महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 330, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्रौपदीहरणे यत् तद् भीमसेनेन निर्जितः ।
मानात् स तप्तवान् राजा वरार्थी सुमहत् तपः ॥ १२ ॥
**संजयने कहा—**महाराज! द्रौपदीहरणके प्रसंगमें जो जयद्रथको भीमसेनसे पराजित होना पड़ा था, उसीसे अभिमानवश अपमानका अनुभव करके राजाने वर प्राप्त करनेकी इच्छा रखकर बड़ी भारी तपस्या की ॥ १२ ॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यः प्रियेभ्यः संनिवर्त्य सः ।
क्षुत्पिपासातपसहः कृशो धमनिसंततः ॥ १३ ॥
प्रिय लगनेवाले विषयोंकी ओरसे सम्पूर्ण इन्द्रियोंको हटाकर भूख-प्यास और धूपका कष्ट सहन करता हुआ जयद्रथ अत्यन्त दुर्बल हो गया। उसके शरीरकी नस-नाड़ियाँ दिखायी देने लगीं ॥ १३ ॥
देवमाराधयच्छर्वं गृणन् ब्रह्म सनातनम् ।
भक्तानुकम्पी भगवांस्तस्य चक्रे ततो दयाम् ॥ १४ ॥
स्वप्रान्तेऽप्यथ चैवाह हरः सिन्धुपतेः सुतम् ।
वरं वृणीष्व प्रीतोऽस्मि जयद्रथ किमिच्छसि ॥ १५ ॥
वह सनातन ब्रह्मस्वरूप भगवान् शंकरकी स्तुति करता हुआ उनकी आराधना करने लगा। तब भक्तोंपर दया करनेवाले भगवान्ने उसपर कृपा की और स्वप्नमें जयद्रथको दर्शन देकर उससे कहा—'जयद्रथ! तुम क्या चाहते हो? वर माँगो। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ' ॥ १४-१५ ॥
एवमुक्तस्तु शर्वेण सिन्धुराजो जयद्रथः ।
उवाच प्रणतो रुद्रं प्राञ्जलिर्नियतात्मवान् ॥ १६ ॥
भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर सिंधुराज जयद्रथने अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर उन रुद्रदेवको प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा— ॥ १६ ॥