा ह्येताननिन्दितान्। मुह्यन्त्यनुगता नार्यो विदेहानि शिरांसि च॥ ५१॥ 'इन बिना मस्तकके सुन्दर धड़ों और बिना धड़के मस्तकोंको देख-देखकर ये अनुगामिनी स्त्रियाँ मूर्च्छित-सी हो रही हैं।। ५१।। शिरः कायेन संधाय प्रेक्षमाणा विचेतसः। अपश्यन्त्योऽपरं तत्र नेदमस्येति दुःखिताः॥ ५२॥ 'कितनी ही अचेत-सी होकर स्वजनोंकी खोज करनेवाली स्त्रियाँ एक मस्तकको निकटवर्ती धड़के साथ जोड़ करके देखती हैं और जब वह मस्तक उससे नहीं जुड़ता तथा दूसरा कोई मस्तक वहाँ देखनेमें नहीं आता तो वे दुःखी होकर कहने लगती हैं कि यह तो उनका सिर नहीं है।। ५२।। बाहूरुचरणानन्यान् विशिखोन्मथितान् पृथक्। संदधत्योऽसुखाविष्टा मूर्च्छन्त्येताः पुनः पुनः॥ ५३॥ 'बाणोंसे कट-कटकर अलग हुई बाँहों, जाँघों और पैरोंको जोड़ती हुई ये दुःखी अबलाएँ बारंबार मूर्च्छित हो जाती हैं।। ५३।। उत्कृत्तशिरसश्चान्यान् विजग्धान् मृगपक्षिभिः। दृष्ट्वा काश्चिन्न जानन्ति भर्तॄन् भरतयोषितः॥ ५४॥ 'कितनी ही लाशोंके सिर कटकर गायब हो गये हैं, कितनोंको मांसभक्षी पशुओं और पक्षियोंने खा डाला है; अतः उनको देखकर भी ये हमारे ही पति हैं, इस रूपमें भरतकुलकी स्त्रियाँ पहचान नहीं पाती हैं।। ५४।।