महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 383, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस समय महाभाग राजा अकम्पनाने देवर्षिप्रवर नारदजीको आया देख उनकी यथायोग्य पूजा करके उनसे अपने पुत्रकी मृत्युका वृत्तान्त कहा॥ ३२॥ तस्य सर्वं समाचष्ट यथावृत्तं नरेश्वरः। शत्रुभिर्विजयं संख्ये पुत्रस्य च वधं तथा॥ ३३॥ राजाने क्रमशः शत्रुओंकी विजय और युद्धस्थलमें अपने पुत्रके मारे जानेका सब समाचार उनसे ठीक-ठीक कह सुनाया॥ ३३॥ मम पुत्रो महावीर्य इन्द्रविष्णुसमद्युतिः। शत्रुभिर्बहुभिः संख्ये पराक्रम्य हतो बली॥ ३४॥ (वे बोले—) 'देवर्षे! मेरा पुत्र इन्द्र और विष्णुके समान तेजस्वी, महापराक्रमी और बलवान् था; परंतु युद्धमें बहुत-से शत्रुओंने मिलकर एक साथ पराक्रम करके उसे मार डाला है॥ ३४॥ क एष मृत्युर्भगवन् किंवीर्यबलपौरुषः। एतदिच्छामि तत्त्वेन श्रोतुं मतिमतां वर॥ ३५॥ 'भगवन्! यह मृत्यु क्या है? इसका वीर्य, बल और पौरुष कैसा है? बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महर्षे! मैं यह सब यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ'॥ ३५॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा नारदो वरदः प्रभुः। आख्यानमिदमाचष्ट पुत्रशोकापहं महत्॥ ३६॥ राजाकी यह बात सुनकर वर देनेमें समर्थ एवं प्रभावशाली नारदजीने यह पुत्रशोकनाशक उत्तम उपाख्यान कहना आरम्भ किया॥ ३६॥
नारद उवाच
शृणु राजन् महाबाहो आख्यानं बहुविस्तरम्। यथावृत्तं श्रुतं चैव मयापि वसुधाधिप॥ ३७॥ **नारदजी बोले—**पृथ्वीपते! तुम्हारे पुत्रकी मृत्यु जिस प्रकार घटित हुई है, वह सब वृत्तान्त मैंने भी यथार्थरूपसे सुन लिया है। महाबाहु नरेश! अब मैं तुम्हारे सामने एक बहुत विस्तृत कथा आरम्भ करता हूँ। तुम ध्यान देकर सुनो॥ ३७॥ प्रजाः सृष्ट्वा तदा ब्रह्मा आदिसर्गे पितामहः। असंहृतं महातेजा दृष्ट्वा जगदिदं प्रभुः॥ ३८॥ तस्य चिन्ता समुत्पन्ना संहारं प्रति पार्थिव। चिन्तयन्न ह्यसौ वेद संहारं वसुधाधिप॥ ३९॥ आदिसृष्टिके समय महातेजस्वी एवं शक्तिशाली पितामह ब्रह्माने जब प्रजावर्गकी सृष्टि की थी, उस समय संहारकी कोई व्यवस्था नहीं की थी, अतः इस सम्पूर्ण जगत्को प्राणियोंसे परिपूर्ण एवं मृत्युरहित देख प्राणियोंके संहारके लिये चिन्तित हो उठे। राजन्!