भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3196

‘कमलनयन! प्राणेश्वर! पाण्डवोंको जो यह विशाल राज्य मिल गया है, उन्होंने शत्रुओंको जो पराजित कर दिया है, यह सब कुछ आपके बिना उन्हें प्रसन्न नहीं कर सकेगा ॥ २२ ॥
तव शस्त्रजिताँल्लोकान् धर्मेण च दमेन च ।
क्षिप्रमन्वागमिष्यामि तत्र मां प्रतिपालय ॥ २३ ॥
‘आर्यपुत्र! आपके शस्त्रोंद्वारा जीते हुए पुण्यलोकोंमें मैं भी धर्म और इन्द्रिय-संयमके बलसे शीघ्र ही आऊँगी। आप वहाँ मेरी राह देखिये ॥ २३ ॥
दुर्मरं पुनरप्राप्ते काले भवति केनचित् ।
यदहं त्वां रणे दृष्ट्वा हतं जीवामि दुर्भगा ॥ २४ ॥
‘जान पड़ता है कि मृत्युकाल आये बिना किसीका भी मरना अत्यन्त कठिन है, तभी तो मैं अभागिनी आपको युद्धमें मारा गया देखकर भी अबतक जी रही हूँ ॥ २४ ॥
कामिदानीं नरव्याघ्र श्लक्ष्णया स्मितया गिरा ।
पितृलोके समेत्यान्यां मामिवामन्त्रयिष्यसि ॥ २५ ॥
‘नरश्रेष्ठ! आप पितृलोकमें जाकर इस समय मेरी ही तरह दूसरी किस स्त्रीको मन्द मुसकानके साथ मीठी वाणीद्वारा बुलायेंगे? ॥ २५ ॥
नूनमप्सरसां स्वर्गे मनांसि प्रमथिष्यसि ।
परमेण च रूपेण गिरा च स्मितपूर्वया ॥ २६ ॥
‘निश्चय ही स्वर्गमें जाकर आप अपने सुन्दर रूप और मन्द मुसकानयुक्त मधुर वाणीके द्वारा वहाँकी अप्सराओंके मनको मथ डालेंगे ॥ २६ ॥
प्राप्य पुण्यकृताँल्लोकानप्सरोभिः समेयिवान् ।
सौभद्र विहरन् काले स्मरेथाः सुकृतानि मे ॥ २७ ॥
‘सुभद्रानन्दन! आप पुण्यात्माओंके लोकोंमें जाकर अप्सराओंके साथ मिलकर विहार करते समय मेरे शुभ कर्मोंका भी स्मरण कीजियेगा ॥ २७ ॥
एतावानिह संवासो विहितस्ते मया सह ।
षण्मासान् सप्तमे मासि त्वं वीर निधनं गतः ॥ २८ ॥
‘वीर! इस लोकमें तो मेरे साथ आपका कुल छः महीनोंतक ही सहवास रहा है। सातवें महीनेमें ही आप वीरगतिको प्राप्त हो गये' ॥ २८ ॥
इत्युक्तवचनामेतामपकर्षन्ति दुःखिताम् ।
उत्तरां मोघसंकल्पां मत्स्यराजकुलस्त्रियः ॥ २९ ॥
इस तरहकी बातें कहकर दुःखमें डूबी हुई इस उत्तराको जिसका सारा संकल्प मिट्टीमें मिल गया है, मत्स्यराज विराटके कुलकी स्त्रियाँ खींचकर दूर ले जा रही हैं ॥ २९ ॥
उत्तरामपकृष्यैनामार्तामार्ततराः स्वयम् ।
विराटं निहतं दृष्ट्वा क्रोशन्ति विलपन्ति च ॥ ३० ॥