भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 324

भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा राजन् कर्णो व्यथां ययौ ।। ५ ।। विमुखीकृत्य कर्णं तु सौभद्रः कङ्कपत्रिभिः । अन्यान्नपि महेष्वासांस्तूर्णमेवाभिदुद्रुवे ।। ६ ।। राजन्! अपने भाईको मारा गया देख कर्णको बड़ी व्यथा हुई। इधर सुभद्राकुमार अभिमन्युने गीधकी पाँखवाले बाणोंद्वारा कर्णको युद्धसे भगाकर दूसरे-दूसरे महाधनुर्धर वीरोंपर भी तुरंत ही धावा किया ।। ५-६ ।।

ततस्तद् विततं सैन्यं हस्त्यश्वरथपत्तिमत् । क्रुद्धोऽभिमन्युरभिनत् तिग्मतेजा महारथः ।। ७ ।। उस समय क्रोधमें भरे हुए प्रचण्ड तेजस्वी महारथी अभिमन्युने हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंसे युक्त उस विशाल चतुरंगिणी सेनाको विदीर्ण कर डाला ।। ७ ।।

कर्णस्तु बहुभिर्बाणैरर्द्यमानोऽभिमन्युना । अपायाज्जवनैरश्वैस्ततोऽनीकमभज्यत ।। ८ ।। अभिमन्युके चलाये हुए बहुसंख्यक बाणोंसे पीड़ित हुआ कर्ण अपने वेगशाली घोड़ोंकी सहायतासे शीघ्र ही रणभूमिसे भाग गया। इससे सारी सेनामें भगदड़ मच गयी ।। ८ ।।

शलभैरिव चाकाशे धाराभिरिव चावृते । अभिमन्योः शरै राजन् न प्राज्ञायत किंचन ।। ९ ।। राजन्! उस दिन अभिमन्युके बाणोंसे सारा आकाशमण्डल इस प्रकार आच्छादित हो गया था, मानो टिड्डीदलोंसे अथवा वर्षाकी धाराओंसे व्याप्त हो गया हो। उस आकाशमें कुछ भी सूझता नहीं था ।। ९ ।।