महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 385, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
शंकर और ब्रह्माका संवाद, मृत्युकी उत्पत्ति तथा उसे समस्त प्रजाके संहारका कार्य सौंपा जाना
स्थाणुरुवाच
प्रजासर्गनिमित्तं हि कृतो यत्नस्त्वया विभो ।
त्वया सृष्टाश्च वृद्धाश्च भूतग्रामाः पृथग्विधाः ॥ १ ॥
**स्थाणु (रुद्रदेव)-ने कहा—**प्रभो! आपने प्रजाकी सृष्टिके लिये स्वयं ही यत्न किया है। आपने ही नाना प्रकारके प्राणिसमुदायकी सृष्टि एवं वृद्धि की है ॥ १ ॥
तास्तवेह पुनः क्रोधात् प्रजा दह्यन्ति सर्वशः ।
ता दृष्ट्वा मम कारुण्यं प्रसीद भगवन् प्रभो ॥ २ ॥
आपकी वे ही सारी प्रजाएँ पुनः आपके ही क्रोधसे यहाँ दग्ध हो रही हैं। इससे उनके प्रति मेरे हृदयमें करुणा भर आयी है। अतः भगवन्! प्रभो! आप उन प्रजाओंपर कृपादृष्टि करके प्रसन्न होइये ॥ २ ॥
ब्रह्मोवाच
संहर्तुं न च मे काम एतदेवं भवेदिति ।
पृथिव्या हितकामं तु ततो मां मन्युराविशत् ॥ ३ ॥
**ब्रह्माजी बोले—**रुद्र! मेरी इच्छा यह नहीं है कि इस प्रकार इस जगत्का संहार हो। वसुधाके हितके लिये ही मेरे मनमें क्रोधका आवेश हुआ था ॥ ३ ॥
इयं हि मां सहा देवी भारार्ता समचूचुदत् ।
संहारार्थं महादेव भारेणाभिहता सती ॥ ४ ॥
महादेव! इस पृथ्वीदेवीने भारसे पीड़ित होकर मुझे जगत्के संहारके लिये प्रेरित किया था। यह सती-साध्वी देवी महान् भारसे दबी हुई थी ॥ ४ ॥
ततोऽहं नाधिगच्छामि तथा बहुविधं तदा ।
संहारमप्रमेयस्य ततो मां मन्युराविशत् ॥ ५ ॥
मैंने अनेक प्रकारसे इस अनन्त जगत्के संहारके उपायपर विचार किया, परंतु मुझे कोई उपाय सूझ न पड़ा। इसीलिये मुझमें क्रोधका आवेश हो गया ॥ ५ ॥
रुद्र उवाच
संहारार्थं प्रसीदस्व मा रुषो वसुधाधिप ।
मा प्रजाः स्थावराश्चैव जंगमाश्च व्यनीनशः ॥ ६ ॥