महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपृथ्विपते! बहुत सोचने-विचारनेपर भी ब्रह्माजीको प्राणियों-के संहारका कोई उपाय नहीं ज्ञात हो सका॥ ३८-३९॥
तस्य रोषान्महाराज खेभ्योऽग्निरुदतिष्ठत।
तेन सर्वा दिशो व्याप्ताः सान्तर्देशा दिधक्षता॥ ४०॥
महाराज! उस समय क्रोधवश ब्रह्माजीके श्रवण-नेत्र आदि इन्द्रियोंसे अग्नि प्रकट हो गयी। वह अग्नि इस जगत्को दग्ध करनेकी इच्छासे सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओं (कोणों)-में फैल गयी॥ ४०॥
ततो दिवं भुवं चैव ज्वालामालासमाकुलम्।
चराचरं जगत् सर्वं ददाह भगवान् प्रभुः॥ ४१॥
ततो हतानि भूतानि चराणि स्थावराणि च।
महता क्रोधवेगेन त्रासयन्निव वीर्यवान्॥ ४२॥
तदनन्तर आकाश और पृथ्वीमें सब ओर आगकी प्रचण्ड लपटें व्याप्त हो गयीं। दाह करनेमें समर्थ एवं अत्यन्त शक्तिशाली भगवान् अग्निदेव महान् क्रोधके वेगसे सबको त्रस्त-से करते हुए सम्पूर्ण चराचर जगत्को दग्ध करने लगे। इससे बहुत-से स्थावर-जंगम प्राणी नष्ट हो गये॥ ४१-४२॥
ततो रुद्रो जटी स्थाणुर्निशाचरपतिर्हरः।
जगाम शरणं देवं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्॥ ४३॥
तत्पश्चात् राक्षसोंके स्वामी जटाधारी दुःखहारी स्थाणु नामधारी भगवान् रुद्र परमेष्ठी भगवान् ब्रह्माजीकी शरणमें गये॥ ४३॥
तस्मिन्नापतिते स्थाणौ प्रजानां हितकाम्यया।
अब्रवीत् परमो देवो ज्वलन्निव महामुनिः॥ ४४॥
प्रजावर्गके हितकी इच्छासे भगवान् रुद्रके आनेपर परमदेव महामुनि ब्रह्माजी अपने तेजसे प्रज्वलित होते हुए-से इस प्रकार बोले—॥ ४४॥
किं कुर्मः कामं कामार्ह कामाज्जातोऽसि पुत्रक।
करिष्यामि प्रियं सर्वं ब्रूहि स्थाणो यदिच्छसि॥ ४५॥
‘अपने अभीष्ट मनोरथको प्राप्त करनेयोग्य पुत्र! तुम मेरे मानसिक संकल्पसे उत्पन्न हुए हो। मैं तुम्हारी कौन-सी कामना पूर्ण करूँ? स्थाणो! तुम जो कुछ चाहते हो, बतलाओ। मैं तुम्हारा सम्पूर्ण प्रिय कार्य करूँगा’॥ ४५॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५२॥