भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 380

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
अकम्पनस्य कथितं नारदेन पुरा नृप ॥ २० ॥
व्यासजी बोले—नरेश्वर! जानकार लोग इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका दृष्टान्त दिया करते हैं। वह इतिहास पूर्वकालमें नारदजीने राजा अकम्पनसे कहा था ॥ २० ॥
स चापि राजा राजेन्द्र पुत्रव्यसनमुत्तमम्।
अप्रसह्यतमं लोके प्राप्तवानिति मे मतिः ॥ २१ ॥
राजेन्द्र! राजा अकम्पनको भी अपने पुत्रकी मृत्युका बड़ा भारी शोक प्राप्त हुआ था, जो मेरे विचारमें सबसे अधिक असह्य दुःख है ॥ २१ ॥
तदहं सम्प्रवक्ष्यामि मृत्योः प्रभवमुत्तमम्।
ततस्त्वं मोक्ष्यसे दुःखात् स्नेहबन्धनसंश्रयात् ॥ २२ ॥
इसलिये मैं तुम्हें मृत्युकी उत्पत्तिका उत्तम वृत्तान्त बताऊँगा, उसे सुनकर तुम स्नेह-बन्धनके कारण होनेवाले दुःखसे छूट जाओगे ॥ २२ ॥
समस्तपापराशिघ्नं शृणु कीर्तयतो मम।
धन्यमाख्यानमायुष्यं शोकघ्नं पुष्टिवर्धनम् ॥ २३ ॥
पवित्रमरिसंघघ्नं मङ्गलानां च मङ्गलम्।
यथैव वेदाध्ययनमुपाख्यानमिदं तथा ॥ २४ ॥
यह उपाख्यान समस्त पापराशिका नाश करने-वाला है। मैं इसका वर्णन करता हूँ, सुनो। यह धन और आयुको बढ़ानेवाला, शोकनाशक, पुष्टिवर्धक, पवित्र, शत्रुसमूहका निवारक और मंगलकारी कार्योंमें सबसे अधिक मंगलकारक है। जैसे वेदोंका स्वाध्याय पुण्यदायक होता है, उसी प्रकार यह उपाख्यान भी है ॥
श्रवणीयं महाराज प्रातर्नित्यं नृपोत्तमैः।
पुत्रानायुष्मतो राज्यमीहमानैः श्रियं तथा ॥ २५ ॥
महाराज! दीर्घायु पुत्र, राज्य और धन-सम्पत्ति चाहनेवाले श्रेष्ठ राजाओंको प्रतिदिन प्रातःकाल इस इतिहासका श्रवण करना चाहिये ॥ २५ ॥
पुरा कृतयुगे तात आसीद् राजा ह्यकम्पनः।
स शत्रुवशमापन्नो मध्ये संग्राममूर्धनि ॥ २६ ॥
तात! प्राचीनकालकी बात है, सत्ययुगमें अकम्पन नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे। वे युद्धमें शत्रुओंके वशमें पड़ गये ॥ २६ ॥
तस्य पुत्रो हरिर्नाम नारायणसमो बले।
श्रीमान् कृतास्त्रो मेधावी युधि शक्रोपमो बली ॥ २७ ॥
राजाके एक पुत्र था, जिसका नाम था हरि। वह बलमें भगवान् नारायणके समान था। वह अस्त्रविद्यामें पारंगत, मेधावी, श्रीसम्पन्न तथा युद्धमें इन्द्रके तुल्य पराक्रमी था ॥
स शत्रुभिः परिवृतो बहुधा रणमूर्धनि।