भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 379

त एते निहताः संख्ये तुल्यरूपा नरैर्नराः ॥ १३ ॥ इनमेंसे कितने ही राजा दस हजार हाथियोंके समान बलवान् थे तथा कितनोंके वेग और बल वायुके समान थे। ये सब मनुष्य एक समान रूपवाले हैं, जो दूसरे मनुष्योंद्वारा युद्धमें मार डाले गये हैं ॥ १३ ॥

नैषां पश्यामि हन्तारं प्राणिनां संयुगे क्वचित् । विक्रमेणोपसम्पन्नास्तपोबलसमन्विताः ॥ १४ ॥ इन प्राणशक्तिसम्पन्न वीरोंका युद्धमें कहीं कोई वध करनेवाला मुझे नहीं दिखायी देता था; क्योंकि ये सब-के-सब पराक्रमसे सम्पन्न और तपोबलसे संयुक्त थे ॥ १४ ॥

जेतव्यमिति चान्योन्यं येषां नित्यं हृदि स्थितम् । अथ चेमे हताः प्राज्ञाः शेरते विगतायुषः ॥ १५ ॥ जिनके हृदयमें सदा एक-दूसरेको जीतनेकी अभिलाषा रहती थी, वे ही ये बुद्धिमान् नरेश आयु समाप्त होनेपर युद्धमें मारे जाकर धरतीपर सो रहे हैं ॥ १५ ॥

मृता इति च शब्दोऽयं वर्तते च ततोऽर्थवत् । इमे मृता महीपालाः प्रायशो भीमविक्रमाः ॥ १६ ॥ अतः इनके विषयमें 'मृत' शब्द सार्थक हो रहा है। ये भयंकर पराक्रमी भूमिपाल प्रायः 'मर गये' कहे जाते हैं ॥ १६ ॥

निश्चेष्टा निरभीमानाः शूराः शत्रुवशंगताः । राजपुत्राश्च संरब्धा वैश्वानरमुखं गताः ॥ १७ ॥ ये शूरवीर राजकुमार चेष्टा और अभिमानसे रहित हो शत्रुओंके अधीन हो गये थे। वे कुपित होकर बाणोंकी आगमें कूद पड़े थे ॥ १७ ॥

अत्र मे संशयः प्राप्तः कुतः संज्ञा मृता इति । कस्य मृत्युः कुतो मृत्युः केन मृत्युरिमाः प्रजाः ॥ १८ ॥ हरत्यमरसंकाश तन्मे ब्रूहि पितामह । मुझे संदेह होता है कि इन्हें 'मर गये' ऐसा क्यों कहा जाता है? मृत्यु किसकी होती है? किस निमित्तसे होती है? तथा वह किसलिये इन प्रजाओं (प्राणियों) का अपहरण करती है? देवतुल्य पितामह! ये सब बातें आप मुझे बताइये ॥ १८ ½ ॥

संजय उवाच

तं तथा परिपृच्छन्तं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । आश्वासनमिदं वाक्यमुवाच भगवानृषिः ॥ १९ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! इस प्रकार पूछते हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरसे मुनिवर भगवान् व्यासने यह आश्वासनजनक वचन कहा ॥ १९ ॥

व्यास उवाच