भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 365

वे दोनों वीर एक-दूसरेके शत्रु थे। अतः गदा हाथमें लेकर एक-दूसरेका वध करनेकी इच्छासे परस्पर प्रहार करने लगे। ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकालमें भगवान् शंकर और अन्धकासुर परस्पर गदाका आघात करते थे ॥ तावन्योन्यं गदाग्राभ्यामाहत्य पतितौ क्षितौ ॥ ११ ॥ इन्द्रध्वजाविवोत्सृष्टौ रणमध्ये परंतपौ । शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों वीर रणक्षेत्रमें गदाके अग्रभागसे एक-दूसरेको चोट पहुँचाकर नीचे गिराये हुए दो इन्द्र-ध्वजोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ दौःशासनिरथोत्थाय कुरूणां कीर्तिवर्धनः ॥ १२ ॥ उत्तिष्ठमानं सौभद्रं गदया मूर्ध््न्यताडयत् । तत्पश्चात् कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले दुःशासनपुत्रने पहले उठकर उठते हुए सुभद्राकुमारके मस्तकपर गदाका प्रहार किया ॥ १२ ½ ॥ गदावेगेन महता व्यायामेन च मोहितः ॥ १३ ॥ विचेता न्यपतद् भूमौ सौभद्रः परवीरहा । एवं विनिहतो राजन्नेको बहुभिराहवे ॥ १४ ॥ गदाके उस महान् वेग और परिश्रमसे मोहित होकर शत्रुवीरोंका नाश करनेवाला अभिमन्यु अचेत हो पृथ्वीपर गिर पड़ा। राजन्! इस प्रकार उस युद्धस्थलमें बहुत-से योद्धाओंने मिलकर एकाकी अभिमन्युको मार डाला ॥ १३-१४ ॥ क्षोभयित्वा चमूं सर्वां नलिनीमिव कुञ्जरः । अशोभत हतो वीरो व्याधैर्वनगजो यथा ॥ १५ ॥ जैसे हाथी कभी सरोवरको मथ डालता है, उसी प्रकार सारी सेनाको क्षुब्ध करके व्याधोंके द्वारा जंगली हाथीकी भाँति मारा गया वीर अभिमन्यु वहाँ अद्भुत शोभा पा रहा था ॥ १५ ॥ तं तथा पतितं शूरं तावकाः पर्यवारयन् । दावं दग्ध्वा यथा शान्तं पावकं शिशिरात्यये ॥ १६ ॥ विमृद्य नगशृङ्गाणि संनिवृत्तमिवानिलम् । अस्तंगतमिवादित्यं तप्त्वा भारतवाहिनीम् ॥ १७ ॥ उपप्लुतं यथा सोमं संशुष्कमिव सागरम् । पूर्णचन्द्राभवदनं काकपक्षकवृताक्षिकम् ॥ १८ ॥ तं भूमौ पतितं दृष्ट्वा तावकास्ते महारथाः । मुदा परमया युक्ताश्चक्रुशुः सिंहवन्मुहुः ॥ १९ ॥ इस प्रकार रणभूमिमें गिरे हुए शूरवीर अभिमन्युको आपके सैनिकोंने चारों ओरसे घेर लिया। जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें जंगलको जलाकर आग बुझ गयी हो, जिस प्रकार वायु वृक्षोंकी शाखाओंको तोड़-फोड़कर शान्त हो रही हो, जैसे संसारको संतप्त करके सूर्य अस्ताचलको