महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 325, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतावकानां तु योधानां वध्यतां निशितैः शरैः । अन्यत्र सैन्धवाद् राजन् न स्म कश्चिदतिष्ठत ॥ १० ॥ महाराज! पैने बाणोंद्वारा मारे जाते हुए आपके योद्धाओंमेंसे सिंधुराज जयद्रथको छोड़कर दूसरा कोई वहाँ ठहर न सका ॥ १० ॥
सौभद्रस्तु ततः शङ्खं प्रध्माप्य पुरुषर्षभः । शीघ्रमभ्यपतत् सेनां भारतीं भरतर्षभ ॥ ११ ॥ भरतश्रेष्ठ! तब पुरुषप्रवर सुभद्राकुमार अभिमन्युने शंख बजाकर पुनः शीघ्र ही भारतीय सेनापर धावा किया ॥ ११ ॥
स कक्षेऽग्निरिवोत्सृष्टो निर्दहंस्तरसा रिपून् । मध्ये भारतसैन्यानामार्जुनः पर्यवर्तत ॥ १२ ॥ सूखे जंगलमें छोड़ी हुई आगके समान वेगसे शत्रुओंको दग्ध करता हुआ अभिमन्यु कौरव-सेनाके बीचमें विचरने लगा ॥ १२ ॥
रथनागाश्वमनुजानर्दयन् निशितैः शरैः । सम्प्रविश्याकरोद् भूमिं कबन्धगणसंकुलाम् ॥ १३ ॥ उस सेनामें प्रवेश करके उसने अपने तीखे बाणोंद्वारा रथों, हाथियों, घोड़ों और पैदल मनुष्योंको पीड़ित करते हुए सारी रणभूमिको बिना मस्तकके शरीरोंसे पाट दिया ॥ १३ ॥
सौभद्रचापप्रभवैर्निकृत्ताः परमेषुभिः । स्वानेवाभिमुखान् घ्नन्तः प्राद्रवन् जीवितार्थिनः ॥ १४ ॥ सुभद्राकुमारके धनुषसे छूटे हुए उत्तम बाणोंसे क्षत-विक्षत हो आपके सैनिक अपने जीवनकी रक्षाके लिये सामने आये हुए अपने ही पक्षके योद्धाओंको मारते हुए भाग चले ॥ १४ ॥
ते घोरा रौद्रकर्माणो विपाठा बहवः शिताः । निघ्नन्तो रथनागाश्वान् जग्मुराशु वसुंधराम् ॥ १५ ॥ अभिमन्युके वे भयंकर कर्म करनेवाले, घोर, तीक्ष्ण और बहुसंख्यक विपाठ नामक बाण आपके रथों, हाथियों और घोड़ोंको नष्ट करते हुए शीघ्र ही धरतीमें समा जाते थे ॥ १५ ॥
सायुधाः साङ्गुलित्राणाः सगदाः साङ्गदा रणे । दृश्यन्ते बाहवश्छिन्ना हेमाभरणभूषिताः ॥ १६ ॥ उस युद्धमें आयुध, दस्ताने, गदा और बाजूबंदसहित वीरोंकी सुवर्णभूषण-भूषित भुजाएँ कटकर गिरी दिखायी देती थीं ॥ १६ ॥
शराश्चापानि खड्गांश्च शरीराणि शिरांसि च । सकुण्डलानि स्रग्विणि भूमावासन् सहस्रशः ॥ १७ ॥