भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 364

तस्याश्वान् गदया हत्वा तथोभौ पार्ष्णिसारथी । शराचिताङ्गः सौभद्रः श्वाविद्वत् समदृश्यत ।। ६ ।। उस गदासे अश्वत्थामाके चारों घोड़ों तथा दोनों पार्श्विक्षकोंको मारकर बाणोंसे भरे हुए शरीरवाला सुभद्राकुमार साहीके समान दिखायी देने लगा ।। ६ ।।

ततः सुबलदायादं कालिकेयमपोथयत् । जघान चास्यानुचरान् गान्धारान् सप्तसप्ततिम् ।। ७ ।। तदनन्तर उसने सुबलपुत्र कालिकेयको मार गिराया और उसके पीछे चलनेवाले सतहत्तर गान्धारोंका भी संहार कर डाला ।। ७ ।।

पुनश्चैव वसातीयाञ्जघान रथिनो दश । केकयानां रथान् सप्त हत्वा च दश कुञ्जरान् ।। ८ ।। दौःशासनिरथं साश्वं गदया समपोथयत् । इसके बाद दस वसातीय रथियोंको मार डाला। केकयोंके सात रथों और दस हाथियोंको मारकर दुःशासनकुमारके घोड़ोंसहित रथको भी गदाके आघातसे चूर-चूर कर डाला ।। ८ १/२ ।।

ततो दौःशासनिः क्रुद्धो गदामुद्यम्य मारिष ।। ९ ।। अभिदुद्राव सौभद्रं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् । आर्य! इससे दुःशासनपुत्र कुपित हो गदा हाथमें लेकर अभिमन्युकी ओर दौड़ा और इस प्रकार बोला—'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह' ।। ९ १/२ ।।

तावुद्यतगदौ वीरावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ ।। १० ।। भ्रातृव्यौ सम्प्रजह्नाते पुरेव त्र्यम्बकान्धकौ ।