भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 36

संजयने कहा— राजन्! उस युद्धमें देवव्रत भीष्मके मारे जानेपर उस समय आपके पुत्रोंने जो कार्य किया, वह सब मैं बता रहा हूँ। मेरे इस कथनको आप एकाग्रचित्त होकर सुनिये ॥ १४ ॥ निहते तु तदा भीष्मं राजन् सत्यपराक्रमे । तावकाः पाण्डवेयाश्च प्राध्यायन्त पृथक् पृथक् ॥ १५ ॥ राजन्! जब सत्यपराक्रमी भीष्म मार दिये गये, उस समय आपके पुत्र और पाण्डव अलग-अलग चिन्ता करने लगे ॥ १५ ॥ विस्मिताश्च प्रहृष्टाश्च क्षत्रधर्मं निशम्य ते । स्वधर्मं निन्दमानास्ते प्रणिपत्य महात्मने ॥ १६ ॥ शयनं कल्पयामासुर्भीष्मायामितकर्मणे । सोपधानं नरव्याघ्र शरैः संनतपर्वभिः ॥ १७ ॥ पुरुषसिंह! वे क्षत्रियधर्मका विचार करके अत्यन्त विस्मित और प्रसन्न हुए। फिर अपने कठोरतापूर्ण धर्मकी निन्दा करते हुए उन्होंने महात्मा भीष्मको प्रणाम किया और उन अमित पराक्रमी भीष्मके लिये झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा तकिये और शय्याकी रचना की ॥ १६-१७ ॥ विधाय रक्षां भीष्माय समाभाष्य परस्परम् । अनुमान्य च गाङ्गेयं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ॥ १८ ॥ क्रोधसंरक्तनयनाः समवेत्य परस्परम् । पुनर्युद्धाय निर्जग्मुः क्षत्रियाः कालचोदिताः ॥ १९ ॥ इसी प्रकार परस्पर वार्तालाप करके भीष्मजीकी रक्षाकी व्यवस्था कर दी और उन गङ्गानन्दन देवव्रतकी अनुमति ले उनकी परिक्रमा करके आपसमें मिलकर वे कालप्रेरित क्षत्रिय क्रोधसे लाल आँखें किये पुनः युद्धके लिये निकले ॥ १८-१९ ॥ ततस्तूर्यनिनादैश्च भेरीणां निनदेन च । तावकानामनीकानि परेषां च विनिर्ययुः ॥ २० ॥ तदनन्तर बाजोंकी ध्वनि और नगाड़ोंकी गड़गड़ाहटके साथ आपकी तथा पाण्डवोंकी भी सेनाएँ युद्धके लिये निकलीं ॥ २० ॥ व्यावृत्तेऽर्यम्णि राजेन्द्र पतिते जाह्नवीसुते । अमर्षवशमापन्नाः कालोपहतचेतसः ॥ २१ ॥ अनादृत्य वचः पथ्यं गाङ्गेयस्य महात्मनः ।