महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 329, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसैन्धवस्य महाराज पुत्रो राजा जयद्रथः । स पुत्रगृद्धिनः पार्थान् सहसैन्यानवारयत् ॥ ७ ॥ महाराज! सिंधुनरेशके पुत्र राजा जयद्रथने अपने पुत्रको बचानेकी इच्छा रखनेवाले कुन्तीकुमारोंको सेनासहित आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ७ ॥
उग्रधन्वा महेष्वासो दिव्यमस्त्रमुदीरयन् । वार्धक्षत्रिरुपासेधत् प्रवणादिव कुञ्जरः ॥ ८ ॥ जैसे हाथी नीची भूमिमें आकर वहींसे शत्रुको निवारण करता है, उसी प्रकार भयंकर एवं महान् धनुष धारण करनेवाले वृद्धक्षत्रकुमार जयद्रथने दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करके शत्रुओंकी प्रगति रोक दी ॥ ८ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
अतिभारमहं मन्ये सैन्धवे संजयाहितम् । यदेकः पाण्डवान् क्रुद्धान् पुत्रप्रेप्सूनवारयत् ॥ ९ ॥ धृतराष्ट्रने कहा—संजय! मैं तो समझता हूँ, सिंधुराज जयद्रथपर यह बहुत बड़ा भार आ पड़ा था, जो अकेले होनेपर भी उसने पुत्रकी रक्षाके लिये उत्सुक एवं क्रोधमें भरे हुए पाण्डवोंको रोका ॥ ९ ॥
अत्यद्भुतमहं मन्ये बलं शौर्यं च सैन्धवे । तस्य प्रब्रूहि मे वीर्यं कर्म चाग्र्यं महात्मनः ॥ १० ॥ सिंधुराजमें ऐसे बल और शौर्यका होना मैं अत्यन्त आश्चर्यकी बात मानता हूँ। महामना जयद्रथके बल और श्रेष्ठ पराक्रमका मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन करो ॥ १० ॥
किं दत्तं हुतमिष्टं वा किं सुतप्तमथो तपः । सिंधुराजो हि येनैकः पाण्डवान् समवारयत् ॥ ११ ॥ सिंधुराजने कौन-सा ऐसा दान, होम, यज्ञ अथवा उत्तम तप किया था, जिससे वह अकेला ही समस्त पाण्डवोंको रोकनेमें समर्थ हो सका ॥ ११ ॥
(दमो वा ब्रह्मचर्यं वा सूत यच्चास्य सत्तम । देवं कतममाराध्य विष्णुमीशानमब्जजम् ॥ सिन्धुराट् तनये सक्तान् क्रुद्धः पार्थानवारयत् । नैवं कृतं महत् कर्म भीष्मेणाज्ञासिषं तथा ॥) साधुशिरोमणे सूत! जयद्रथमें जो इन्द्रियसंयम अथवा ब्रह्मचर्य हो, वह बताओ। विष्णु, शिव अथवा ब्रह्मा किस देवताकी आराधना करके सिन्धुराजने अपने पुत्रकी रक्षामें तत्पर हुए पाण्डवोंको क्रोधपूर्वक रोक दिया? भीष्मने भी ऐसा महान् पराक्रम किया हो, उसका पता मुझे नहीं है।
संजय उवाच